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पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'

प्रातः आठ साढ़े आठ बजे का समय था। रात को किसी पारसी कम्पनी का कोई रद्दी तमाशा अपने पैसे वसूल करने के लिए दो बजे तक झख मार-मार कर देखते रहने के कारण सुबह नींद कुछ विलम्ब से टूटी। इसी से उस दिन हवाखोरी के लिए निकलने में कुछ देर हो गई थी और लौटने में भी।
मैं वायु सेवन के लिए अपने घर से कोई चार मील की दूरी तक रोज ही आया-जाया करता था। मेरे घर और उस रास्ते के बीच में हमारे शहर का जिला जेल भी पड़ता था, जिसकी मटमैली, लम्बी-चौड़ी और उदास चहारदीवारियाँ रोज आगे ही मेरी आँखों के आगे पड़ती और मेरे मन में एक प्रकार की अप्रिय और भयावनी सिहर पैदा किया करती थी।
मगर उस दिन उसी जेल के दक्षिणी कोने पर अनेक घने और विस्तृत वृक्षों की अनुज्ज्वल छाया में मैंने जो कुछ देखा, उसे मैं बहुत दिनों तक चेष्टा करने पर भी शायद न भूल सकूँगा। मैंने देखा कि मुश्किल से तेरह-चौदह वर्ष का कोई रूखा पर सुन्दर लड़का, एक पेड़ की जड़ के पास अर्धनग्नावस्था में पड़ा तड़प रहा है और हिचक-हिचक कर बिलख रहा है। उसी लड़के के सामने एक कोई परम भयानक पुरुष असुन्दर भाव से खड़ा हुआ, रूखे शब्दों में उससे कुछ पूछ-ताछ कर रहा था। यह सब मैंने उस छोटी सड़क पर से देखा, जो उस स्थान से कोई पचीस-तीस गज की दूरी पर थी। यद्यपि दिन की बाढ़ के साथ-साथ तपन की गरमी भी बढ़ रही थी और यद्यपि मैं थका और अनमना सा भी था, पर मेरे मन की उत्सुकता उस दयनीय दृश्य का भेद जानने को मचल उठी। मैं धीरे-धीरे उन दोनों की नज़र बचाता हुआ उनकी तरफ़ बढ़ा।
अब मुझे ज्ञात हुआ कि लड़का क्यों बिलख रहा था। मैंने देखा, उसके शरीर के मध्य-भाग पर, जो खुला हुआ था, प्रहार के अनेक काले और भयावने चिह्न थे। उसको बेंत लगाए गए थे। बेंत लगाए गए थे उस कोमल-मति गरीब बालक को अदालत की आज्ञा से। मेरा दिल धक् से होकर रह गया। न्याय ऐसा अहृदय, ऐसा क्रूर होता है?
अब मैं आड़ में लुक कर उस तमाशे को न देख सका। झट मैं उन दोनों के सामने आ खड़ा हुआ और उस भयानक प्राणी से प्रश्न करने लगा-क्या इसको बेंत लगाए गए हैं?
हाँ, उत्तर देने से अधिक गुर्रा कर उस व्यक्ति ने कहा-देखते नहीं हैं आप? ससुरे ने जमींदार के बाग से दो कटहल चुराए थे।
लड़का फिर पीड़ा और अपमान से बिलबिला उठा। इस समय वह छाती के बल पड़ा हुआ था, क्योंकि उसके घाव उसे आराम से बेहोश भी नहीं होने देना चाहते थे। वह एक बार तड़पा और दाहिनी करवट होकर मेरी ओर देखने की कोशिश करने लगा। पर अभागा वैसा न कर सका। लाचार फिर पहले ही सा लेट कर अवरुद्ध कण्ठ से कहने लगा-नहीं बाबू, चुरा कहाँ सका? भूख से व्याकुल होकर लोभ में पड़ कर मैं उन्हें चुरा जरूर रहा था, पर जमींदार के रखवालों ने मुझे तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया।
'गिरफ्तार कर लिया तो तेरे घर वाले उस वक्त कहाँ थे?'नीरस और शासन के स्वर में उस भयानक पुरुष ने उससे पूछा-'क्या वे मर गए थे? तुझे बचाने-जमींदार से, पुलीस से, बेंत से-क्यों नहीं आए?'
