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मनोज सिंह
देवानंद की मौत पर उनके प्रेम की स्वीकारोक्ति को बड़े खुले ढंग से मीडिया ने प्रकाशित किया था। जीनत अमान के प्रति देव साहब का लगाव एकतरफा साबित हुआ था। उनके खुद के मतानुसार जीनत की राजकपूर के प्रति आकर्षण ने उनके दिल को तोड़ा था। चलिये, एक पल के लिए मान लेते हैं कि अगर जीनत अमान भी उनसे बराबर से प्रेम करने लगतीं, तो क्या होता? हो सकता है कि राजकपूर का दिल नहीं टूटता क्योंकि उनके पास और भी कई सुंदरियां मन बहलाने के लिए मौजूद थीं। लेकिन यकीनन देवानंद की पत्नी कल्पना कार्तिक को तकलीफ होती!! यहां यह बात प्रमुखता से कही जानी चाहिए कि किसी जमाने में देवानंद और कल्पना कार्तिक का भी जबरदस्त प्रेम था जो विवाह में परिवर्तित हुआ। असल में इस तरह के समूचे घटनाक्रम को अमूमन हम एक व्यक्ति विशेष के संबंध में रखकर देखते व सोचते हैं और प्रसिद्ध व सेलिब्रिटी लोगों का संदर्भ आने पर उसे कला के नाम पर सकारात्मक बनाते चले जाते हैं। मगर क्या यह सच नहीं कि हम उनसे जुड़े दूसरे लोगों की आमतौर पर अनदेखी कर देते हैं? यही नहीं बहुत हद तक हम उनकी भावनाओं से भी खिलवाड़ करते हैं। प्रारंभिक दौर में देवानंद के जीवन में तो सुरैया भी आई थीं। और फिर तमाम उम्र अविवाहित रहीं। देवानंद की दृष्टि में ही देखें तो इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए? और फिर यह यकीन से कैसे कहा जा सकता है कि जीनत अमान के उनकी जिंदगी में पूरी तरह से प्रवेश कर जाने के बाद देव साहब की प्रेम-इच्छा पर पूर्णविराम लग जाता? शायद जीनत अमान ने ठीक ही किया था। हम उनकी वर्तमान पारिवारिक स्थिति को नजरअंदाज कर दें तो तत्कालीन युग व परिस्थितियों के हिसाब उन्होंने सही निर्णय लिया था। वरना क्या गारंटी थी कि उनका प्रेम-जीवन देव साहब के साथ सफल व सुखमय ही बीतता? बहरहाल, इस तरह की कहानियों के पीछे एक बड़ा सत्य यह भी है कि हजारों-लाखों की दिलों की धड़कन स्वयं भी एक इनसान ही होता है। उसका भी मन भावनाओं में बहता है। उसे भी कहीं भी किसी से भी कभी भी प्यार हो सकता है। कहा तो यह जाना चाहिए कि प्रेम के मामले में वो दूसरों से अधिक स्वतंत्र होता है और उसे 'अवसर' भी अधिक प्राप्त होते हैं। लेकिन कड़वा सच है कि हर प्रेमी की तरह प्रेम का अंतिम परिणाम उसके नियंत्रण में नहीं। और फिर वो इसे आम आदमी की तरह ही भोगता है। उसे भी प्रेम में असफलता मिल सकती है और वो भी विरह की वेदना में डूबकर अपनी तमाम जिंदगी गम में गुजार देता है। ये चमकते सितारे भीतर ही भीतर कितने अवसादपूर्ण जीवन और अकेलेपन से ग्रस्त होते हैं यह देवानंद के परममित्र गुरुदत्त की जीवन-गाथा से बेहतर कोई और उदाहरण नहीं हो सकता। उनका वहीदा रहमान के प्रति आकर्षण और पागलपन की हद तक प्रेम बॉलीवुड के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है। और कहा जाता है कि इन्हीं शब्दों के पीछे छिपी घुटन उनकी मृत्यु का कारण बनी। मगर यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि उनका प्रेम अपनी पत्नी गीतादत्त से भी शादी से पूर्व तक बेहद था। शादी के बाद वैचारिक मतभेद व सामंजस्य की कमी उन दोनों के बीच दूरी का कारण बनी, जो एक आम बात है। मगर गुरुदत्त का भावना-प्रधान संवेदनशील मन विरह और दबाव की निरंतरता को सह न सका। उनकी मृत्यु, यह सोचने के लिए मजबूर कर देने वाली अंतहीन बहस को जन्म देती है कि कोई व्यक्ति जो इतने बड़े महान फिल्मकार के साथ-साथ चिंतक, एक बेहतरीन कलाकार और इनसान भी हो, ऐसा कदम कैसे उठा सकता है?
