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अमीर  ख़ुसरो 
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके
मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजव
अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
ख़ुसरो निजाम के बल बल जाए
मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके॥ 

अमीर खुसरो को हिंदी का पहला लोकप्रिय कवि माना जाता है । खुसरो अरबी ,फारसी ,तुर्की और हिंदी के विद्वान थे तथा इन्हें संस्कृत का भी थोडा बहुत ज्ञान था । इन्होने कविता की ९९ पुस्तकें लिखी जिनमे कई लाख शेर थे । पर अब इनके केवल २० -२२ ग्रन्थ ही प्राप्य है। इन्होने  फारसी से अधिक हिंदी में लिखा है । इनके साहित्य में भी समय समय पर प्रक्षेपों का समावेश होता रहा है। इनकी कुछ पहेलियाँ ,मुकरियां और फुटकर गीत उपलब्ध होते है ,जिनसे इनकी विनोदी प्रकृति का भली भातिं परिचय मिल जाता है । मनोरंजन के खजाने  से मालामाल सूफियों में अग्रणी कवि अमीर खुसरों ने अपनी सहज मनोवृति के कारण जन सामान्य को उन्मुक्त ह्रदय से मालामाल कर दिया ।
विडियो के रूप में देखें :- 

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  1. खुसरो गागर प्रेम की छलकत जाए अपार ।
    जो पिए सो प्यास बुझे ना पिए वो बेकार ||

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  2. खुसरो गागर प्रेम की छलकत जाए अपार ।
    जो पिए सो प्यास बुझे ना पिए वो बेकार ||

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  3. बचपन की पढ़ी हुई प्रेमचन्द की हृदय विदारक कहानी 'बूढ़ी काकी' आज पुन: मन को झकझोर गयी।

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  4. वाकई ख़ुसरो साहब....कलम के अमीर थे...सूफ़ी कविताओं में आज भी इनका कोई सानी नहीं...।

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