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हिंदी : दशा और दिशा

हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है. शायद किसी एक कांग्रेस के अधिवेशन में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया है. भारत में जगह जगह पर राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों का गठन किया गया है. जिननें (केवल) हिंदी के प्रचार के लिए प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ जैसी परीक्षाओं का आयोजन माध्यम बनाकर लोगों को, खासकर अहिंदी भाषियों को हिंदी में काबिल बनाने का यत्न किया. लेकिन यह समितियां भारत की अन्य भाषाओं की ओर अन्यमनस्क एवं सुप्त थीं। भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा शब्द का प्रयोग हुआ ही नहीं है. वहां राजभाषा व अष्टम अनुच्छेद की भाषाएं ही नजर आती हैं.

संविधान की राजभाषा समिति में अंततः हिंदी व तामिल के बीच चुनाव हुआ, जिसमें समान मत मिलने की वजह से अध्यक्ष श्री जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्षीयमत        (कास्टिंग वोट) का प्रयोग करना पड़ा. फलस्वरूप हिंदी राजभाषा बनी. शायद इसी द्वंद के कारण तामिल भाषी हिंदी को अपना जल्दी नहीं सके . कई लोंगों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया और दक्षिण भारतीयों को हिंदी से तोड़कर रखने में काफी मेहनत भी की. आज यह प्रक्रिया सशक्त राजनीति का हिस्सा बन गई है.

14 सितंबर, 1949 को संविधान की भाषा समिति ने हिंदी को राजभाषा पद पर पीठासीन किया. सन् 1963 में (हिंदी) राजभाषा अधिनियम जारी हुआ लेकिन ताज्जुब इस बात का होता है कि 1973 में जब मैंने हिंदी भाषी राज्य से हिंदी साहित्य विषय के साथ उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पूरी की, तब भी शालाओं मे राजभाषा के बारे कोई पढ़ाई या चर्चा नहीं होती थी.

सन 1983 - 84 के दौरान जब एक सरकारी दफ्तर में जाने का अवसर मिला तब वहां के प्रशिक्षण केंद्र में देखा –

                        “हिदी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं अपितु हमारे संघ की राजभाषा भी है”.


वहां का कोई कर्मचारी मुझे इसका अर्थ नहीं समझा पाया. बाद - बाद में किताबों से जानकारी मिली कि राजभाषा क्या है और यह राष्ट्रभाषा से किस तरह भिन्न है. क्या हम अपनी राजभाषा को परदे में सँजो कर रखना चाहते हैं?
एम.आर.अयंगर

यदि हिंदी का प्रयोग बढाना है और हिंदी को सही मायने में अपनाना है तो इसे खुली छूट देनी होगी. हिंदी के सारे नियम कानून जगजाहिर करने होंगे. सारे उच्चस्तरीय अधिकारियों को जन समुदाय को प्रोत्साहित करने के लिए, मजबूरन ही सही अपने बच्चों को हिंदी माध्यम स्कूलों में पढाना होगा. अधिकारी इससे कतराते क्यों हैं इसका राज, राज ही है.... या उनकी समझ में भी अंग्रेजी ही शिखर की सीढी है.

बात सही है. आज के परिप्रेक्ष्य में अंग्रेजी को माध्यम से उच्च शिक्षा प्राप्त करना आसान है. इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि लोग हिंदी से परहेज करें. लोग हिंदी सीखें इसलिए कि स्कूलों में हिंदी आवश्यक है और अंग्रेजी इसलिए सीखें कि उससे उच्च शिक्षा पाना आसान है और अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों एवं उद्योगों में प्रवेश पाना आसान है. यदि इस देश की हर शाला में हिंदी अनिवार्य कर दी जाए तो हिंदी आगे बढ सकती है. जहाँ हम अंग्रेजी की अवहालना नहीं कर सकते वैसे ही किसी को भी हिंदी की अवहेलना करने न दिया जाए.

