1
Advertisement
किताब-प्रतिज्ञा
लेखक-मुंशी प्रेमचंद(धनपत राय)
प्रकाशक-डायमंड पाकेट बुक्स
प्राकशित-1927
आजकल पुराने हिंदी फिल्मों का थ्री-डी वर्जन निकाला जा रहा है ताकि इन  फिल्मों को युवापीढ़ी तक पहुंचाया जा सके लेकिन महान लेखकों की कृतियों पर शायद ही ध्यान दिया जा रहा हो. पुस्तक चर्चा 'हिंदीकुंज' द्वारा शुरू एक अभिनव प्रयास है महान लेखकों की महागाथाओं को फिर से युवाओं के सामने लाकर इसे जिंदा रखने का. उम्मीद है आपको पसंद आएगी. 
त्याग की अनोखी मिसाल  व रिश्तों के मखमली अहसासों की गठरी है ‘प्रतिज्ञा’
यह कहानी अपनी किसी प्रतिज्ञा को पूरी करने का जिद्दीपन नहीं बल्कि त्याग की अनोखी मिशाल है. रिश्तों के मखमली अहसासों की गठरी है. यहां भावनाओं का उत्सव भी है और अहसासों के रंग भी. यहां सामाजिक, पारिवारिक तथा व्यक्तिगत विचारों  की मिलावट है. दो दोस्तों अमृतराय व दाननाथ के अलग-अलग मतों के बावजूद दोस्ती की मिशाल है. कहानी की शुरूआत होती है काशी के आर्य-मन्दिर में पण्डित अमरनाथ के आख्यान से. श्रोता मन्ध-मुग्ध होकर सुन रहे हैं तभी  प्रोफेसर दाननाथ ने आगे खिसककर अपने मित्र बाबू अमृतराय के कान में कहा—रटी हुई स्पीच है. अमृतराय स्पीच सुनने में तल्लीन थे. अमृतराय स्पीच सुनने में इस कदर मग्न थे कि बार-बार बोलने पर भी वह जवाब न देते.वह स्पीच सुन कर ही जाना चाहते थे और दाननाथ से अपना पीछा छुड़ाना चाहते थे. दाननाथ इतनी आसानी से छोड़ने वाले आदमी न थे. घड़ी निकालकर देखी, पहलू बदला और अमरनाथ की ओर देखने लगे. उनका ध्यान व्याख्या पर नहीं, पण्डितजी की दाढ़ी पर था.  उसके हिलने में उन्हें बड़ा आनंद आया. ऐसी मनोरंजक व्याख्यानों के साथ होती है कहानी प्रतिज्ञा का आगाज. पण्डित अमरनाथ की कथा सुनकर अमृतराय प्रेमा को छोड़ किसी विधवा से विवाह करने का निश्चय करते हैं जिसके इर्दगिर्द घूमती इस  कहानी में हर रिश्तों की अलग-अलग अहमियत है. कहानी के मुख्यत: चार मुख्य किरदार हैं अमृतराय, प्रेमा, पूर्णा, दाननाथ. कईं दिलचस्प मोड़ों के साथ हर पन्ने की अहमियत बढ़ जाती है. अमृतराय-प्रेमा-दीनानाथ की त्रिकोणीय प्रेम कहानी के साथ प्रेमा का त्याग, पूर्णा के विधवा होने के बाद उसका बढ़ता द्वंद, अमृतराय का समर्पण और दोस्त के प्रति दाननाथ की भावना इसे महागाथा बनाती हैं. इनके अलावा कहानी में लाला बदरी प्रसाद, देवकी, कमला प्रसाद,  सुमित्रा, पंडित वसंत कुमार के अलावा भी कुछ चरित्र हैं जिनकी अलग-अलग गरिमा  है. साथ ही कईं सारे सवाल भी हैं. क्या अमृतराय किसी विधवा से विवाह करते हैं? क्या प्रेमा अमृतराय को पाने में सफल होती है? विधवा होने के बाद क्या पूर्णा का दूसरा विवाह हो पाता है? इन सवालों के जवाब तो आपको उपन्यास में ही मिलंगे.
