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महेंद्र भटनागर 
तपता अम्बर, तपती धरती,
तपता रे जगती का कण-कण !

त्रास्त विरल सूखे खेतों पर 
बरस रही है ज्वाला भारी,
चक्रवात, लू गरम-गरम से
झुलस रही है क्यारी-क्यारी,
चमक रहा सविता के फैले 
प्रकाश से व्योम-अवनि-आँगन !

जर्जर कुटियों से दूर कहीं
सूखी घास लिए नर-नारी,
तपती देह लिए जाते हैं, 
जिनकी दुनिया न कभी हारी,
जग-पोषक स्वेद बहाता है, 
थकित चरण ले, बहते लोचन !

भवनों में बंद किवाड़ किये,
बिजली के पंखों के नीचे,
शीतल ख़स के परदे में 
जो पड़े हुए हैं आँखें मींचे,
वे शोषक जलना क्या जानें
जिनके लिए खड़े सब साधन !

रोग-ग्रस्त, भूखे, अधनंगे
दमित, तिरस्कृत शिशु दुर्बल,
रुग्ण दुखी गृहिणी जिसका क्षय 
होता जाता यौवन अविरल,
तप्त दुपहरी में ढोते हैं 
मिट्टी की डलियाँ, फटे चरण !


महेंद्र भटनागर स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी-कविता के बहुचर्चित यशस्वी हस्ताक्षर हैं। महेंद्रभटनागर-साहित्य के छह खंड 'महेंद्रभटनागर-समग्र' अभिधान से प्रकाशित हो चुके हैं।  'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' के तीन खंडों में उनकी अठारह काव्य-कृतियाँ समाविष्ट हैं। महेंद्रभटनागर की कविताओं के अंग्रेज़ी में ग्यारह संग्रह उपलब्ध हैं। फ्रेंच में एक-सौ-आठ कविताओं का संकलन प्रकाशित हो चुका है। तमिल में दो, तेलुगु में एक, कन्नड़ में एक, मराठी में एक कविता-संग्रह छपे हैं। बाँगला, मणिपुरी, ओड़िया, उर्दू, आदि भाषाओं के काव्य-संकलन प्रकाशनाधीन हैं।
संपर्क :-

DR. MAHENDRA BHATNAGAR
Retd. Professor

110, BalwantNagar, Gandhi Road,
GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA
Ph. 0751- 4092908
E-Mail : drmahendra02@gmail.com
Plz. CLICK :http://pustakaalay.blogspot.com/2011/04/0.html

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