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वैश्विक संपर्क और विज्ञान की भाषा के रूप में अंग्रेजी का महत्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और वह दूसरी भाषाओं को पीछे ढकेलती जा रही है। कम्पूटर के आने के बाद इस गतिविधि में और भी तेजी आ गई सी प्रतीत होने लगी है। विश्व के प्रायः हर कोने में विज्ञान को समझने के साथ नौकरी पाने व धन कमाने के लिये अंग्रेजी भाषा का जानना अनिवार्य-सा हो रहा है। कहते हैं कि इंटरनेट पर जितने भी पृष्ठ हैं, उनमें सत्तर प्रतिशत अंग्रेजी में हैं। दुनियाभर में 6,800 भाषाएं हैं और बोलियों की संख्या तो और भी अधिक है। कम्पूटर के आने के बाद इनमें से एक-तिहाई भाषाएं खतरे में हो गई हैं। इन सबको अंग्रेजी तेजी से प्रभावित कर रही हैं।
हालाकि विश्व की बड़ी भाषाओं के लुप्त होने का खतरा अभी नहीं है। मंदारिन जो कि चीनी भाषा का ही प्रकार है, दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा है। लेकिन आज चीन की स्कूलों में तीसरी कक्षा से अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाने लगी है। विश्व की 2800 भाषाओं में सबसे अधिक बोली जाने वाली चीनी, अंग्रेजी, स्पेनिश और अरेबियन हैं और इसके बाद हिन्दी का पांचवां स्थान है। इसके साथ भारत में 179 भाषाएं और 54 बोलियाँ या उपभाषाएं हैं। फिर भी हिन्दी लगातार सबसे बड़ी कड़ी, सम्पर्क भाषा या सुद्दढ़ सेतुबंध के रूप में उभर रही है।    
लेकिन देश का काफी बड़ा तबका अभी से हिन्दी को मृतप्राय की संज्ञा देकर अहं जताने का फैशन अपना रहा है और बाकी सब लोग इन गतिविधियों के मूक दर्शक बने रहना सभ्यता की निशानी मान रहे हैं। देश तेजी से भूल रहा है कि ‘अनेकता में एकता’ के मूल में भारत में सर्वत्र एकरूपिणी सुसंस्कृति के साथ सबसे महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में एक भाषा भी है जो देश की विभिन्न भाषाओं की सोच को एक समान, एक ही धरातल पर जमाये रखने के लिये और उनको एक सूत्र में बाँधे रखने के लिये आपसी संवाद को बनाये रखने की भूमिका निभाने की क्षमता रखती है।
देश में सामाजिक एकता बनाये रखने व आपसी सहज संवाद को बनाये रखने के लिये किसी एक भाषा को तो नेतृत्व करने के लिये चुनना ही होता है। सारे देश में सहज संवाद का अस्तित्व में होना विकास के लिये अति आवश्यक है। लेकिन इसके लिये दूसरी अन्य भाषाओं का तिरस्कार करना एकता की द्दष्टि से अहितकारी ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश की सोच को कमजोर बनानेवाला ही सिद्ध होता है। विज्ञान की खोज के अनुसार कई भाषाओं के ज्ञान से मनुष्य का मस्तिष्क ज्यादा लचीला व विचारवान बनता है। एक तरह से जहाँ मनुष्य को विस्तृत सोचनेवाला प्राणी बनाने में अनेक भाषाओं का ज्ञान निर्णायक भूमिका निभानेवाला होता है वहाँ सोच के समुचित आदान-प्रदान के लिये आपसी संवाद को सुलभ बनाये रखनेवाली किसी एक भाषा को भी अति महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है।
इसके लिये विश्व में पांचवी सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा हिन्दी का होना उपयुक्त लगता है। एक तो यह स्वतंत्रता के बाद से ही देश को एकसूत्र में बाँधने के लिये संपर्क भाषा का स्वरूप धारण कर चुकी है और अब इतने वर्षों बाद इस एक बढ़ती धारा को रोकना समझदारी नहीं कही जा सकती है। देश को भी गर्व है कि उसकी अपनी भाषा विश्व की तीसरी प्रमुख भाषा होने के साथ संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा की अवतार-स्वरूपा है और विश्व की जानीमानी वैज्ञानिक लिपि ‘देवनागरी’ में लिखी जाती है। लिपि के बाद भाषा का दूसरा विकास-क्रम उसकी व्याकरण पर निर्भर करता है क्योंकि व्याकरण शब्द व शब्दार्थ के नियम से भाषा को संतुलित तथा संप्रेषणीय बनाने का काम करती है। हिन्दी संस्कृत के व्याकरण से भी जुड़ी  हुई है और यह सर्व मान्य है कि व्याकरण के क्षेत्र में निश्चित ही संस्कृत सभी भाषाओं में अग्रणी रही है क्योंकि किसी भी भाषा को पाणिनि जैसा मनीषी नहीं मिला।