अमतृराय व दाननाथ के बेमतलबी रिश्तों की गाथा
अमृतराय प्रेमा से प्रेम करते हैं जो उनकी मृत पत्नी की बहन है जिसे दान  नाथ भी मन ही मन प्रेम करत हैं लेकिन प्रेमा के माता-पिता के नजर में प्रेमा के लिए अमृतराय से योग्य वर नहीं . दाननाथ सरल स्वभाव के मनुष्य हैं . जीवन के सरलतम मार्ग पर चलने में ही वह संतुष्ट हैं. किसी सिद्धांत या आदर्श के लिए कष्ट सहना उन्होंने न सीखा था. वह एक कालेज के अध्यापक हैं. दस बजे कॉलेज जाते, एक बजे लौट आते. बाकी सारा दिन सैर-सपाटे और हंसी-खेल में काट देते .अमृतराय सिद्धान्तवादी आदमी हैं - बड़े ही संयमशील. कोई काम नियम विरुद्ध न करते. जीवन का सद्व्यय कैसे हो, इसका उन्हें सदैव ध्यान रहता था. वकील हैं पर इस पेशे से उन्हें प्रेम नहीं.
प्रेम की अनोखी व्याख्या
जब अमृतराय किसी विधवा से विवाह करने की प्रतिज्ञा करते हैं तभी उनके दोस्त दाननाथ उन्हें समझाते हैं. दाननाथ  तिरस्कार भाव से कहते हैं कि ‘क्या बातें करते हो. तुम समझते हो, प्रेम कोई बाजार का सौदा है, जी चाहा लिया, जी चाहा न लिया. प्रेम एक बीज है, जो एक बार जमकर बड़ी मुश्किल से उखड़ता है. कभी-कभी वो जल और प्रकाश और वायु के बिना ही जीवन पर्यन्त जीवित रहता है. प्रेमा केवल तुम्हारी मंगेतर नहीं है, वह तुम्हारी प्रेमिका भी है.  यह सूचना उसे मिलेगी तो उसका हृदय भग्न हो जाएगा. यह शब्द प्रेम की गरिमा, माधुर्य को भलीभाती व्यक्त करते हैं.
विधवा विवाह के प्रति सकारात्मक भाव
जब अमृतराय किसी विवाह से विवाह करने का निश्चय करते हैं तभी प्रेमा के पिता उनका चेहरा तक देखना नहीं चाहते और दाननाथ उन्हें कहते हैं कि ‘तुम समझते होगे कि बड़ा मैदान मार आए हो और जो सुनेगा वह फूलों का हार लेकर तुम्हारे गले में डालने दौड़ेगा; लेकिन मैं तो यही समझता हूं कि तुम पुराने आदर्शों को भ्रष्ट कर रहे हो।.तुम नाम पर मरते हो, समाचार-पत्रों में अपनी प्रशंसा देखना चाहते हो, बस और कोई बात नहीं. नाम कमाने का यह सस्ता नुस्खा है, न हर्र लगे न फिटकरी, और रंग चोखा. रमणियां नाम की इतनी भूखी नहीं होतीं.’ बातों से यह स्पष्ट होता है कि उस समय विधवा विवाह के प्रति लोगों की क्या सोच थी.


