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मनोज सिंह
विगत सप्ताह अकस्मात ही दो-दिवसीय अमृतसर की यात्रा पर जाना हुआ था। यह पहले की यात्राओं से कुछ भिन्न साबित हुई। कारण कोई विशेष उद्देश्य का न होना था। ऐसे में खाने-पीने के अतिरिक्त घूमना-फिरना एकमात्र मकसद रह गया था। वाघा बार्डर का अति लोकप्रिय सांध्यकालीन परेड कार्यक्रम, पूर्व में कई बार देखे होने के कारण, कोई विशेष आकर्षण व कौतूहलता का केंद्र नहीं रह गया था। सुबह-सुबह श्री हरमंदिर साहिब एवं मां दुर्ग्याना मंदिर पर मत्था टेकने के बाद दिनभर समय ही समय था। अध्यात्म में बड़ी शक्ति होती है। गुरुओं की पवित्र नगरी स्थित इन महान तीर्थस्थलों पर कुछ वक्त शांति से बिताते ही सकारात्मक ऊर्जा का मन-मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है और भक्त अनायास ही सानंद स्वस्थ महसूस करता है। मैं भी मंदिर-गुरुद्वारों में दर्शन के बाद पूरी तरह से तरोताजा और प्रसन्नचित्त होकर शहर की सड़कों पर घूमने निकल पड़ा था। बिना किसी सुनिश्चित कार्यक्रम के यूं ही निरुद्देश्य घूमना भी कभी-कभी कम मनोरंजक नहीं। इस बार मैंने अमृतसर के खान-पान की विरासत को जानने का मन बनाया, जो मेरे लिये एकदम नया अनुभव था। ऐसा कहा जाता है कि यह शहर आधा खाना बनाने में और बाकी आधा उसे खाने में व्यस्त रहता है। सुनने में यह अटपटा लग सकता है मगर मेरे लिये यह रोचक था। इसी ने मुझे गली-गली स्थित प्राचीन मगर प्रसिद्ध हलवाई व ढाबों में जाने के लिए प्रेरित किया था। और कुछ ही समय में यह कथन बहुत हद तक सच भी लगा था। ऐतिहासिक शहर की तंग गलियों में बिखरी पड़ी कई दुकानें आज भी खाने-पीने की शौकीन जनता से भरी पड़ी रहती हैं। इस भ्रमित आधुनिक युग में दूध-दही-घी का इतना अधिक प्रयोग जहां आश्चर्य पैदा करता है वहीं विशिष्ट मसालों का अत्यधिक उपयोग हैरान करता है। छोला-चना अमृतसर के सभी भोजन में प्रमुखता से पाया जाता है। खाते समय प्रथम दृष्टि देखने में लगने वाले ये भारी व्यंजन, आसानी से कैसे पच जाते हैं? बाद में यकीन नहीं होता। यहां के हवा-पानी की शायद यही विशेषता है।
सदियों पुराना यह शहर यूं तो चंद्रधर गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' के माध्यम से 1914 में ही हिन्दी साहित्य के दूर-दराज बैठे पाठकों तक भी पहुंचने लगा था। जिसमें स्टेशन के पास स्थित पौढ़ियों वाले पुल एवं अन्य स्थानों की चर्चा के साथ ही अमृतसर के आमजीवन का बड़ा जीवंत प्रस्तुतीकरण हुआ है। तभी तो 'माई जरा हट के' और 'तेरी कुड़माई हो गई?' जैसे कथन उन लोगों की जुबान पर भी चढ़ गये थे जिन्होंने अमृतसर को देखा भी नहीं था। उन प्राचीन नजरों से अमृतसर को देखते-देखते शहर के बीच स्थित गुरु बाजार में अमर हलवाई की दुकान पर पहुंच गया जो सुनिश्चित समय के लिए खुलती है। यहां खोया-मावा की मिठाइयों से हटकर अन्य मिष्ठानों की अधिक मांग है। इसकी मूंग की दाल की नरम-नरम ताजी बर्फी की आकार की पिन्नियां, पौष्टिक व विशिष्ट स्वाद से परिपूर्ण, हर मौसम में अधिक से अधिक खाने के लिए प्रेरित करती हैं। कुछ समय पूर्व तक खस्ता कचौड़ी-समोसा हमारे सुबह-शाम नाश्तों का एक प्रमुख व्यंजन रहा है। अमृतसर में इनकी कई प्रसिद्ध दुकाने हैं। हर क्षेत्र में एक। सभी अपने आप में विशिष्ट। हिन्दू कॉलेज के पास स्थित ढाब खटीका की कचौड़ी को किसी विज्ञापन की जरूरत नहीं, वो यूं ही तुरंत बिक जाती है। कटरा पर्जा स्थित साझी हलवाई की कचौड़ी शाम होते-होते खत्म होने लगती है। साथ मिलने वाली सब्जी-चटनी इसके स्वाद को बेहतर बनाती है। चौक कटरा आहलूवालिया में स्थित गोयंका स्विट्स के