इतिहासकार पाणिनि (350ई.पू.) को एक असाधारण मस्तिष्कवाला मानते हैं। वे कहते हैं कि ‘The grammer of Panini stands supreme among the grammers of the world, alike for its precision of statement and for its thorough analysis of the roots of the language and of the formative principles of words. By employing an algebraic terminalogy it retains a sharp succinctness unrivalled in brevity, but at times enigmatical. It arranges in logical harmony, the whole phenomena, which Sanskrit language presents and stands forth as one of the most splendid achievements of human inventions and industry. So elaborate is the structure that doubts have arisen whether its complex rules of formation and phonetic change, its polysyllabic derivations, its ten conjugations with their multiform aorists and long array of tenses, could have been the spoken language of a people.’
पाणिनि ने अपवादों के भी नियम बनाए और भाषा ऐसी अनुशासित कर दी कि आज कम्पूटर के लिए सबसे उपयुक्त संस्कृत को ही माना जा रहा है। व्याकरण के इतने नियमों से जूझती संस्कृत भाषा धर्म-दर्शन और आध्यात्मिकता व शास्त्रीयता का सृजन करनेवाली विश्व की प्रमुख भाषा बनकर उभरी। लेकिन संस्कृत साहित्य ने अपने को धर्म या आध्यात्मिक तक ही सीमित नहीं रखा। उसकी परतों में कहीं विज्ञान छिपा मिलता है तो कहीं ज्योतिष, खगोल, गणित आदि शास्त्रों का भंडार। संस्कृत ने विश्व की अन्य सभी भाषाओं को कहानी, कविता, ग्रंथ आदि विधाओं का ज्ञान से अवगत भी कराया। कहा जाता है कि आज भी संस्कृत अपने विपुल साहित्य श्रंगार के कारण विश्व की सबसे वैभवशाली भाषा बनी हुई है।
अपनी पुस्तक The Indian Empire –its people, history and products’ esa W.W.Bunter fy[krs gSa ‘The forefathers of the Greek and the Roman, of Englishman and the Hindu, dwelt together in Asia, spoke the same tongue, worshipped the same Gods. The languages of Europe and India, although at first sight they seem wide apart, are merely different growths from the original Aryan speech. This is especially true of the common words of family life. The names of father, mother, brother, sister and widow are the same in most of the Aryan languages.’ यह बात लेखक ने संस्कृत के पितर, मातर, भ्रातर, दुहित्रि और विधवा जैसे शब्दों से मिलान कर कही है। धर्म के विषय में वे लिखते हैं, ‘The ancient religions of Europe and India had a similar origin. They were to some extent made up of the sacred stories or myths which our common anscestors had learned while dwelling together in central Asia. Certain of the vadic Gods were also the Gods of Greece and Rome and the Deity is still adored by the names derived from the same old Aryan root (div –to shine, hence the bright one, the Indian Deva, Latin Deus or Divinity) by the Brahmins in Calcutta, by the Protestant clergy of England and by Catholic priests in Peru.’
वाइसराय लार्ड वेवल ने 1943 में कहा था कि ‘इंजीनियर’ शब्द तक संस्कृत के ‘एजिमनो’ धातु से बना है।
इस तरह उपरोक्त कथनों से यह साबित होता है कि संस्कृत भाषा का विश्व की भाषाओं में विशिष्ट स्थान आज भी बना हुआ है।
लेकिन संस्कृत साहित्य की एक और विषेशता रही है। इसका एक बार किया गया सीधा-सादा अनुवाद सब कुछ नहीं होता। इसे विविध द्दष्टिकोण से तथा परिवर्तित समय के अनुसार जितने बार पढ़ा जावे उतने गहरे व विभिन्न दर्शन का स्वाद मिलता है और नई विचार धारा के उद्गम का आभास होता है। इस कारण से आज भी विश्व की प्रमुख भाषायें संस्कृत साहित्य की बारिकियों को समझने लालायित हैं। अतः संस्कृत साहित्य तक मनुष्य की पहुँच को सदा बनाये रखने के लिये उस भाषा को भी जीवित रखना होगा जो लुप्त हुई संस्कृत भाषा को पुनर्जन्म देने पृथ्वी पर आयी है। निसंदेह ‘हिन्दी’ ही यह भाषा है।
भूपेन्द्र कुमार दवे