50-55 साल  के किसी बूढ़े को एक  सप्ताह का प्रशिक्षण  दे देने से, वह हिंदी में पंडित नहीं हो जाता. इसके लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति इस भाषा से लगातार संपर्क में रहे. यह संभव तब ही हो सकता है जब भारत के सभी शालाओं में हिंदी अनिवार्य हो और इसमें 50 प्रतिशत  अंक पाने पर ही उसे उत्तीर्ण घोषित किया जाए.

हमारे देश में मुद्दे तो इसी तरह के हैं. जातियों, धर्मों व भाषाओं को भी नहीं बख्शा गया. कहीं अहिंदी की मुद्दा है तो कहीं हिंदी का. लेकिन सभी का मकसद है जोड – तोड। इन सबके रहते देश हिंदी में प्रगति करे, तो करे भी कैसे।
भारत के ही एक राज्य तमिलनाडु एक समय में हिंदी राष्ट्रीय समाचार (ब्रॉडकास्ट) प्रसारित नहीं होते थे. टी वी पर भी राष्ट्रीय समाचार टेलीकास्ट नहीं होते थे. पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति या किसी नें इस ओर झाँकना भी उचित नहीं समझा. शायद वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कम व अधिकारों के प्रति ज्यादा सजग थे. समय ने इस मसले को अपने आप हल कर दिया. आज सब सुचारू रूप से चल रहा है.

क्या हमारा हिंदी प्रचार का कार्यक्रम ऐसा ही है. यदि हम हिंदी की इतनी ही सेवा करना चाहते हैं, हिंदी के प्रति हमारा रुख – बर्ताव ऐसा ही होना था, तो जो नतीजे आ रहे हैं उनसे दुखी होने का कोई कारण ही नहीं है. नतीजे ऐसे ही आने थे सो आए. नतीजे प्रयत्न के फलस्वरूप ही हैं.

यदि सही मायने में हम हिंदी के उपासक हैं और हिंदी को पनपता देखना चाहते हैं तो सभी सार्वजनिक व सरकारी प्रतिष्ठानों में प्रवेश के लिए हिंदी अनिवार्य क्यों नहीं की जाती। ऐसा तो कोई कानून नहीं है कि हिंदी जानने वाला अंग्रेजी नहीं जान सकता. यदि किसी को ऐसा लगता है कि प्रगति के लिए अंग्रेजी जरूरी है तो वह अंग्रेजी सीखे और क्योंकि देश में पढ़ने के लिए हिंदी जरूरी है इसलिए हिंदी पढे. सवाल केवल इसी बात का है कि सरकार में ऐसे कदम उठाने की हिम्म्त हो.

हर अभिभावक चाहेगा और उसे चाहना भी चाहिए कि उसके दिल का टुकड़ा आसमान की ऊंचाइयों को छुए. यदि उस मुकाम के लिए उसे हिंदी सीखनी या सिखानी पड़े तो लक्ष्य प्राप्ति के लिए वह हिंदी सीखेगा भी और सिखाएगा भी. अपने बच्चे को हिंदी के स्कूलों में भी पढ़ाएगा. तथ्यों की मेरी जानकारी के तहत भारत  एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है भाषा निरपेक्ष नहीं. इसलिए यहाँ आप किसी को भी, कोई भी धर्म अपनाने से रोक नहीं सकते, लेकिन भाषा के मामले में ऐसा नहीं है और भारतीयों को हिंदी सीखने लिए कहा जा सकता है. मेरी समझ में  नही आता  कि राजनीतिक समीकरणों के लिए हमने हिंदी की ऐसी हालत क्यों बना दी.

हिंदी सीखने में भी कुछ कठिनाइयाँ हैं. विभिन्न भाषा भाषी हिंदी का उच्चारण सही तरीके से नहीं कर पाते. हिंदी के जानकारों को चाहिए कि उन्हें सही उच्चारण से अवगत कराएं न कि उन पर हँसें. कई बार तो ऐसा समझ में आया है कि गलत उच्चारण के तर्कसंगत कारण हैं. मौसम और वातावरण का समुचित असर उच्चारण पर साफ देखा जा सकता है. भाषाविद इसके लिए स्थान दें एवं विभिन्न उच्चारणों को हिंदी में समाहित करें, तो शायद स्थिति में काफी परिवर्तन हो सकेगा.

