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आओ जलाएँ


कलुष-कारनी कामनाएँ !
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नये पूर्ण मानव  बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त,अनुपम
    आओ जगाएँ
    भुवन-भाविनी भावनाएँ !
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नहीं हो  परस्पर  विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता, 
    आओ मिटाएँ
    दलन-दानवी-दासताएँ !
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कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों  न नभ पर  प्रभंजन,
    आओ बहाएँ
    अधम आसुरी आपदाएँ !
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