हम भारतवासियों द्वारा मात्र बैठे-बैठे हिन्दी के गुणगान करने से कुछ भला नहीं होनेवाला। पहली बड़ी आवश्यकता है हिन्दी के शब्दकोष को इस योग्य बनाना की। आज आधुनिक ज्ञान की जो लगभग छः सौ शाखाएँ खुली हैं, उनमें प्रयुक्त होनेवाले करीब बीस लाख शब्दों के निर्माण में हिन्दी को सफल होना है। संसार की चार ही भाषाऐं यथा संस्कृत, चीनी, ग्रीक और लेटिन ऐसी हैं जिनमें शब्द-निर्माण की अपरिमित क्षमता व पूर्ण योग्यता है। संस्कृत भाषा में तो उपसर्ग और प्रत्यय की मदद से शताधिक शब्द बनाये जा सकते हैं। बाइस उपसर्गों और दो हजार प्रत्ययों से सुसज्जित संस्कृत भाषा तकनीकी और साहित्यिक शब्दसंपदा को बढ़ाने में पूरी तरह समर्थ है। संन्धि व समास की व्यवस्था संस्कृत में है जिससे छोटे-छोटे शब्द समूह बनते हैं और शब्दों की व्याख्या सुन्दर बन पड़ती है। संस्कृत में पर्याय शब्दों का भंडार भी है और हर इक शब्द के अनेकों अर्थ भी देखने मिलते हैं, जिससे शब्दावली खुद-ब-खुद कई गुणित बढ़ जाती है।
चूंकि हिन्दी अपने मूल रूप में संस्कृत है, अतः हिन्दी संस्कृत के उपरोक्त सारे गुण नैसर्गिक रूप से विद्यमान हैं। हिन्दी में लगभग पाँच लाख शब्द हैं, जिनमें से अस्सी प्रतिशत संस्कृतनिष्ठ हैं। अतः हिन्दी संस्कृत के आधार पर और उसकी व्याकपता की सहायता से आधुनिक वैज्ञानिक शब्दों को सहज स्वरूप दे सकती है।
भारत में 1898 में आयरिश विद्वान जार्ज ग्रियर्सन ने अध्ययन द्वारा 175 भाषाओं और 54 बोलियाँ या उपभाषाएं का पता लगाया था। 1961 की जनगणना में 1100 भाषाओं को दर्ज किया गया। उन भाषाओं को छोड़कर जिनके बोलनेवाले दस हजार से कम थे, 2001 में यह आँकड़ा मात्र 122 माना गया। वडोदरा के रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर ने सभी कम-ज्यादा बोली जानेवाली भाषाओं को मिलाकर कुल 750 की सूचि तैयार की, जिनमें 22 अनुसूचित, 480 जन जातीय व घुमंतू  समुदायों सहित 80 समूद्रतटीय शामिल की गईं। इनमें से  पिछले पचास साल में कतरीबन 20 प्रतिशत भाषायें लुप्त हो चुकीं हैं, जिनमें अधिकांश आदिवासी व घुमंतू समुदायों की भाषायें हैं। फलतः इन सारी भाषाओं में निहित व्यवहारिक सरल व सहज शब्दों को अपनाकर हिन्दी कई नई चीजों को परिभाषित कर सकती है। सिक्किम की एक भाषा सिर्फ चार लोगों द्वारा बोली जाती है। इस तरह की विलुप्तता के कगार पर खड़ी भाषा के दो-तीन सुन्दर शब्दों को हिन्दी में समाहित कर हिन्दी को समृद्ध व आकषर्क बनाने