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डॉ.रामविलास शर्मा
 गतांक से आगे ...
डा॰ रामविलास शर्मा  आलोचक होने के अलावा शैलीकार  भी हैं। हिंदी-आलोचना में उन्होंने एक नवीन शैली का सूत्रपात किया है। इस शैली की प्रमुख विशेषता इस बात में है कि गंभीर विषयों को भी किस प्रकार सरलतम भाषा में लिखा जा सकता है। डा॰ रामविलास जी के आलोचना-साहित्य की अन्य लेखकों के साहित्य-लेखन से तुलना करने पर यह अंतर भली-भाँति स्पष्ट हो जायगा। डा॰ रामविलास जी की आलोचनाओं में शब्दाडंबर नाम मात्र का भी नहीं है। वे इतनी सरल भाषा का प्रयोग करते हैं कि उनकी समीक्षाओं को जनसाधारण तक सहज ही आत्मसात् कर सकते हैं। भारी भरकम शब्दों का प्रयोग करके वे अपने पाठकों को आतंकित नहीं करते। शब्दों के अतिरिक्त उनके वाक्य भी, आवश्यकतानुसार छोटे या बड़े, पर, सर्वत्र स्पष्ट होते हैं। उर्दू शब्दों का उन्होंने खुल कर प्रयोग किया है; पर प्रचलित उर्दू-शब्द ही उनकी भाषा में मिलेंगे। ये उर्दू-शब्द, कहना न होगा, आज अपना उर्दूपन खो चुके हैं और हिंदी में घुल मिल गये हैं। अतः उनसे छुआछूत रखना अपनी भाषा के स्वाभाविक प्रवाह को क्षति पहुँचाना है। डा॰ रामविलास जी अपने तर्क एवं विचारप्रवाह के मध्य भाषा की स्वाभाविकता का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं। उर्दू-शब्द उन्होंने तत्सम रूप में ही अपनाये हैं; जो उचित ही है।
डा॰ रामविलास जी की शैलीगत दूसरी विशेषता सोद्धरणता है। वे अपने विचार सदैव उद्धरणों के साथ पेश करते हैं। इसी कारण उनकी आलोचनाओं में अपरास्त शक्ति भरी हुई है। वे कहीं भी-कभी भी छिछली और सस्ती बात नहीं कहते। अपनी बात  जब वे सप्रमाण प्रस्तुत करते हैं तब वह सहज ही समझ में आ जाती है। वैसे भी, किसी भी ईमानदार आलोचक के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपने महत्त्वपूर्ण आक्षेपों-आरोपों एवं स्थापनाओं की पुष्टि में प्रमाण पेश करता हुआ चले। विरोध करते समय तो डा॰ रामविलास जी में यह प्रवृत्ति सर्वाधिक प्रखर रूप में मिलती है। बिना सप्रमाणता के आलोचक की बौद्धिक प्रतिभा की दाद नहीं दी जा सकती और न उसकी स्थापनाएँ ही साहित्य में समादृत हो सकती हैं। डा. रामविलास शर्मा जी के विरोध में अनेक आचार्य-श्रेणी के और टुटपुँजिए आलोचकों ने लेख लिखे, पर वे उनकी स्थापनाओं का वैज्ञानिक खंडन करने में बुरी तरह असफल रहें ।  