स्वतंत्रता की साठ से ज्यादा वर्षगाँठ मनाने के बाद भी हमें अपनी भाषा के बारे में यह सोचना पड़ रहा है, क्या यह दयनीय नहीं है. शर्मनाक नहीं है. पर क्या हम शर्मिंदा हो रहे हैं. या हम बेशर्म हो गए हैं. इनका जवाब ढूंढिए, कहीं न कहीं हमारी अपनी कमियाँ आँखें फाड़ कर हमारी तरफ ताकती मिलेंगी. जब हम उन गलतियों को सुधारकर खुद सुधरेंगे, तब कहीं देश या देश की भाषा को सुधारने की काबीलियत हममें आएगी. क्या हम इस सुधार के लिए तैयार हैं. वरना न रहेगा बाँस – न बजेगी बाँसुरी.

सरकारी संस्थानों (स्कूल, कॉलेज, लाईब्रेरी, कार्यालय इत्यादि) में अपने विभिन्न दावे    (चाहे पैसों के ही क्यों न हों), आवेदन चाहे छुट्टी का हो या अनुदान का या फिर किसी सुविधा संबंधी अर्जी ही क्यों न हो,- हिंदी में देने के लिए क्यों नहीं कहा जा सकता. शायद इसलिए कि कहने वाला बदनाम हो जाएगा और बेबात की ऐसी बदनामी कौन मोलना चाहेगा। शायद कुछ सोच-विचार , चर्चा – परिचर्चा के बाद कम से कम हिंदी क्षेत्र में हिंदी में भरे फार्मों को प्राथमिकता दी जा सकती है.

उसी तरह हिंदी की रचनाओं को प्रोत्साहन हेतु – हिंदी के लेख, निबंध, कविता, चुटकुले शायरी इत्यादि रचनाओं के लिए, अंग्रेजी रचनाओं से कुछ ज्यादा पारिश्रमिक दिया जा सकता है. कम से कम राष्ट्रीय पर्वों – 26 जनवरी, 15 अगस्त और 2 अक्तूबर - पर व्याख्यान हिंदी में देने के लिए जरूर कहा जा सकता है.

इसका मतलब यह कदापि नहीं कि हम अंग्रेजी की अवहेलना कर हिंदी को आगे बढाएं. जहाँ अंग्रेजी हिंदी का स्थान नहीं ले सकती, वहाँ निश्चित रूप से हिंदी भी अंग्रेजी का स्थान नहीं ले सकती.

हिंदी की प्रगति के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि हिंदी के नाम पर क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग न हो. 1963 का राजभाषा अधिनियम भी रोजमर्रा की, बोलचाल व संप्रेषण की संपर्क हिंदी को ही राजभाषा का दर्जा देता है. भाषा में जितना प्रवाह होगा, वह लोगों की जुबान पर उतना जल्दी चढेगी भी. रोजमर्रा के जितनी करीब होगी – लोगों का उसकी ओर  आकर्षण उतना ही ज्यादा होगा और वह उतनी ही जल्दी अपनाई जाएगी.

हाल ही में जी टी वी ने हिंग्लिश शुरु की. जो हिंदी व अंग्रेजी के सम्मिश्रण के अलावा कुछ नहीं थी. पर इसके लिए पूरी तरह न हिंदी जाननें की जरूरत थी और न ही अंग्रेजी जाननें की. इसलिए आधे अधूरे भाषायी जानकारों को अच्छा मौका मिला और हिंग्लिश देखते ही देखते युवाओं के लिए वरदान साबित हुई और जवान पीढ़ी ने इसे देखते ही अपना लिया. आज हिंग्लिश युवा पीढ़ी की भाषा है. आज की युवा पीढ़ी किसी एक से बँध कर नहीं रह सकती चाहे वह भाषा ही क्यों न हो. हर क्षेत्र की तरह, वह भाषा के क्षेत्र में भी लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) चाहती है, जिसकी कसौटी पर हिंग्लिस खरी उतरती है.