'तुम विश्वास ही नहीं करते?' लड़के ने रोते-रोते उत्तर दिया-'मैंने कहा नहीं, मैं विक्रमपुर गाँव का एक अनाथ भिखमंगा बालक हूँ। मेरे माता-पिता मुझे छोड़ कर कब और कहाँ चले गए, मुझे मालूम नहीं। वे थे भी या नहीं, मैं नहीं जानता। छुटपन से अब तक दूसरों की जूठन और फटकारों में पला हूँ। मेरे अगर कोई होता तो मैं उस गाँव के जमींदार का चोर क्यों बनता? मेरी यह दुर्गति क्यों होती?...आह...बाप रे...बाप...।'
वह गरीब फिर अपनी पुकारों से मेरे कलेजे को बेधने लगा। मैं मन ही मन सोचने लगा कि किस रूप से मैं इस बेचारे की कोई सहायता करूँ। मगर उसी समय मेरी दृष्टि उस भयानक पुरुष पर पड़ी, जो जरा तेजी से उस लड़के की ओर बढ़ रहा था। उसने हाथ पकड़ कर अपना बल देकर उसको खड़ा किया।
'तू मेरी पीठ पर सवार हो जा।' उसी रूखे स्वर में उसने कहा-'मैं तुझे अपने घर ले चलूँगा।'
'अपने घर?' मैंने विवश भाव से उस रूखे राक्षस से पूछा--'तुम कौन हो? कहाँ है तुम्हारा घर?...और इसको अब वहाँ क्यों लिए जाते हो?'
'मैं जल्लाद हूँ बाबू' लड़के को पीठ पर लादते हुए खूनी आँखों से मेरी ओर देख कर लड़खड़ाती आवाज़ में उसने कहा-'मैं कुछ रुपयों का सरकारी गुलाम हूँ। मैं सरकार की इच्छानुसार लोगों को बेंत लगाता हूँ तो प्रति प्रहार कुछ पैसे पाता हूँ और प्राण लेता हूँ तो प्रति प्राण कुछ रुपये।'
'फाँसी की सजा पाने वालों से तो नहीं, बेंत खाने वालों से सुविधानुसार मैं रिश्वत भी खाता हूँ। सरकार की तलब से मैंने तो बाबू यही देखा है-बहुत कम सरकारी नौकरों की गुजर हो सकती है। इसी से सभी अपने-अपने इलाकों में ऊपरी कमाई के 'कर' फैलाए रहते हैं। मैं गरीब छोटा सा गुलाम हूँ, मेरी रिश्वत की चर्चा तो वैसी चमकीली है भी नहीं कि किसी के आगे कहने में मुझे कोई भय हो। मैं तो सबसे कहता हूँ कि कोई मुझे पूजे तो मैं उसके सगे-सम्बन्धियों को 'सुच्चे' बेंत न लगा कर 'हलके' लगाऊँ। और नहीं...तो सड़ासड़...सड़ासड़...।
उसने ऐसी मुद्रा बना ली जैसे किसी को बेंत लगा रहा हो। वह भूल गया कि उसकी पीठ पर उसकी 'सड़ासड़' का एक गरीब शिकार काँप रहा है।
'मगर इस अनाथ को 'सुच्चे' बेंत लगा कर मैंने ठीक काम नहीं किया। इसने जेल में ही बताया था कि मेरे कोई नहीं है। मगर मैंने विश्वास नहीं किया। मैं अपने जिस शिकार का विश्वास नहीं करता, उसके प्रति भयानक हो उठता हूँ, और मेरा भयानक होना कैसा वीभत्स होता है, इसे आप इस लड़के की पीठ पर देखें। मगर इसे काट कर मैंने गलती की। यही न जाने क्यों मेरा मन कह रहा है।
'इसी से बाबू मैं इसे अपने घर ले जा रहा हूँ, वहाँ इसके घाव पर केले का रस लगाऊँगा और इसको थोड़ा आराम देने के लिए 'दारू' पिलाऊँगा, बिना इसको चंगा किए मेरा मन सन्तुष्ट न होगा, यह मैं खूब जानता हूँ।'
भैंसे की तरह अपनी कठोर और रूखी पीठ पर उस अनाथ अपराधी को लाद कर वह एक ओर बढ़ चला। मगर मैंने उसे बाधा दी-
'सुनो तो, मुझसे भी यह एक रुपया लेते जाओ। मुझको भी इस लड़के की दुर्दशा पर दया आती है।'
'क्या होगा रुपया बाबू? भयानकता से मुस्करा कर उसने रुपये की ओर देखा और उसको मेरी उँगलियों से छीन कर अपनी उंगलियों में ले लिया।'
'उसको दारू पिलाना, पीड़ा कम हो जाएगी। अभी एक ही रुपया जेब में था, मैं शाम को इसके लिए कुछ और देना चाहता हूँ। तुम्हारा घर कहाँ है? नाम क्या है?'
