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सरोकार और सृजन /महेंद्र भटनागर

महेंद्र भटनागर 
महेंद्र भटनागर स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी-कविता के बहुचर्चित यशस्वी हस्ताक्षर हैं।महेंद्रभटनागर-साहित्य के छह खंड 'महेंद्रभटनागर-समग्र' अभिधान से प्रकाशित हो चुके हैं।  'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' के तीन खंडों में उनकी अठारह काव्य-कृतियाँ समाविष्ट हैं। महेंद्रभटनागर की कविताओं के अंग्रेज़ी में ग्यारह संग्रह उपलब्ध हैं। फ्रेंच में एक-सौ-आठ कविताओं का संकलन प्रकाशित हो चुका है। तमिल में दो, तेलुगु में एक, कन्नड़ में एक, मराठी में एक कविता-संग्रह छपे हैं। बाँगला, मणिपुरी, ओड़िया, उर्दू, आदि भाषाओं के काव्य-संकलन प्रकाशनाधीन हैं। 
 महेन्द्र भटनागर के कवि-मन की सिफ़त इस बात में है कि लाभ-लोभपद-प्रतिष्ठा के सारे प्रलोभनों से अलगअपनी विश्व-दृष्टि और अपने विचार के प्रति पूरी निष्ठा के साथअपनी चादर को बेदाग रखते हुए वे नई सदी की दहलीज़ तक अपने स्वप्न और अपने संकल्पों के साथ आ सके हैं।
एक लम्बे रचना-काल का साक्ष्य देती इन कविताओं में सामाजिक यथार्थ की बहु-आयामी और मनोभूमि और मनोभावनाओं की बहुरंगी प्रस्तुति है। इनमें युवा-मन की ऊर्जा, उमंग, उल्लास और ताज़गी है तो उसका अवसाद, असमंजस और बेचैनी भी। ललकार,चेतावनी, उद्बोधन और आह्नान है तो वयस्क मन के पके अनुभव तथा उन अनुभवों की आँच से तपी-निखरी सोच भी है। कहीं स्वरों में उद्घोष है तो कहीं वे संयमित हैं। समय की विरूपता, क्रूरता और विद्रूपता का कथन है तो इस सबके खिलाफ़ उठे प्रतिरोध के सशक्त स्वर भी। समय के दबाव हैं तो उनका तिरस्कार करते हुए मुखर होने वाली आस्था भी। परन्तु इन कविताओं में मूलवर्ती रूप में सारे दुख-दाह और ताप-त्रास के बीच जीवन के प्रति असीम राग की ही अभिव्यक्ति है। आदमी के भविष्य के प्रति अप्रतिहत आस्था की कविताएँ हैं ये,और इस आस्था का स्रोत है कवि का इतिहास-बोध और उससे उपजा उसका 'विज़न'। कवि के उद्बोधनों में, आदमी के जीवन को नरक बनाने वाली शक्तियों के प्रति उसकी ललकार में एवं आदमी के उज्ज्वल भविष्य के प्रति उसकी निष्कम्प आस्था में उसके इस 'विज़न'को देखा जा सकता है।

महेंद्र भटनागर का काव्य संग्रह  'सरोकार और सृजन'  हिंदीकुंज में प्रस्तुत किया जा रहा है .आप इस रचना को पढने के साथ साथ  भी कर सकते है . हमें आपके सुझाओं की प्रतीक्षा रहेगी . धन्यवाद।  


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