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हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले

आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले

किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले

दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले

हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले

हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाज़ी हार चले

अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले


भगवतीचरण वर्मा ( 1903 ई-1981 ई.) हिन्दी जगत के प्रमुख साहित्यकार है। इन्होंने लेखन तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में ही प्रमुख रूप से कार्य किया।

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  1. यह रचना फि‍र पढ़ी उतनी ही अच्‍छा लगा

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  2. हस्ती ना पूछ दीवाने की................ भगवती चरण वर्मा जी की रचना और किसी को नापसंद हो................ असंभव !!!

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  3. ye kavita desh ko aazaad karne waale kraantikariyon ke liye likhi gayi hai

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  4. मत चेत , ह्रदय , हो मस्ताना , चेता तो मस्ताना क्या ?
    रह अपनी धुन में मस्त ,न सुन है कहता तुझे ज़माना क्या ?

    बहुत दिनों के बाद फिर से पढ़ा अत्यंत ही अच्छा लगा

    उत्तर देंहटाएं

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