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हम लालग्रह पर पहुँचने की
सफलता का जश्न मना रहे थे,
नवरात्रों में ‘मोम’ के आशीर्वाद
के गुण गा रहे थे |
जोर शोर से देवी माँ के-
पंडाल सजाये जा रहे थे |
जन जन, टूटी-फूटी सडकों,
उफनाते सीवर, बहती हुई नालियां से युक्त
डा. श्याम गुप्त  
कूड़े के ढेर से बजबजाती हुई गलियों से होकर
कूड़े से पेट भरती गायों को देखेते हुए-
मंदिर जा रहे थे |
उधर बड़े-बड़े संस्थानों में देवियों का यौनशोषण और-
थाने में उनकी अस्मत का सौदा होरहा था |

कवि सम्मलेन में ---
‘मुझे कान्हा बना देना,
उसे राधा बना देना’, गाया जा रहा था;
अंग्रेज़ी में हिन्दी पखवाड़ा मनाया जा रहा था |
बच्चे, डैड का ज़माना छोडो,
नए ज़माने का ‘अन्फोर्मल’ अपनाओ गीत गा रहे थे |
करोड़ों खर्च करके लाये हुए
ताम्बे के टुकड़े पर इतरा रहे थे |
वे ग्लेमरस व सेक्सी दिखने की चाह में
अधोवस्त्र दर्शाते हुए-
लक्स, लिरिल से नहा रहीं थीं |

मैंने पूछा ,’ये क्या होरहा है !!!!!’
वे बोले-‘पुराणपंथी हो,
सकारात्मक सोचो, नकारात्मक नहीं,
कमजोरियों पर नहीं, मज़बूतियों पर फोकस रखो,
आधे भरे गिलास को देखो,
आधे खाली को नहीं ||





कवि-परिचय.....
नाम डा. श्याम गुप्त        
पितास्व.श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता, मातास्व.श्रीमती रामभेजीदेवी, पत्नीश्रीमती सुषमा गुप्ता एम..(हि.).
जन्म १० नवम्बर,१९४४ ई....ग्राम-मिढाकुर, जि. आगरा, .प्र.  भारत ..  
शिक्षाएम.बी.,बी.एस.,एम.एस.(शल्य), सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय,आगरा.
व्यवसाय-चिकित्सक (शल्य)-.रे.चिकित्सालय, लखनऊ से व.चि.अधीक्षक पद से सेवा निवृत
साहित्यिक-गतिविधियां--विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध, काव्य की सभी विधाओंकविता-गीत, अगीत, गद्य-पद्य, निबंध, कथा-कहानी-उपन्यास, आलेख, समीक्षा आदि में लेखन। ब्लोग्स व इन्टर्नेट पत्रिकाओं में लेखन.  
प्रकाशित कृतियाँ -- . काव्य दूत .काव्य निर्झरिणी ३.काव्य मुक्तामृत (काव्य सन्ग्रह)
             ४. सृष्टिअगीत-विधा महाकाव्य ५.प्रेम-काव्य-गीति-विधा महाकाव्य ६.शूर्पणखा खंड-काव्य,    . इन्द्रधनुष उपन्यास, ८. अगीत साहित्य दर्पण , ९.ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में काव्य संग्रह )
शीघ्र प्रकाश्य- तुम तुम और तुम (गीत-सन्ग्रह), गज़ल सन्ग्रह

मेरे ब्लोग्स( इन्टर्नेट-चिट्ठे)—श्याम स्मृति (http://shyamthot.blogspot.com) , साहित्य श्याम, अगीतायन, छिद्रान्वेषी , विजानाति-विजानाति-विज्ञान एवं हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान...  

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  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 2/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. जीवन और मरण की छाया
    दिखलाये आधा प्याला
    खालीपन तो मरण तुल्य है
    जीवन है बाकी हाला

    जैसे जैसे साॅसें मिटती
    प्याला खाली हो जाता

    साॅसें मिलती नहीं कहीं भी
    प्याला भरती मधुशाला

    ....भूपेंन्द्र कुमार दवे

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