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रैदास
राम  मै पूजा कहा चढ़ाऊँ.
फल अरु फूल अनूप न पाऊँ  ..
थन तर दूध जो बछरू जुठारी .
पुहुप भँवर जल मीन बिगारी ..
मलयागिर बेधियो भुअंगा .
विष अमृत दोउ एकै संगा..
मन ही पूजा मन ही धूप .
मन ही सेऊँ सहज सरूप..
पूजा अरचा न जानू तेरी .
कह रैदास कवन गति मोरी ..

संत कुलभूषण कवि रैदास उन महान् सन्तों में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है। मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है।

सौजन्य - हिंदी विकिपीडिया

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  1. संत रेदास की रचना बहुत पसंद आयी . आपने जो उनके विषय में जो जानकारी भी दी उसके लिए धन्यवाद .

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