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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 
अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर

पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त।

मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
इसमें कहाँ मृत्यु?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अन्त।



सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला " ने अपना जीवन परिचय एक पंक्ति में देते हुए लिखा है ,"दुःख ही जीवन की कथा रही"। सच में निराला का जीवन दुखों से भरा था और उन दुखों को चुनौती देने ,उनसे जूझने और उन्हें परास्त करने में ही उनका निरालापन था।

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  1. हरे-हरे ये पात,
    डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!

    मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
    फेरूँगा निद्रित कलियों पर
    Waah ek madhubhan si tazagee har shabd mein, oss ki tarah bheene si mahak ..Bahut abhaar Nirala ji ki is kavita ko padhwane ke liye

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामीमई 20, 2012 9:42 pm

    mujeh ye bahut aacha laga.

    उत्तर देंहटाएं
  3. अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

    उत्तर देंहटाएं
  4. vasant ke dwara jeevan chakra ko bakubhi kaha hai.

    उत्तर देंहटाएं

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