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! मेरे भारत, बोल ,क्या तू सह सकेगा और
बलिदानी ?
बलिदान की घड़ी तो नहीं हुई ,बहुत पुरानी
तेरे जैसे सत्य - अहिंसा चाहने वाले देश में
क्यों आते है खूंखार भेड़िये नर मानव के वेष में ?
रक्षक ही भक्षक बन गए थे उस दिन
चन्दन भी विष बना था एक दिन
सोचनीय स्थिति है तू कैसे सम्भला होगा ?
हिमालय डगमगा गया होगा और सूरज भी काँप गया होगा
ईश्वर तुझे दे शक्ति ह्रदय को थामे रखने की
क्योंकि गयी नहीं प्रवृत्ति अभी नर की नर को मारने की


यह रचना माधवी त्रिपाठी जी द्वारा लिखी गयी है .उनकी यह कविता उनके काव्य - संग्रह 'इन्द्रधनुष' से लिया गया है.माधवी जी,कलकत्ता में अध्यापिका के रूप में कार्यरत है. आकाशवाणी के युववाणी कार्यक्रम में आपकी कई कविताओं  का  सफलतापूर्वक प्रसारण हुआ है  तथा कलकत्ता के प्रसिद्ध समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में आपके विविध लेखों और रचनाओं का समय - समय पर प्रकाशन होता रहता है .

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  1. sundar rachna..desh ke haalaat zarur sudherenge madhavi ji .kyonki insan ban kar aa raha naya savera.......agli rachna ka intezaar rahega.

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  2. aapki rachna mujhe bahut pasand aayi.aap ek achhi rachnakar ho.

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  3. aap sabko dhher sara dhanyavaad.....madhavi.

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  4. mam its wonderful poem..touched us very deeply..thank u for this piece.looking forward to other poems too.

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  5. bahut khoob madhavi....v r really proud of you..bahut achhi kavita hai ..indradhanush ke liye badhai...

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  6. Tumhare yeh rachna yuva peri k liye prerna hai ise prakar aage barte raho
    divya ne kaha

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  7. Tumhare yeh rachna yuva varg k liye prerna hai isi tarah samaj ka marg darshan karte raho

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  8. miss its really very nice.. Loved it.. Very inspiring..

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  9. miss its really very nice.. Loved it.. Very inspiring.. Congratulations..

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