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महेंद्र भटनागर 

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इन बड़री-बड़री अँखियों से
मत देखो प्रिय ! यों मेरी ओर !
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इतने आकर्षण की छाया
जल-से अंतर पर मत डालो,
मैं पैरों पड़ता हूँ, अपनी
रूप-प्रभा को दूर हटालो,
अथवा युग नयनों में भर लो
फेंक रेशमी किरनों की डोर !
इन बड़री-बड़री अँखियों से
मत देखो प्रिय ! यों मेरी ओर !
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और न मेरे मन की धरती
पर सुख-स्नेह-सुधा बरसाओ,
यह ठीक नहीं, वश में करके
प्राणों को ऐसे तरसाओ,
छू लेने भर दो, कुसुमों से
अंकित जगमग आँचल का छोर !
इन बड़री-बड़री अँखियों से
मत देखो प्रिय ! यों मेरी ओर !
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इस सुषमा की बरखा में तो
पथ भूल रहा है भीगा मन,
तुम उत्तरदायी, यदि सीमा
तोड़े यह उमड़ा नद-यौवन,
आ जाओ ना कुछ और निकट
यों इतनी तो मत बनो कठोर !
इन बड़री-बड़री अँखियों से
मत देखो प्रिय ! यों मेरी ओर !
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महेंद्र भटनागर स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी-कविता के बहुचर्चित यशस्वी हस्ताक्षर हैं। महेंद्रभटनागर-साहित्य के छह खंड 'महेंद्रभटनागर-समग्र' अभिधान से प्रकाशित हो चुके हैं।महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा के तीन खंडों में उनकी अठारह काव्य-कृतियाँ समाविष्ट हैं। महेंद्रभटनागर की कविताओं के अंग्रेज़ी में ग्यारह संग्रह उपलब्ध हैं। फ्रेंच में एक-सौ-आठ कविताओं का संकलन प्रकाशित हो चुका है। तमिल में दो, तेलुगु में एक, कन्नड़ में एक, मराठी में एक कविता-संग्रह छपे हैं। बाँगला, मणिपुरी, ओड़िया, उर्दू, आदि भाषाओं के काव्य-संकलन प्रकाशनाधीन हैं।

DR. MAHENDRA BHATNAGAR
Retd. Professor


110, BalwantNagar, Gandhi Road,

GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA
Ph. 0751- 4092908
E-Mail : drmahendra02@gmail.com


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  1. आदरणीय महेंद्र भटनागर जी के श्री चरणों में प्रणाम ! रचना बहुत अच्छी ,सुन्दर मन को प्यारी लगी | ह्रदय को आह्लादित करदी |आपको बार बार नमन वन्दन

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