मैं यदि मेरी कहूँ तो मुझे हिंदी से बेहद लगाव है. लेकिन जिस तरह से हमारे देश में हिंदी के प्रयोग पर या  अपनाने पर जोर जबरदस्ती की जाती है उस पर मुझे कड़ी आपत्ती है. कहा जाता है कि हस्ताक्षर हिंदी में करें. कोई इन्हें समझाए कि क्या हस्ताक्षर की कोई भाषा होती है. यदि हाँ तो कल कोई मुझसे कहेगा – आप हिंदी में क्यों नहीं हँस रहे है. या कोई कहे – आप तबला हिंदी में बजाया करे. ड्राईंग हिंदी में बनाएँ – इत्यादि-इत्यादि. मुझे यह पागलपन के अलावा कुछ नहीं लगता.

हमारे यहाँ सरकार बच्चों को हिंदी पढ़ाने में विश्वास नहीं रखती. बल्कि बूढ़ों को सप्ताह  भर में हिंदी में पारंगत कर देना चाहती है. क्या पता शायद इसलिए कि यही बच्चे कल के नागरिक होंगे और यदि वे हिंदी में पारंगत हो गए तो हिंदी पर अब से ज्यादा जोर व ध्यान होगा. हिदी की हालत सुधर जाएगी -  तो भाषा की रजनीति कैसे चलेगी.

अनाप - शनाप अनावश्यक व बेमतलब के ये तौर-तरीके हिंदी के प्रचार प्रसार में सहयोगी नहीं, बाधक हो रहे है. कोई इनकी तरफ ध्यान दे व लोगों का सही मार्गदर्शन करे तो भी बात सुधर सकती है. लेकिन फिर वही बात....करे तो करे कौन.........
लोगों से जबरदस्ती मत कीजिए. यह मानव स्वभाव है कि यदि आप जबरदस्ती करेंगे तो वह आपके विरुद्ध करने को उत्सुक होगा. आपका जितना जोर होगा उसकी उतनी ही तगडी प्रतिक्रिया होगी. साधारण उदाहरण ही लीजिए - कोई पिक्चर  “ए”  सर्टीफिकेट पा गई हो तो बड़े देखें न देखें, पर बच्चे इसे जरूर देखेंगे कि इसमें ऐसा है क्य़ा ? आतुरता और उत्सुकता उन्हें वहाँ खीच लाती है. अपने मन से देखने वाले बच्चों की संख्या “यू”, व “ए यू” सर्टिफिकेट वाली फिल्मों से “ए” सर्टिपिकेट वाली फिल्मों में ज्यादा मिलेंगे.

ऐसा भी नहीं है कि दक्षिण भारतीय हिंदी समझते नहीं हैं. यदि ऐसा होता तो हिंदी फिल्में दक्षिण भारत में चल नहीं पातीं – लेकिन माजरा यहाँ उल्टा ही है- दक्षिण भारत में हिंदी फिल्मों का क्रेज है. यह भी नहीं कि दक्षिण भारत में फिल्में नहीं बनती ... शायद हिंदी से ज्यादा फिल्में दक्षिण भारत में ही बनती हैं.

इसका मतलब यह कदापि नहीं कि हम अंग्रेजी की अवहेलना कर हिंदी को आगे बढाएं. जहाँ अंग्रेजी हिंदी का स्थान नहीं ले सकती वहाँ निश्चित रूप से हिंदी भी अंग्रेजी का स्थान नहीं ले सकती. फेसबुक पर एक मजाक देखा कि हिंदी मातृभाषा नहीं महज मात्र एक भाषा बन कर रह गई है. दिल ते बहुत दुखा पर करें तो क्या.

