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कोई चाहा, न चाहा
मधुरिमा प्रसाद 

जन्म तुम्हारा तो हुआ
किसी घर से निकली
ढोलक की थाप
कहीं से निकली
मर्मान्तक पीड़ा की आह.
घर का हर कोना उदास
विधाता की उस
प्रेममयी, स्नेहमयी
रचना के आगमन पर.

किसी ने प्रफुल्ल हो कहा ---
लक्ष्मी का वास
किसी ने मुँह बिचकाया,
जच्चा को देखा
घृणा से मुँह मोड़ा अनायास
कहा--
सत्यानाश.

गोद में नव कलिका सी तुम
आँखों की गर्म गर्म बूँदों में तुम
कदाचित्
कहीं किसी घर के
ठहाकों में तुम 

हर आने वाला कल
संघर्ष का बिगुल
हर आने वाला पल
चुनौतियों का इन्द्रधनुष.
रहना है तैयार तुम्हें
हर एक मोड़ पर
चलना है राह तुम्हें ही
संग साथ जोड़ कर
आगाज़ से अंजाम तक
मिलेंगे कई भेष
हर जगह तैयार मिलेगा
नया कुरुक्षेत्र.


यह रचना मधुरिमा प्रसाद जी द्वारा लिखी गयी है . आपके दो काव्य संग्रह  'चतुरंग' और 'क्षितिज के उस पार' तथा एक कहानी संग्रह 'सात झरोखे' प्रकाशित हो चुके हैं . आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं . 

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