स्त्री के त्याग की कथा
कहानी में प्रेमा जैसी स्त्री के माध्यम से प्रेमचंद ने स्री के त्याग की कथा कही है. अमृतराय के विधवा से विवाह की बात सुनते ही भले ही प्रेमा का हृदय काप उठता है लेकिन उनके इस फैसले पर उसे गुमान भी होता है. तीन सालों से अमृतराय को अपने हृदय-मंदिर में स्थापित कर वह पूजा करने के   बावजूद वह अमृतराय का वहीं पूर्णा भी कहानी के मुख्य किरदारों में से है. उसे द्वंद में घिरा दर्शाया गया है. पूर्णा कितना ही चाहती थी कि कमलाप्रसाद की ओर से अपना मन हटा ले, पर यह शंका उसके हृदय में समा गई थी कि कहीं इन्होंने सचमुच आत्म-हत्या कर ली तो क्या होगा? रात को वह कमलाप्रसाद की उपेक्षा करके चली तो आई थी, पर शेष रात उसने चिंता में काटती है. उसका विचलित हृदय पति-भक्ति, संयम और व्रत के विरुद्ध भाँति-भाँति की तकर्नाएँ करने लगता है. वह सवालों के चपेट में हैं क्या वह मर जाती, तो उसके पति पुनविर्वाह न करते? अभी उनकी अवस्था ही क्या थी? पच्चीस वर्ष की अवस्था में क्या विधुर जीवन का पालन करते आदि. 
भाषा की जादूगरी
प्रेमचंद को भाषा का जादूगर कहा जाता है. जैसे शब्द उनके दास थे जो सिर्फ उनके लिए बनते थे. प्रतिज्ञा में प्रयोग किए गए शब्द जैसे अतृप्त लालसा , अपनी रक्त-रंजित छटा, घी के छींटों से भभकना, अवणर्नीय आभा से प्रदीप्त, हल्की-हल्की लहरों पर थिरकता आदि शब्द विरल लगते हैं और आज के लेखन में ऐसे शब्द सुनने तथा पढ़ने को शायद ही मिलते हों.
इतिश्री सिंह राठौर
उपन्यास के संदर्भ में निजी विचार
हालांकि इतनी हैसियत नहीं रखती कि महान लेखक प्रेमचंद के कहानी की आलोचना यहा समीक्षा कर सकुं फिर भी अपने कुछ विचार रखना चाहुंगी. कहानी प्रतिज्ञा में दो नारी चरित्र प्रेमा और पूर्णा के चरित्रों को स्पष्ट नहीं किया गया. प्रेमा की बात करें तो उसका त्याग कुछ कम न था. जब सभी अमृतराय का विरोध कर रहे थे तभी वह उनके समर्थन में उतरी लेकिन बाद में प्रेमा कहीं लीन हो जाती है. उसके किरदार की भी अहमियत घट जाती है वहीं पूर्णा का द्वंद भी समझ में नहीं आता. उसके मन में द्वंद होना स्वभाविक है लेकिन लेखक ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उसे वे नायिका की गद्दी पर बैठाना चाहते थे या खलनायिका या फिर किसी मालूमी किरदार का ताज पहचान कर छोड़ देना चाहते थे. अगर कहानी के नायक अमृतराय की बात करें तो उनकी प्रतिज्ञा के पीछे पण्डित अमरनाथ की स्पीच के अलावा कोई खास वजह मालूम नहीं पड़ती. इस सभी के बावजूद प्रतिज्ञा एक महान कृति है और इसे कोई बदल नहीं सकता.

यह समीक्षा इतिश्री सिंह राठौर जी द्वारा लिखी गयी है . वर्तमान में आप हिंदी दैनिक नवभारत के साथ जुड़ी हुई हैं. दैनिक हिंदी देशबंधु के लिए कईं लेख लिखे , इसके अलावा इतिश्री जी ने 50 भारतीय प्रख्यात व्यंग्य चित्रकर के तहत 50 कार्टूनिस्टों जीवनी पर लिखे लेखों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया. इतिश्री अमीर खुसरों तथा मंटों की रचनाओं के काफी प्रभावित हैं.

प्रतिज्ञा उपन्यास ख़रीदने के लिए यहाँ क्लिक करें .  

एक टिप्पणी भेजें

  1. meri hindi saahitya padne ki bhookh ki tripti is site ne hi dee hai aapka atyant dhanyawaad pawan jain

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top