हम हर वर्ष हिदी दिवस पर हिंदी को तहे दिल से रोजमर्रा में अपनाने का प्रण लेते रहते हैं लेकिन इन्हें राजभाषा पखवाड़े तक ही सीमित रखना हमारी आदत बन गई है. राजभाषा तक सीमित हिंदी को अब असीमित करना होगा. हमें प्रण लेने की जरूरत नहीं है अपने आप पर विश्वास करना होगा और इसके लिए मन लगा कर सोच-विचार कर काम करना होगा.



यह रचना माड़भूषि  रंगराज अयंगर जी द्वारा लिखी गयी है . आप इंडियन ऑइल कार्पोरेशन में कार्यरत है . आप स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है . आप की विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन पत्र -पत्रिकाओं में होता रहता है .
संपर्क सूत्र - एम.आर.अयंगर. , इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड,जमनीपाली, कोरबा.
मों. 08462021340

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  1. हिंदी भाषा को लेकर लेखक की पीड़ा परिलक्षित होती है लेख में हिंदी भाषा पर समग्र चिंतन का प्रयास किया गया है .

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    1. Main lekhak ki baton se bilkul sahmat hu. Hame apne desh ko rashtra bhasha se gauravanvit karna hi chahiye

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  2. "भाषा के बंधन में बंधने का अर्थ है, ज्ञान को बंधनस्थ करना....."

    अपने अपने स्थान पर प्रत्येक भाषा उपयोगी है, यद्यपि संस्कृत को वैज्ञानिक भाषा की पदवी प्राप्त है तथापि विगत वर्षों में आंग्ल भाषा ने विज्ञान के क्षेत्र में अतिशय कार्य किया, अत: विज्ञान के विद्यार्थियों का इस भाषा का ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है, सुसाहित्य के क्षेत्र में संस्कृत हिंदी व् उर्दू भाषा में जितना कार्य हुवा है कदाचित अन्य सभी भाषाओं ने सम्मिलित स्वरूप में इतना कार्य नहीं किया होगा । चूँकि भाषा अभिव्यक्ति का साधनमात्र है अत: हमें उत्तम साधन को संजोकर रखना ही चाहिए.....

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  3. सुनीताजी,

    आपकी संवेदनशील टिप्पणी प्रयासों को प्रोत्साहन देती हैं.

    सादर धन्यवाद

    अयंगर.

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  4. नीतू जी,
    आपकी टिप्पणी सार्थक है. मैंने न ही इस लेख में या अन्यथा न कहीं और ही कहा है या कहना चाहा है कि हिंदी के लिए किसी और भाषा से परहेज किया जाए. खास तौर पर कहा है कि हिंदी के लिए अंग्रेजी को न त्यागें. दोनों साखने में कोई बिराई नहीं है. ज्यादा भाषाएं जानना एक अच्छा गुण है. जहाँ से जो साहित्य मिले सीखना चाहिए.

    आपके प्रेरक टिप्पणी के लिए सादर आभार.

    अयंगर.

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  5. बेनामीजून 20, 2014 9:00 pm

    आपने सही विचार व्यक्त किया है .
    संदीप शर्मा

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  6. संदीप शर्मा जी,

    लेख पर आपके विचार सुनकर बहुच ही अच्छा लगा. आशा है आपको मेरे मेल मनें अतिरिक्त सूचनाएं भी मिली.
    आपकी राय का इंतजार रहेगा. धन्यवाद.

    अयंगर.








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  7. सुभाष नोहवार जी,
    आपकी पूर्ण सहमति मुझे आत्मविश्वास देती है और सात ही साथ प्रोत्साहन भी. आपसे गुफ्तगू में बड़ा ही आनंद आया. मैं तहे दिल से पूरी कोशिश करूंगा कि आप की राय पर आमल किया जाए. कल ही मैं खबर लेकर रचना प्रेषित करूँ, ऐसी कोशिश होगी.

    प्रणाम मान्यवर.

    अयंगर.

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  8. मैं लेखक के विचारों से बिल्कुल सहमत हूँ! मेरे ख्याल से हिंदी को पुरे देश में अनिवार्य भाषा घोषित कर देना चाहिए!

