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रणजीत कुमार 

इस अँधेरी कोठरी में एक रोशनदान है 


मन में खलबली के बाहर खुला आसमान है 

आँखें मेरी हैं टिकी उन्मुक्त फैले पंखों पर 

उड़ने की उत्कंठा इस बात का प्रमाण है 


कि स्वप्न खुले आँखों से जब भी हूँ मैं देखता

तो पतन के राह में भी मेरी उत्थान है

की मैं अकेला हूँ नहीं, है साथ वो, हमराही है

जीवन के कोरे कागज़ पर उसने उढ़ेली स्याही है

वो है तो हूँ मैं , मेरी कविता है मेरी गीत है

उसकी कृपा सदैव जो, मेरे हार में भी जीत है ..............


 यह कविता रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य विज्ञान के क्षेत्र में है ,साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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  1. बेनामीजून 04, 2012 5:37 pm

    बहोत सुंदर रचना . . .

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  2. laxmi narayan mishraजून 05, 2012 10:55 pm

    bahut sahi bhai.bahut achchhi kavita hai.

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  3. बेनामीजून 07, 2012 1:55 pm

    Pankh pasaroo aur uud jaoo pyare..life it too short .. enjoy..good poetry , please write some more.. love them God bless you.

    उत्तर देंहटाएं

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