'मैं शहर के पूरब उस कबरिस्तान के पास के डोमाने में रहता हूँ, डोमों का चौधरी हूँ, मेरा नाम रामरूप है। पूछ लीजिएगा।'
उस अनाथ लड़के का नाम 'अलियार' था, यह मुझे उस घटना के सातवें या आठवें दिन मालूम हुआ। ग्रामीणों में अलियार शब्द 'कूड़ा-कर्कट' के पर्याय रूप में प्रचलित है। उस लड़के ने मुझे बताया। उसके गाँव वालों का कहना है कि उसे पहले-पहल गाँव के एक 'भर' ने अलियार पर पड़ा पाया था। उसी ने कई वर्षों तक उसे पाला भी और उसका उक्त नामकरण भी किया।
अलियार के अंग पर के बेंतों के घाव, बधिक रामरूप के सफल उपायों से तीन-चार दिनों के भीतर ही सूख चले, मगर वह बालक बड़ा दुर्बल-तन और दुर्बल-हृदय था। सम्भव है, उसको बारह बेंतों की सजा सुनाने वाले मजिस्ट्रेट ने, पुलिस की मायामयी डायरियों पर विश्वास कर, उसकी उम्र अठारह या बीस वर्ष मान ली हो, मगर मेरी नज़रों में तो वह बेचारा चौदह-पन्द्रह वर्षों से अधिक वयस का नहीं मालूम पड़ा। तिस पर उसकी यह रूखी-सूखी काया, आश्चर्य, किसी डाक्टर ने किस तरह उसको बेंत खाने योग्य घोषित किया होगा। जेल के किसी जिम्मेदार और शरीफ अधिकारी ने किस तरह अपने सामने उस बेचारे को बेंतों से कटवाया होगा।
जब तक अलियार खाट पर पड़ा-पड़ा कराहता रहा, अपने उसे बेंत खाने के भयानक अनुभव का स्वप्न देख-देख कर अपनी रक्षा के लिए करुण दुहाइयाँ देता रहा, तब तक मैं बराबर, एक बार रोज, रामरूप की गन्दी झोपड़ी में जाता था और अपनी शक्ति के अनुसार प्रभु के उस असहाय प्राणी की मन और धन से सेवा करता था, मगर मेरे इस अनुराग में एक आकर्षण था और यह था जल्लाद रामरूप।
न जाने क्यों उसका यह 'अलकतरा' रंग, उसकी भयानक नैपालियों-सी नाटी काया, उसका वह मोटा, वीभत्स अधर और पतला ओंठ, जिस पर घनी काली, भयावनी तथा अव्यवस्थित मूँछों का भार अशोभायमान था, मुझे कुछ अपूर्ण सा मालूम पड़ता था। न जाने क्यों उसकी बड़ी-बड़ी, डोरीली, नीरस और रक्तपूर्ण आँखें मेरे मन में एक तरह की सिहर सी पैदा कर देती थीं। पर आश्चर्य, इतने पर भी मैं उसे अधिक से अधिक देखना और समझना चाहता था।
उसकी मिट्टी की झोपड़ी में उसके अलावा उसकी प्रौढ़ा स्त्री भी थी। एक दिन जब मैंने रामरूप से उसकी जीवनी पूछी और यह पूछा कि उसके परिवार का कोई और भी कहीं है या नहीं, तो उसने अपनी विचित्र कहानी मुझे सुनाई।