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  9. सुभाष नोहवार जी,

    आपके सुझाव के अनुसार आज मैंने अपने लेख का लिंक प्रधानमंत्री जी के कार्यालय को प्रेषित किया है. फ्रदानमंत्री जी का अपना ईमेल या कोई डायरेक्च लिंक प्राप्त नहीं हो पाया है. उनकसे चर्चा का यही माध्यम दिखा.

    आपको सूचित करते हुए खुशी हो रही है.

    सादर,

    अयंगर..

    उत्तर देंहटाएं
  10. सत्यानंद जी,

    बहुत बहुत शुक्रिया...

    आपने इसे पढ़ना उचित समझा और साथ ही साथ अपन मत भी टिप्पणी के रूप में प्रेषित किया.

    आपसे ऐसे ही सहयोग की आशा करता रहूंगा.

    सादर

    अयंगर

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  11. India is divided by complex scripts but not by phonetic sounds.
    India needs simple script at national level.

    Since most Devanagari scripted languages(Magahi,Mathili,Bhojpuri...etc) are slowly disappearing under the influence of Hindi/Urdu ,a regional state may learn Hindi in their native script or in India's simplest nukta and shirorekha free Gujanagari(Gujarati) script through script converter.

    If Urdu people can learn Hindi in their script then why can't regional states can do the same?
    Will Urdu survive in Devanagari script?
    The two scripts formula is preferred over three languages state formula.

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  12. Saral Hindi,

    I have come across your suggestions of Gujnagari. The proposal needs to be deliberated seriously in various fora ( forums) before coming to a conclusion. Personally as of me, I think Gujarati is traversing the path alreadt treaded by Hindi . I see today's Gujarati as old form of Hindi and may be later on some day Gujarati will occupy todays Hindi position. I shall not be surprised if on a later date may be after our lifetime there will be a day when Gujarati and Hindi may converge into a cpommon form may be that could be called Gujnagari or something else. But as of Now I dont see Gujarati anything other than a follow language to Hindi. This is my personal opinion and it may be differred and argued by many.

    उत्तर देंहटाएं
  13. Saral Hindi,

    Gujarati is following Hindi and may get to present Hindi status in due course of time. Hindi in its present version is better and will lose its basic intints without Shirorekha, Anunasic and Anuswar. Nukta needs to be adopted in hindi and so are some sounds from other languages. s implification does not mean doing away with the basics of a language. It should simplified keeping basic structure and qualities intact..

    उत्तर देंहटाएं
  14. I am not promoting Gujarati language (which has long way to go) but the script only.

    Hindi people have added Urdu nukta to some letters and have modified few Ancient Sanskrit letters by calling it modern Devanagari script while Gujarati people have modified it by dropping nukta and shirorekha by calling it India's simplest nukta and shirorekha free Gujanagari script.

    How may Indian languages / world languages use nukta and shirorekha ??

    http://www.hindujagruti.org/articles/20.html
    Sanatan insists on usage of Hindi based on Sanskrut language!
    1. Veds never used any dot (nukta) under any word, even then the pronunciation of Veds have not changed for thousands of years.
    2. To quote a modern example, English language does not use nukta anywhere and yet nobody finds any difficulty in speaking it anywhere in the world.

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  15. Dear saral Hindi,

    What is wrong with nukta and shirorekha. Doesit matter how many languages do have them or not? IT IS NOT THAT WE ARE BENT UPON FOLLOWING VEDS , LET US ACCEPT GOODS OF VARIOUS LANGUAGES IN THE WORLD NOT ONLKY INDIA. YES FINAL DECISION CAN ONLY BE AFTER LOT MANY NEGOTIATIONS AT DIFFERENT LEVELS WHERE YOU AND ME MAY BE / MAY NOT BE PARTICIPATING.

    उत्तर देंहटाएं
  16. Hey I want some help from u peoples . I hv an project on Hindi related 2 this . Topic is “हम हिंदी क्यों पढ़ते है । "
    Plz give info 4 this.

    उत्तर देंहटाएं

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