के साथ इन भाषाओं को सम्मानित व अजर-अमर भी बना दिया जा सकता है। इसी तरह विदेशी भाषा में प्रयुक्त होनेवाले शब्दों के सहयोग से हिन्दी अपना शब्दकोश विशाल बना सकती है। यह काम आम आदमी की सोच पर न छोड़कर, विद्वानों व भाषाविदों से गठित समिति को सोंपना उचित प्रतीत होता है। अन्य भाषाओं के शब्दों को अंग्रेजी में समाहित करने एक आयोग स्थायी तौर पर कार्य कर रहा है, जो प्रति वर्ष ऐसे शब्दों की सूचि तैयारकर अधिकृत रूप से अंग्रेजी शब्दकोश में ले रहा है। इसी तरह सभी अन्य भाषाओं से हिन्दी में समाहित किये जानेवाले नये शब्दों की अधिकृत सूची प्रकाशित करना समय की आवश्यकता है।
दूसरी बड़ी आवश्यकता है हिन्दी के एक विशाल उत्कृष्ट साहित्य के निर्माण की, जो संस्कृत के विपुल साहित्य के समकक्ष खड़ा हो सके। उत्कृष्ट साहित्य का अर्थ मात्र आध्यात्मिक दर्शन तक साहित्य को सीमित करने का नहीं है। साहित्य की अनेकों विधाएं हैं और मनुष्य की सोच में अथाह गहराईयों तक पहुँचने की क्षमता है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि सोच का उथलापन समाज को दूषित करने सड़कछाप गंदे व भद्दे अर्थवाले शब्दों का चयनकर Best seller किताबों का बाजार सजावे। सोच वो हो जो ईश्वरीय वाणी-सी पवित्र होते हुए मानव हृदय को जीत सके और साथ ही मस्तिष्क को साहित्य की विविध विधाओं के माध्यम से परिमार्जित कर सके। रचनाओं में हास्य, विस्मय, श्रंगार आदि सभी रसों  का संचार सम्मानित शब्दों के जरिये हो, जो मनोरंजन भी करे और मानव सोच को द्वेष, घृणा, वैमनस्य आदि के दुष्प्रभाव से मुक्त रखे।
तीसरी प्रमुख आवश्यकता है भाषा का अपने आपको सम्मानित रखते हुए मानव जाति के सम्मान की संरक्षक बनी रहना। अतः उसके साहित्य में व्यापकता हो और वह अन्य सभ्यता, सोच, भाषा का आलिंगन सद्भाव व प्रेम से करे। घृणा, हिंसा, आरजगता, आतंक आदि को बढ़ावा देनेवाली रचनायें साहित्य को कलंकित करनेवाली ही नहीं होती, वे तो मानवीयता का हनन करनेवाली सामग्री होती हैं और लेखक की कलम को सबसे खूँखार व घृणित  हथियार बनाकर रह देती हैं।
चौथी आवश्यकता है अपनी स्वतः की भाषा को सम्मानित करने के लिये अन्य भाषा को भी सम्मानित करने का व्यवहार अपनाने की। इस विषय को निम्न दो उदाहरणों से स्पष्ट समझा जा सकता है।
दैनिक भास्कर, जबलपुर पृष्ठ 8 पर ‘अभिव्यक्ति’ के अंतर्गत ‘जीवन दर्शन’ में अति सुन्दर प्रसंगों को वर्णनित करता है। प्रस्तुत हैं दो उदाहरण:

‘‘दिनांक 2 अप्रेल 2013
सन् 1917 की घटना है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। उसी के साथ राष्ट्रभाषा सम्मेलन भी किया गया। इस सम्मेलन के सभापति थे लोकमान्य तिलक। गांधीजी, सराजिनी नायडू सहित अनेक बड़े नेता इसमें हिस्सा ले रहे थे। गांधीजी को छोड़कर सभी लोगों ने अंग्रेजी में अपने विचार प्रकट किए। सभापति तिलक ने भी अपना भाषण अंग्रेजी में दिया। गांधीजी को यह अच्छा नहीं लगा। वे राष्ट्रभाषा हिन्दी के बहुत बड़े पैरोकार थे। उन्होंने अपने भाषण में इस बात पर आपत्ति जताते हुए कहा, ‘लोकमान्य तिलक इस सम्मेलन के सभापति होने के साथ बहुत बड़े नेता हैं। यदि  राष्ट्रभाषा सम्मेलन का सभापति  ही विदेशी भाषा में विचार अभिव्यक्त करे तो यह कैसा राष्ट्रभाषा सम्मेलन?’ उनकी बात सुनकर तिलक ने अंग्रेजी में कहा, ‘आपका कहना उचित है, किन्तु यह मेरी विवशता है कि मैं हिन्दी नहीं जानता।’ तब गांधीजी बोले, ‘आप मराठी तो जानते हैं। संस्कृत भाषा के भी जानकार हैं। ये हमारे देश की भाषाऐं हैं।’ गांधीजी की बातों ने सभी अंग्रेजी वक्ताओं को भूल का अहसास करा दिया। शाम को जब तिलक का भाषण हुआ, तो वे हिन्दी में ही बोले। उन्होंने कहा, ‘आज मैं पहली बार हिन्दी में बोल रहा हूँ। मेरी भाषा में कई त्रुटियाँ होंगी। इसके लिये आप मुझे क्षमा करें। किन्तु मैं गांधीजी की इस बात से सहमत हूँ कि हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है और हमें अपना काम हिन्दी में ही करना चाहिये।’
यह प्रसंग उन लोगों के लिए सबक है, जो अंग्रेजी को हिन्दी भाषियों को हिकारत की निगाह से देखते हैं। निहितार्थ यह है कि विभिन्न भाषाओं का ज्ञान रखना बहुत अच्छी बात है, किन्तु हमारी राष्ट्रभाषा सर्वोपरि होनी चाहिये।’’
‘‘दिनांक 22 जून 2013
उन दिनों गांधीजी अपने वर्धा आश्रम में थे। उनसे मिलने के लिए देश भर से लोगों का आना-जाना लगा रहता था। देश में स्वतंत्रता के लिए गांधीजी ने अहिंसक लड़ाई छेड़ रखी थी। लाखों लोग गांधीजी के मार्ग के अनुयायी थे। उनकी विचारधारा से प्रभावित होनेवालों में मात्र भारतीय ही नहीं, बल्कि अंग्रेज भी शामिल थे। एक अकेले गांधीजी के आव्हान पर संपूर्ण देश का उनके पीछे चल पड़ना अंग्रेजों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। एक दिन गांधीजी से मिलने कोई अंग्रेज आया। वह हिन्दी भाषा का भी जानकार था। उसने सोचा कि हिंदुस्थान के इस महानायक से हिन्दी में बात करना उचित होगा। उसने गांधीजी से हिन्दी में वार्तालाप आरंभ किया। उसे यह देखकर हैरानी हुई कि गांधीजी ने उसके प्रश्नों का उत्तर अंग्रेजी में दिया। जब दोनों की वातचीत समाप्त हो गई, तो अंग्रेज अपनी जिज्ञासा रोक न पाया। उसने गांधीजी से पूछा, ‘महात्माजी! मैं आपकी राष्ट्रभाषा हिन्दी में आपसे बात करता रहा, किन्तु आपने अंग्रेजी का उपयोग किया। इसका क्या कारण है?’ गांधीजी सस्नेह स्वर में बोले, ‘जब आपको अंग्रेज होकर मेरी राष्ट्रभाषा से इतना प्रेम है, तो मैं आपकी भाषा क्यों न बोलूँ? फिर भाषाएं तो सभी की सम्मानीय होती हैं।’ गांधीजी के ये विचार सुनकर अंग्रेज के मन में उनके प्रति श्रद्धा और बढ़ गई। अपन भाषा के प्रति सर्वोच्च सम्मान और प्रेम रखने के साथ-साथ अन्य भाषाओं के प्रति भी आदर भाव रखना चाहिये। यह हमारी समभाव की उच्च भावना को दर्शाता है, जो भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान है।
उपरोक्त दोनों प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि सम्मान अपनी राष्ट्रभाषा का ही नहीं करना चाहिये, बल्कि उनका भी सम्मान करना चाहिये जो हमारी राष्ट्रभाषा का सम्मान करते हैं। सम्मान देते समय यह भेदभाव भी नहीं आने देना चाहिये कि सम्मान पानेवाला किस देश का है। सम्मान मनुष्य का नहीं बल्कि उसके सुन्दर विचार व कर्म का किया जाता है।’’
सारांश में मनुष्य का सम्मान भाषा से व्यक्त किया जाता है, सुन्दर विचार का श्रंगार भाषा से होता है और फिर जब इन विचारों से कर्म परिभाषित होते हैं, तो कर्म का समुचित संपादन भाषा के आपसी संवाद की सहजता पर निर्भर होता है।
और अंत में, यदि विश्व को अपनी पहुँच संस्कृत के अमूल्य साहित्य तक अक्षुण्ण बनाये रखने है तो उसे हिन्दी को कभी भी विलुप्त नहीं होने देना चाहिये और यदि हिन्दी विश्व भाषा बनती है तो इससे मानव जाति का कल्याण ही होगा क्योंकि इसी भाषा के माध्यम से संस्कृत साहित्य में निहित अमूल्य निधि को खोजा व समझा जा सकता है।