स्पंजी केसर के रसगुल्ले और मालपुआ अनोखे हैं। मगर साथ ही उसकी कचौड़ी की अपनी अलग पहचान है। यह खस्ता और जायका मसालेदार है। इमली और सौंठ से बनी चटनी के साथ खाने पर स्वाद मस्त हो जाता है। समोसो में मसाले वाले साबूत आलू के अतिरिक्त काजू-किशमिश अतिरिक्त बोझ नहीं लगते और स्वाद को बढ़ाने में सहायक होते हैं। इसी इलाके में स्थित गुरदास राम जलेबियांवाले की जलेबी की मांग आज भी बरकरार है। देसी घी में बनी रसभरी जलेबी को खाने पर जीभ के साथ-साथ दिल भी रस में डूब जाता है। क्या इनके स्वाद की कोई बराबरी की जा सकती है? नहीं। शहर के बीच स्थित आहूजा स्विट्स की केसर की लस्सी और हॉल गेट के भीतर प्राचीन ज्ञान हलवाई की मलाईदार मीठी लस्सी पीने के लिए किसी आरामदायक बैंच-कुर्सी या वातानुकूलित हॉल की आवश्यकता नहीं। ट्रैफिक के बेतहाशा बढ़ने पर इन संकरे रास्तों पर खड़े होने की जगह नहीं लेकिन फिर भी लस्सी पीने वालों की यहां लाइन लगी होती है। फास्ट-फूड के युग में लस्सी का दूसरा गिलास पीने की क्षमता रखने वाले लोग अब न के बराबर होंगे। लेकिन अगर आपने हिम्मत करके पी भी लिया तो दिनभर के लिए तरोताजा हो जाएंगे और दो घंटे बाद पुनः खाने-पीने की ख्वाहिश रखेंगे। यहां की लस्सी किसी भी तरह से भारी नहीं और इसे सुपाच्य कहा जा सकता है। यही कारण है जो अमृतसर बड़े-बड़े गिलास में पी जाने वाली लस्सी के लिए जाना जाता है। हो सकता है पंजाब की विशिष्ट पहचान यहीं से बनी हो। 
कुलचों के बिना इस शहर के खानपान की बात अधूरी ही रह जाएगी। यूं तो यहां कुलचे की दसियों दुकानें प्रसिद्ध हैं मगर लॉरेन्स रोड स्थित साझा चूल्हा का कुलचा यकीनन खाने वालों को सोचने के लिए मजबूर करता है। बिना खाये जान पाना तो असंभव है ही मगर खाने के बाद भी समझ पाना बड़ा मुश्किल होता है कि कुलचे में क्या-क्या डाला है और यह कैसे पकाया गया है? कभी लगता है कि शायद रोस्टेट किया गया हो तो कई बार लगता है कि इसे घी में पकाया गया है। बहरहाल, यहां का चना-कुलचा-चटनी अनोखे स्वाद वाला है। और एक के बाद दूसरा कुलचा खाने का जी करता है मगर उसके लिए आपके पेट में जगह बचनी चाहिए। 
तथाकथित आधुनिक युग में जब दुनिया व बाजार की रौनक चकाचौंध से भरी हो, ऐसे में क्या किसी रेहड़ीवाले का पूरे शहर में प्रसिद्ध होना संभव हो सकता है? वो भी किसी पेड़ के नीचे!! कदापि नहीं। अपवादस्वरूप ही सही, लॉरेन्स रोड के नुक्कड़ पर, गर्ल्स कॉलेज के पास, पीपल के पेड़ के नीचे लुबायाराम रेहड़ीवाला अपने कई किस्म के आम के पापड़ और पेड़ों के लिए प्रसिद्ध है। इसके पास आमपापड़ की ग्यारह किस्में उपलब्ध हैं। जिसमें चटोरी आमपापड़ और स्पेशल इमली पेड़ा खूब बिकता है। यह दुकान बरसों से यहीं पर लगाई जाती है, यहां खाने वालों की कभी-कभी लाइन तक लग जाती है। 
क्या उपरोक्त सभी दुकानदार व्यापार करना नहीं जानते? क्या पैसा कमाना इनका मकसद नहीं? आज के व्यवसायी युग में ऐसे सवाल बेईमानी लगते हैं। मगर कुछ एक को छोड़ दें तो अधिकांश ने यहां अपने पुराने तौर-तरीकों को नहीं बदला! क्यूं? जाने क्या सच है? बात जो भी हो, केसर का विश्व प्रसिद्ध ढाबा आज भी शहर के अंदर गलियों में ही चल रहा है। शास्त्री मार्केट के नजदीक पासिया चौक पर स्थित इस ढाबे में खाने वालों की दिनभर भीड़ लगी रहती है। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए ढाबे के मालिक ने इसका आधुनिकीकरण या प्रमुख सड़क पर दुकान का स्थानांतरण क्यूं नहीं किया? यहां भी सवाल किया जा सकता है। व्यापार में अधिक लाभ की दृष्टि से भी वर्तमान की भीड़ को आसानी से फैलाया जा सकता है। मगर फिर शायद इसका भी वही होता जो कई प्राचीन नामी हलवाइयों का दूसरे शहरों में हुआ। केसर दा ढाबा शायद अपनी गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहता। तभी इसके चने और दाल का स्वाद बरकरार है और यह आज भी बीबीसी आदि के कार्यक्रम में प्रचारित होते रहते हैं। यह सदियों पुराना ढाबा अपने मसालेदार व्यंजन के साथ-साथ 'फिरनी' (मीठा व्यंजन) के लिए भी अति प्रसिद्ध है। साथ में यहां का रायता ले लिया जाये तो खाने का स्वाद दुगना हो जाता है। दो परांठे, दाल, रायता और चने की एक थाली कुछ चंद रुपयों में ही आज भी उपलब्ध है। महंगाई के इस जमाने में आम आदमी के लिए यह सस्ती ही मानी जाएगी। यह पौष्टिक भोजन आपकी भूख को संतुष्ट करने के साथ-साथ आत्मिक सुख को भी तृप्त करता है। 
आज के आदमी को आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस बड़े-बड़े होटलों की आदत पड़ चुकी है मगर फिर भी रईसों को इन गलियों के ढाबों में आते व खुशी-खुशी खाते देख यकीन हो जाता है कि यहां कुछ विशेष है। यही क्यों, सुबह-सुबह कान्हा स्विट्स की पूरी-सब्जी के लिए भीड़ लगी रहती है। आमतौर पर आलू की सब्जी में मिठास पसंद नहीं की जाती। ऊपर से अगर इसे कद्दू की सब्जी के रूप में बनाया जाये और इमली व सौंठ की मिठास दी जाये, तो खाना छोड़ सुनने में भी बड़ा अटपटा लगता है। लेकिन कान्हा की मिठासभरी आलू की सब्जी, आपको ज्यादा से ज्यादा खाने के लिए प्रेरित करती हैं। साथ में गुब्बारे की तरह फूली हुई पूरियां, जिसमें तेल न के बराबर दिखाई देता है, गरम-गरम परोसी जाती हैं। यह आम पूरियों से भिन्न होती हैं और अंदर दाल के मसाले का लेप इसके स्वाद को विशिष्ट बनाता है। यूं तो यहां भी दो पूरी की थाली प्राप्त होती है लेकिन भूख में तीन-चार पूरी खायी जा सकती हैं। और फिर शाम तक के लिए फुर्सत। 
बहरहाल, अमृतसर में विदेशी सैलानियों की संख्या को देखते हुए आधुनिक बड़े होटलों की भी कमी नहीं। और मुझे व्यक्तिगत रूप से इन आधुनिक खान-पान से कोई परहेज भी नहीं। क्रिस्टल, एमके, कंट्री-इन आदि से लेकर पांच सितारा ईस्टा तक में खाना खाने से मुझे कोई तकलीफ नहीं होती लेकिन इनके भोजन में अपने ब्रांड के अतिरिक्त कोई विशेषता दिखाई नहीं देती, जबकि अमृतसर के हर ढाबों में यूं तो चना ही मिलता है लेकिन सबका स्वाद भिन्न होता है, जो दुकान को वििशष्ट बनाता है। अमृतसर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हर होटल व रेस्टोरेंट की श्रृंखलाओं का आउटलेट उपलब्ध हैं, लेकिन मन में एक सवाल जरूर उठता है कि इतने बेहतरीन स्वादिष्ट देसी व्यंजनों के सामने आज की युवा पीढ़ी पिज्जा और बर्गर क्यों और कैसे खाती है? खैर, आपको भारतीय खाने-पीने से विशिष्ट लगाव है तो अमृतसर के 'पापड़' और 'बड़ियां' जरूर घर लेकर जाइये। एक अमृतसरी 'बड़ी' पूरे घर के भोजन को मसालेदार और स्वादिष्ट बना देगी और आप चटकारे लेकर खायेंगे। भविष्य में अब जब भी आप अमृतसर जायें, उपरोक्त व्यंजनों का मजा अवश्य लें। वरना यह मान लीजिए कि आप कुछ विशिष्ट स्वाद से वंचित रह गये हैं।
 

यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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  1. मनोज सिंह जी
    आशीर्वाद
    लेख से अवगत करवाने का धन्यवाद
    अगली बार भारत आने पर जावूंगी
    एक कहवत याद आ गई
    जिन्ने लाहोर नहीं वेख्या ओ जामिया ई नहीं
    जिन्ने अम्बर सरी पापड बड़ी नहीयों खादे ओनू सब्जी दे स्वाद की पता
    ४० साल से वडी नहीं खाई अम्रतसर की
    विदेश में मिलती है पर स्वाद ०००००००
    गुड्डो दादी चिकागो से

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