'बाबू' उसने बताया-'पुश्त दो पुश्त से नहीं, मेरे खानदान में तेरह पुश्तों से यही जल्लादी का काम होता है। हाँ, उसके पहले मुसलमानी राज में मेरे पुरखे डाके डाला करते थे। मेरे दादा के दादा ऐसे प्रतापी थे कि सन् ५७ के गदर में उन्होंने इसी शहर के उस दक्षिणी मैदान में सरकार बहादुर के हुकुम से पाँच सौ और तीन पचीस और दो दस आदमियों को चन्द दिनों के भीतर ही फाँसी पर लटका दिया था। उन दिनों वह आठों पहर शराब छाने रहा करते थे। ...और कैसी शराब? मामूली नहीं बाबू, गोरों के पीने वाली-अंगरेजी।'
मैंने उसे टोका-रामरूप, क्या अब भी फाँसी देने से पूर्व तुम लोगों को शराब मिलती है?
'हाँ, हाँ, मिलती क्यों नहीं बाबू, मगर देसी की एक बोतल का दाम मिलता है, विलायती का नहीं, जिसको छान-छान कर मेरे दादा के दादा गाहियों के गाही लोगों को काल के पालने पर सुला देते थे। यही मेरे खानदान में सबसे अधिक धनी और जबरदस्त भी थे। लम्बे-चौड़े तो वह ऐसे थे कि बड़े-बड़े पलटनिये साहब उनका मुँह बकर-बकर ताका करते थे। मगर उनमें एक दोष भी बहुत बड़ा था। वह शराब बहुत पीते थे। इसी में वह तबाह हो गए और मरते-मरते गदर की सारी कमाई फूँक-ताप गए। हाँ, मैं भूल कर गया बाबू, वह मरे नहीं, बल्कि शराब के नशे में एक दिन बड़ी नदी में कूद पड़े और तब से लापता हो गए। नदी के उस ऊँचे घाट पर हमारे दादा ने उनका 'चौरा्' भी वनवाया है, जिसकी सैकड़ों डोम पूजा किया करते हैं और हमारे वंश के तो वह 'वीर' ही हैं।'
अपने वीर परदादा के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए, उनकी कहानी समाप्त करते-करते रामरूप ने धीरे से अपने कान उमेठे।
'रामरूप', मैंने कहा-'जाने दो अपने पुरखों की कहानी। वह बड़ी ही भयानक है। अब तुम यह बताओ कि तुम्हारे कोई बच्ची-बच्चा भी है?'
'नहीं बाबू', किञ्चित गम्भीर होकर उसने कहा-'मेरी औरतिया को, कोई सात बरस हुए-एक लड़का हुआ ज़रूर था, मगर वह दो साल का होकर जाता रहा। बच्चे तो वैसे भी मेरे खानदान में बहुत कम जीते हैं। न जाने क्यों, जहाँ तक मुझे मालूम है, मेरे किसी भी पुरखे का एक से ज्यादा बच्चा नहीं बचा। मुझको तो वह भी नसीब नहीं। मेरी लुगैया तो अब बूढ़ी हो जाने पर भी बच्चा-बच्चा रिरियाती रहती है। मगर यह मेरे बस की बात तो है नहीं। मैं तो आप ही चाहता हूँ कि मेरे एक वीर बच्चा हो, जो हमारे इस पुश्तैनी रोजगार को मेरे बाद संभाले, पर जब दाता देता ही नहीं तब कोई क्या करे?'
'जब तक तुम्हारे और कोई नहीं है' मैंने उस जल्लाद के हृदय की थाह ली-'तब तक तुम इसी भिखमंगे को क्यों नहीं पालते-पोसते? तुमने कुछ अन्दाज लगाया है? कैसा है उसका मिजाज? यह तुम्हारे यहाँ खप जाने लायक है?'