यह रचना भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है. आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं . आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है . 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ' ,'बूंद- बूंद  आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ है .

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  1. बहुत सार्थक रचना , हिंदी भाषा की बर्तमान स्थिति को समझने में सहायक . हिंदी की उन्नति में हम सभी को प्रयास करना चाहिए .

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  2. Hindi lang. in this is batter to Hindu life

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  3. hindi hain ham watan hai hindustan hamara , hindi ko ham padhenge , Hindi zuban hamari

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  4. वैधानिक चेतावनी : -- यह एक शोष हेतु उत्तम वषय हो सकता है..,
    आंग्ल भाषा में बहुंत से एस शब्द है जिनका प्रादुर्भाव संस्कृत भाषा से हुवा है जैसे : -- द्रप्स = ड्राप्स, पिष्ट=पेष्ट, नियर =नियर, दन्त =डैंट आदि, त्रि= थ्री, राय = रॉयल इत्यादि ।

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  5. भारत में एक अनपढ़ भी अमरीकन एवं बर्तानिया अंग्रेजी के कुछ शब्द तो बोल ही लेता है, बर्तानिया फिर भी अन्य भाषाएँ सिख रहे हैं, अमरीका का पता नहीं.....

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  6. " आपका वेश भी आपके विचारों को अभिव्यक्त करता है" टाई-साई पहन के हिंदी पर भाषण..?

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  7. Vesh vichar ko abhivakta nahi karta. Sari pahnane se purush nari jaisa nahi ban sakta ya nari jaisa nahi soch sakta.

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  8. श्री भूपेंद्र दुबे जी,

    आपकी रचना से बहुत जानकारी मिली धन्यवाद.
    एक संशय है आशा है आप निवारण कर सकेंगे. आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा कहा है. आप ही ने बताया कि काँग्रेस के अधिवेशन के साथ राष्ट्रभाषा सम्मेलन भी हुआ. यानि काँग्रेस के अधिवेशन के साथ राष्ट्रभाषा जूड़ी है. मुझे ऐसा कोई ज्ञान नहीं है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा बनी है. हा जिन नेताओं को नाम आपने जिक्र किए हैं उन सबने व अन्यों ने भी भरसक कोशिश की.. कृपया ऐसा कोई दस्तवेज जिसमें हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित की गई हो, आपके पास उपलब्ध हो तो कृपया साझा करें. मेरा ईमेल laxmirangam@gmail.com है. मोबाईल नं. 8462021340 . आशा करता हूँ कि आप मेरे ज्ञान वर्धन में बागीदार होंगे.
    रंगराज अयंगर.

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  9. श्री भूपेंद्र दुबे जी,

    आपकी रचना से बहुत जानकारी मिली धन्यवाद.
    एक संशय है आशा है आप निवारण कर सकेंगे. आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा कहा है. आप ही ने बताया कि काँग्रेस के अधिवेशन के साथ राष्ट्रभाषा सम्मेलन भी हुआ. यानि काँग्रेस के अधिवेशन के साथ राष्ट्रभाषा जूड़ी है. मुझे ऐसा कोई ज्ञान नहीं है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा बनी है. हा जिन नेताओं को नाम आपने जिक्र किए हैं उन सबने व अन्यों ने भी भरसक कोशिश की.. कृपया ऐसा कोई दस्तवेज जिसमें हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित की गई हो, आपके पास उपलब्ध हो तो कृपया साझा करें. मेरा ईमेल laxmirangam@gmail.com है. मोबाईल नं. 8462021340 . आशा करता हूँ कि आप मेरे ज्ञान वर्धन में बागीदार होंगे.
    रंगराज अयंगर.

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