सितारों की चमचमाती जीवनशैली के साथ-साथ गमगीन व अंधेरे में छिपा जीवन भी अमूमन बराबरी से दिखायी देता है। इनकी कहानियां छिप नहीं पातीं। भारतीय चलचित्र की कई सितारा नायिकाओं ने जीवन अकेले ही गुजार दिया। जिन्होंने शादी की भी तो कइयों का जीवन सुखमय नहीं बीत पाया और वे तमाम उम्र दर-दर भटकती रहीं। कुछ एक ने इसके लिए कई समझौते भी किए मगर ज्यादातर मामले में अंत तक सुख-शांति और संतोष नहीं मिला। कई अपने प्रेम को तलाशती रहीं और सहारा ढूंढ़ती रही। मगर भटकते-भटकते थक-हारकर शराब के नशे में खुद को डुबो दिया। इनके गम की सीमा नहीं। कइयों का अंत भयावह रहा। दर्द में डूबी मीना कुमारी की इंतिहा उनकी शायरी में देखी जा सकती है। उधर, यूं तो कई नायकों का जीवन भी दुखभरा बीता। संजीव कुमार जैसे संवेदनशील कलाकार यूं ही हंसते-हंसते शराब पीते-पीते इतनी जल्दी चले जाएंगे, किसी ने सोचा न था। यकीनन उनका व्यक्तिगत जीवन सुखमय नहीं रहा। और वह अपने प्रेम को पाने में कई बार असफल रहे। लेकिन कहने को ही सही, भारतीय नायकों का जीवन तुलनात्मक रूप से तो नायिकाओं से बेहतर ही रहा है। परंतु यह शायद ऊपरी तौर पर ही सच हो। करोड़ों युवतियों की धड़कन राजेश खन्ना का व्यक्तिगत जीवन किस हद तक असफलताओं से घिरा रहा, यह सर्वविदित है। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं, कुछ आम दर्शकों को पता है तो कुछ एक समय के साथ-साथ आलीशान बंगलों की दीवारों के पीछे दब-छिप गये। कई अदाकारों ने अपने अंदर की विरह-वेदना को अभिनय से छुपा लिया और चेहरे पर आने नहीं दिया। इस चक्कर में कई परिवार टूटे तो कइयों में बिखराव हुआ। हद तो तब हो गई जब कई इसका भी फायदा उठाकर आगे बढ़ते चले गये। यहां की कहानियों में धोखे, चालाकी, जोड़तोड़, झूठ और कमीनेपन की कमी नहीं। ऐसे उदाहरण भी कम नहीं, जहां चमचमाते सितारों की अंतिम यात्रा बेहद दयनीय रही हो। परवीन बॉबी की मृत्यु की परिस्थिति ने कई उजले चेहरों पर कालिख पोती मगर वे फिर भी मुस्कुराते रहे। 'कर भला तो हो भला', यहां के जीवन का सत्य नहीं। सत्य तो यह भी है कि सभी का जीवन सुखमय ही बीते यह भी कोई जरूरी नहीं। सारिका ने क्या कभी सोचा होगा कि जीवन में ऐसा भी हो सकता है? बहरहाल, ये पुरानी कहानियां हैं। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। नये दौर की नई इबारतें लिखी जा रही हैं। रिश्तों में भी व्यवसाय घुस चुका है। संबंधों का टूटना-जुड़ना आम होता जा रहा है। मगर अब यह सामान्यतः दिलों को नहीं तोड़ता। यह महिला और पुरुष दोनों वर्गों में अब बराबरी से देखा जा सकता है। आज कई सितारों ने अपनी धर्मपत्नियों को छोड़कर आधुनिक तितलियों से संबंध बनाये जिसका मधुर रसास्वादन दर्शकों ने भी किया। मगर यहां भी समाज अकेले छोड़ दिये गये व्यक्तियों के दुःख से दूर ही रहा। यह दीगर बात है कि तेजी से प्रेमी बदलने मात्र से जीवन सुखमय ही होगा यकीन से नहीं कहा जा सकता। दुःख, दर्द, अकेलापन कब किस रास्ते से आ जाये पता नहीं। उम्र निकलने पर इसका अहसास अधिक होता है। और फिर जो एक के साथ नहीं ठहर पाया वो दूसरे के साथ तमामउम्र चले, क्या दावे से कहा जा सकता है?
शायद इन सितारों के पास संतोष और सामंजस्य शब्द का लेशमात्र भी अंश नहीं। और ये प्रतिदिन प्रेम में भी नयेपन की तलाश में प्रयासरत रहते हैं। लेकिन इस मृगमरीचिका के चक्कर में ये चमचमाते सितारे अपने जीवन को जाने-अनजाने में ही कब अंधेरों में डुबो देते हैं, पता ही नहीं चलता है। उम्र निकल जाती है, इच्छाएं खत्म नहीं होती। चमक-दमक से भरा ग्लैमरस जीवन उच्छृंखल स्वभाव को जन्म देता है। जिसे हम प्रेम समझते हैं असल में वो शरीर का आकर्षण है एवं मानसिक अवस्था में असंतुलन का एक उदाहरण। यह नैसर्गिक रूप से तो कुछ हद तक न्यायोचित हो सकता है मगर सामाजिक रूप से कतई नहीं। और इसीलिए इस पर सामाजिक नियम ही लगते हैं। जीवन का सत्य है कि कोई जरूरी नहीं कि जो आप चाहे उसे आप पा ही लें। असल में आत्म-नियंत्रण व अनुशासन के महत्व का इन्हें पता ही नहीं। कुछ अधिक की आस और स्वार्थ इन सितारों को अकेला कर जाते हैं। और समय निकल जाने पर जब चमक उतरने लगती है तो इनका व्यवहार और मानसिकता देखने लायक होती है। ऐसे में सुप्त हो रहे तारों की कहानी पढ़ी जा सकती है। जहां कई पक्ष हैं। यह अपने अंदर अपने आप को छिपाने लगता है। इसमें अंतहीन भावनाएं और न सह पाने लायक दर्द का अहसास है। इन सितारों का जीवन नजदीक से देखने पर आम जीवन से कहीं अधिक भयावह दिखाई देता है। सच ही कहा गया है कि तारों को नजदीक से नहीं देखना चाहिए चूंकि वे भी मिट्टी के बने होते हैं।
 
यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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