'है तो, और मेरी लुगइया उसको चाहती भी है।' रामरूप ने ज़रा मुस्करा कर कहा-'पर मेरे अन्दाज से वह अलियार कुछ दब्बू और डर्रू है। और मेरे लड़के को तो ऐसा निडर होना चाहिए कि जरूरत पड़े तो बिना डरे काल की भी खाल खींच ले और जान निकाल ले। यह मंगन छोकरा भला मेरे रोजगार को क्या सँभालेगा?'
'कोई दूसरा रोजगार देखो रामरूप', मैंने कहा-'छोड़ो इस हत्यारे व्यापार को, इसमें भला तुम्हें क्या आनन्द मिलता होगा। ग़ज़ब की है तुम्हारी छाती, जो तुम लोगों को प्रसन्न भाव से बेंत लगाते हो और फाँसी के तख्ते पर चढ़ा कर अपने परदादा के शब्दों में काल के पालने में सुला देते हो, मगर यह सुन्दर नही।'
'हा, हा, हा, हा' रामरूप ठठाया-'आप कहते हैं यह सुन्दर नहीं। नहीं बाबू, हमारे लिए यह परम सुन्दर है। आप जानते ही हैं कि मैं आप लोगों की 'नीच जाति' का एक तुच्छ प्राणी हूँ। आप तो नए ख़याल के आदमी हैं, इसलिए न जाने क्या समझ कर इस लड़के के प्रेम में मेरी झोपड़ी तक आए भी हैं, नहीं तो मैं और मेरी जाति इस इज्जत के योग्य कहाँ? मेरे घर वाले जल्लादी न करते, तो आप लोगों के मैले साफ करते और कुत्तों को मारते। मगर-हा, हा, हा, हा-कुत्तों को मारने से तो आदमी मारना कहीं अच्छा है, इसे आप भी मानेंगे, यद्यपि मेरी समझ से कुत्ता मारना और आदमी मारना, जल्लाद के लिए एक ही बात है। हमारे लिए वे भी अपरिचित और निरपराध और ये भी। दूसरों के कहने पर हम कुत्तों को भी मारते हैं और कुत्तों से ज्यादा समझदारों-आदमियों- को भी।'
इसके बाद मुझे एक काम के सिलसिले में बम्बई जाना पड़ा और वहीं पूरे दो महीने रुकना पड़ा। लौटने पर भूल गया उस जल्लाद को और परिचित उस अलियार को। प्रायः दो बरस तक उनकी कोई खबर न ली। फुर्सत भी अपनी मानविक हाय-हायों से, इतनी न थी कि उनकी ओर ध्यान देता।

शेष अगले अंक में ....

पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र  का जन्म १९०० में उत्तेर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के चुनार नामक कस्बे में हुआ था ये प्रेमचंद युग के सबसे बदनाम उपन्यासकार हुएइन्होने अपने उपन्यासों में समाज की बुराइयो को ,उसकी नंगी सच्चाई को बिना लाग -लपट के बड़े साहस के साथ ,किंतु सपाट बयानबाज़ी से प्रस्तुत किया । उन्होंने अपनी रचनाओ में समाज के उस वर्ग को अपने साहित्य का बिषय बनाया जिसे दलित या पतित वर्ग कहते है और उसके दर्शाने में उन्होंने किसी प्रकार के शील या अभिजात का परिचय नही दिया। इन्होने कलकत्ता के मारवाडी समाज को भी अपने साहित्य का विषय बनाया सन १९६७ में दिल्ली  में इनका देहांत हो गया। इनकी प्रमुख रचनाओं में चंद हसीनों के खतूत ,दिल्ली का दलाल ,फागुन के दिन चार आदि है .

 

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  1. jallad ki kahani aage bdain aap ki kahani acchi lagi

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  2. I really appreciate your work as well as u have a lot of collection of poetry and Stories.keep it up.Good job done

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