डा॰  रामविलास जी की मान्यताएँ आज भी अकाट्य हैं। किसी भी कृति एवं साहित्यकार के संबंध में  सस्ती-सी बात कह देने की प्रवृत्ति आज की हिंदी-आलोचना में दिन-पर-दिन बढती जा रही है। ऐसे आलोचकों को चाहिए कि वे या तो मौन रहें अथवा जो रिमार्क दें, उसका प्रमाण भी प्रस्तुत करें। असलियत में, बौद्धिक दिवालियापन ऐसी आलोचनाओं का प्रमुख कारण होता है। जो कभी तो संस्कृतिनिष्ठ अथवा गद्य-काव्य की भाषा के आवरण में छिपाया जाता है अथवा कभी विद्वत्ता की थोथी गरिमा को अपनाकर अनर्गल रिमार्क द्वारा; जो उनकी फ़ैसिस्ट मनोवृत्ति का परिचायक होता है। एक ईमानदार लेखक को डा॰ रामविलास जी से भयभीत होने की ज़रूरत नहीं है। वे उन पर ही प्रहार करते हैं; जो ईमानदार होने का झूठा दंभ भरते हैं; और जब उनकी कलई खोलकर सामने रख दी जाती है; तब वे समूची प्रगतिशील आलोचना को जी भरकर कोसने पर तुल जाते हैं।
डा॰ रामविलास जी की शैली की तीसरी  और अत्यधिक महत्त्वपूर्णे  विशेषता उसमें  पाया जानेवाला व्यंग्य है।  वास्तव में व्यंग्य  डाक्टर साहब की आलोचना-शैली का प्राण है।  वे कभी-कभी तो तिलमिला देने वाला बड़ा ही तीखा व्यंग्य  करते हैं। इस व्यंग्य  में कहीं आक्रोश का भाव मिलेगा तो कहीं हास्य  का। पर, यह तथ्य यहाँ द्रष्टव्य है कि वे मात्र व्यंग्य के लिए व्यंग्य नहीं करते। व्यंग्य उनकी आलोचना-शैली का एक अंग बन गया है। सर्वप्रथम वे किसी विचार की व्याख्या करते हैं, तत्पश्चात अपनी मान्यताओं की पुष्टि में मौजू उद्धरण प्रस्तुत करते हैं और फिर भली-भाँति आलोच्य विषय अथवा विचार की निस्सारता प्रकट कर देने के बाद; उस पर कसकर व्यंग्य करते हैं। हिंदी-आलोचना में डा॰ रामविलास जी की यह महत्त्वपूर्ण व मौलिक विशेषता है। बिना बौद्धिक पूँजी के इस शैली की नक़ल हास्यस्पद ही हो सकती है। व्यंग्य करने का अधिकारी वही है; जो आलोच्य के बौद्धिक स्तर का आलोचक हो; तथा जिसका तर्क ज़रा भी लचर न हों।
डॉ.महेंद्र भटनागर
डा॰ नगेन्द्र की आलोचना-पुस्तक ‘विचार और अनुभूति’ की ‘अहं का विस्फोट’ शीर्षक से समीक्षा करते हुए डा॰ रामविलास जी लिखते हैं- ‘अपने आलोचनात्मक लेखों के संग्रह को नगेन्द्रजी ने ‘विचार और अनुभूति’ का नाम दिया है। अच्छी आलोचना में अनुभूति का अंश होना भी चाहिए; इसके बिना शायद वह रचनात्मक साहित्य की श्रेणी में न आये ! नगेन्द्रजी की अनुभूति सन् 39 के छायावादी की है; उनके विचार सन् 26 के अधकचरे फ्रॉयड-भक्तों के। हर फ्रॉयड-भक्त को अपनी अनुभूति की स्वस्थता में बड़ी शंका रहती है; वह जगह-जगह नगेन्द्रजी में भी मिलती है। छायावादी कवि सन् 30 और 36 में जहाँ थे, वहाँ से वे अपने विचारों और अनुभूति, दोनों में ही काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं।  लेकिन नगेन्द्र जी के विचार उन्हें एक क़दम आगे ठेलते हैं तो अनकी अनुभूति उन्हें चार क़दम पीछे घसीट ले जाती है। इस तरह इस किताब का नाम ‘एक क़दम आगे तो चार क़दम पीछे’ भी हो सकता है !’ इसी लेख में आगे चलकर वे लिखते हैं - ‘नगेन्द्रजी साहित्यकार की इस शाश्वत व्याख्या से ही संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने अपने इंट्रोवर्ट साहित्यकारों की श्रेणी में गोर्की, इक़बाल और मिल्टन को भी बिठाया है। ये महान् साहित्यिक अपने अहं के बल पर ही बड़े बन सके हैं ! कहते हैं, ‘गोर्की, इक़बाल, मिल्टन आदि के व्यक्तित्व का विश्लेषण असंदिग्ध रूप से सिद्ध कर देगा कि उनके भी साहित्य में जो महान है वह उनके दुर्दमनीय अहं का विस्फोट’ है; साम्यवाद, इस्लाम या प्यूरिटन मत की अभिव्यक्ति नहीं। अब विश्व-साहित्य का एक नया इतिहास लिखा जाना चाहिए; जिसका नाम रखा जाए ‘ अहं का विस्फोट। इसमें यह दिखाया जायगा कि संसार के सभी महान् साहित्यकार साम्यवाद, इस्लाम, प्यूरिटन मत-जैसी क्षुद्र वस्तुओं से ऊँचे उठकर विशुद्ध रस के तल पर (या रसातल पर) अपने अहं का बैलून फोड़ते रहे हैं। यदि कोई कहे कि इतिहास से यह सिद्ध नहीं होता तो हम  नगेन्द्रजी की एक दूसरी उक्ति से उसका मुँह बंद कर देंगे और वह यह कि आलोचना भी तो आत्माभिव्यक्ति है; उसमें विज्ञान क्या कहता है, इतिहास क्या कहता है, इन क्षुद्र सत्यों की ओर कहाँ तक ध्यान दिया जाए।’ सुमित्रानंदन पंत की कविता की आलोचना करते हुए वे इस प्रकार व्यंग्य करते हैं- ‘भारत के साधारण-जन उनके लिए ‘मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन हैं। अशिक्षित और निर्धन अवश्य; लेकिन मूढ़ और असभ्य नहीं। इस तरह के विशेषणों का प्रयोग साम्राज्यवादी करते रहे हैं, न कि देश-भक्त कवि ! पंतजी का कॉस्मोपॉलिटन दृष्टिकोण जहाँ छायावाद को अँग्रेज़ी-साहित्य से प्रभावित होने के कारण गौरवशाली मानता है, वहाँ स्वदेश की जनता को अँग्रेज़ों की तरह मूढ़ और असभ्य मानता है। तब अगर अँगरेज़ कहें कि हम असभ्य भारतवासियों को सभ्यता का पाठ पढ़ाने आये हैं तो उसमें बेज़ा क्या है ? अथवा जैसे पीलिया के रोगी को सब-कुछ पीत और रक्तहीन ही दिखाई देता है, वैसे ही रूढ़िवाद के उपासक कवि पंत को ग्राम-जनता रक्त-मांस-हीन मृत संस्कृति का अवयव मात्र दिखाई देती है।
‘साहित्य और यथार्थ’ शीर्षक से डाक्टर साहब ने जो  पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और उनकी ‘क्वासि’ की समीक्षा की है वह उनकी व्यंग्य-शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। पूरे लेख में इतना व्यंग्य है कि आलोचक की सूक्ष्म पकड़ पर आचर्श्य होता है। पर, इस लेख में आक्रोश के स्थान पर हास्य की प्रधानता है, क्योंकि डा॰ रामविलास जी ‘क्वासिवादियों’ की बहकों से बेफ़िक्र हैं। जैसा कि वे लिखते हैं- ‘जब गीदड़ की मौत आती है तब वह गाँव की तरफ़ भागता है। जब शोषक वर्गों की मौत नज़दीक आती है तब वे मार्क्सवाद को कोसने लगते हैं।’ आक्रोश का भाव जहाँ आया है वहाँ कुछ कटुता भी आ गयी है। ‘अज्ञेय ’ के संबंध में वे लिखते हैं - कुत्ते की दुम एक बार टेड़ी हुई तो हमेशा टेड़ी ही बनी रही। ‘अज्ञेय’ ने ‘शेखर’ में स्तालिन के प्रति जो ज़हर उगला था, उसका झाग सन् 52 के ‘प्रतीक’ में मौज़ूद है।’ अथवा ‘प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य में जिस नायिका-भेद का विरोध किया था, यशपाल ने उसे यथार्थ-चित्रण के नाम पर फिर प्रतिष्ठत किया है। ‘आँखें भी छुरे के फले जैसी लंबी-लंबी नोकदार, खू़ब उजली। माथे पर त्यौरी चढ़ा देखती तो ऐसा लगता, सीने में गड़ा देगी।’ यह किसी लोफ़र पात्र की बातचीत नहीं है। ख़ुद कलाकार यशपाल ‘पार्टी कॉमरेड’ की नायिका का नख-शिख-वर्णन कर रहे हैं।’ ‘अश्क’ के उपन्यास ‘गिरती दिवारें’ पर वे व्यंग्य करते हैं, - ‘अश्क की ‘गिरती दीवारें’ में अनंत चेतन को सलाह देता है कि जब पंप पर प्रकाशो पानी लेने आए तब वह उसे पकड़कर अंदर ले आए। प्रकाशो के आने पर तीन-चार बार अनंत ने चेतन के कुहनी गड़ाई; लेकिन वह टस-से-मस नहीं हुआ और प्रकाशो ‘बाल्टी उठाकर अपने मोटे-मोटे ओठों से मुस्कराती और अपने भारी कूल्हे मटकाती हुई चली गई !’ और अनंत ने फ़तवा दिया कि ‘ वह एकदम नपुंसक है’ ! कहीं श्री धर्मवीर भारती ने कथा-साहित्य के नपुंसक नायकों पर लेख लिखा था। ‘अश्क’ जैसे कलाकार उनकी संख्या इतनी तेज़ी से बढ़ा रहे हैं कि भारती जी अब उन पर पूरी थीसिस लिख सकते हैं। नीला और चेतन की प्रेम-कहानी पर ‘गिरती दीवारें’ के लंबे-लंबे अध्याय पढ़ते हुए आदमी ऊब उठता है। इस क़दर का उथलापन हिंदी उपन्यासों में मुश्किल से मिलेगा। कहीं प्रकाशो के सिर से दुपट्टा खिसक जाता है, उसकी छोटी आँखें कुछ विचित्र आकांक्षा से फैल जाती हैं, और चेतन का जी चाहता है कि ‘उसे अपने आलिंगन में लेकर इतना दबाए कि उसका दम निकल जाए’; लेकिन वह उसके चुटकी काट कर रह जाता है और बदले में प्रकाशो उसके चुटकी काट लेती है।  महान मनोविज्ञानिक चित्रण ! हाँ एक बार चेतन ने प्रकाशो  के  पतले  ब्लाउज़ में छाती के मोटे से बटन पर  चुटकी  काट  दी ! महान् यथार्थवादी चित्रण ! इस प्रकार डा॰ रामविलास जी के लेखों में व्यंग्य जगह-जगह बिखरा मिलेगा। इससे उनकी आलोचनाएँ बड़ी तीखी और असर करनेवाली हो गयी हैं।
आचार्य  रामचंद्र शुक्ल  की परंपरा हम डा॰  रामविलास शर्मा  जी में विकसित होती देख रहे  हैं। जिस लोक-मंगल की भावना को आचार्य शुक्ल  ने साहित्य के परख की मुख्य  कसौटी माना था; वही डाक्टर साहब में भी पायी जाती है; यद्यपि उनका समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित है, पर उसका राष्ट्रीय विचारधारा से कोई विरोध नहीं है और न कला के प्रति ही वे उदासीन हैं। अनेक स्थायी महत्त्व की आलोचना-पुस्तकें उन्होंने लिखीं।  

                               समाप्त


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