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मनोज सिंह
अधिकांश लोकोक्तियां, कहावतें, मुहावरे बहुत कुछ कह जाते हैं। ये भावपूर्ण के साथ-साथ गागर में सागर की तरह अर्थपूर्ण होते हैं। कभी-कभी तो यकीन ही नहीं होता कि साधारण से दिखने वाले चंद शब्दों से बनी ये छोटी-छोटी पंक्तियां इतना कुछ अपने अंदर समेटे हुए है। यही नहीं, उनके शब्दार्थ के भीतर छिपा भावार्थ, काल और समाज की सीमाओं को तोड़कर सर्वत्र अपनी प्रासंगिकता को प्रमाणित करता रहता है और सर्वकालीन बन जाता है। अर्थात हर वक्त हर जगह संदर्भ में लिये जा सकते हैं। अमूमन ये श्रेष्ठ साहित्य की पहचान और ताकत होते हैं और लिखने वाला कुछ शब्दों में ही अमर हो जाता है। ये पंक्तियां जनसमुदाय की कसौटी पर खरी उतरती हैं। और अमूमन बेहद लोकप्रिय होती हैं। इसे अवाम की जुबान कहा जा सकता है। इसे किसी पाठशाला में पढ़ाया नहीं जाता। यह तो होश संभालते ही समझ के साथ-साथ विकसित होती हैं और धीरे से दैनिक व सामाजिक जीवन का अंग बन जाती हैं। यह संस्कृति और सभ्यता में इतनी घुलमिल जाती हैं कि कई बार इनके मूल ह्लोतों का पता तक नहीं चलता। इनका अर्थ समझाया नहीं जाता बल्कि यह अपने साथ ज्ञान का भंडार लेकर चलती हैं। ये क्लिष्ट नहीं होतीं, न ही पढ़ने वाले को भ्रमित करती हैं। अनपढ़-गंवार भी इसका भरपूर उपयोग करते हैं। जिसका अर्थ सीधा और सपाट होता है। ऐसा कि तीर सीधे निशाने पर लगे। ये आम शब्द दिल और दिमाग को हिलाकर रख देते हैं। इनमें हर तरह के रस देखे जा सकते हैं। यहां कई बार रहस्यवाद भी नजर आता है, जहां अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिंबों के माध्यम से जीवन की गूढ़ता को परिभाषित किया जाता है। इनमें चिंता और चिंतन के अतिरिक्त कहीं-कहीं व्यंग्य भी होता है। ये जनआक्रोश को व्यक्त करने का माध्यम भी बनते हैं। असहाय की दबी भावना इसके माध्यम से प्रकट की जा सकती है। यह लयबद्ध कथन अनायास ही नारा बनकर जनक्रांति लाने की क्षमता रखते हैं। दुनिया की अधिकांश क्रांतियों के साथ किसी न किसी लोकप्रिय नारे का संबंध देखा जा सकता है। ये पंक्तियां कई बार आश्चर्यचकित भी करती हैं। कहीं-कहीं सौंदर्यबोध इतना अधिक होता है कि यकीन ही नहीं होता कि किसी इनसान ने लिखी होंगी। तभी तो कहा जाता है कि सृजन किया नहीं जाता स्वयं से अवतरित होता है। और इसे ईश्वर की लीला के रूप में देखा व लिया जाना चाहिए।
सही तो लिखा गया है 'समरथ को नाहीं दोष गुसाईं'। सदियों पूर्व लिखा गया यह कथन क्या आज भी प्रासंगिक नहीं? सत्य नहीं? संदर्भित नहीं? धरातल की हकीकत पर उतरकर देखें तो यह पूर्णतः सच है। कई बार तो लगता है कि यह आधुनिक युग की कसौटी पर अधिक खरा उतरा है। इसका भावार्थ व्यवहारिक जीवन में कड़वे सच की तरह है। मगर यहां एक विरोधाभास उत्पन्न होता है। आधुनिक काल तो उन्नति, विकास, पढ़े-लिखों का काल कहा जाता है। लोगों के पास दुनिया की तमाम जानकारियां हैं। ज्ञान की सीमा के विस्तार के साथ-साथ समझ भी बढ़ी है। विज्ञान ने सूचना उपलब्ध कराने में एक अहम भूमिका अदा की है। दर्शनशास्त्र ने आगे बढ़कर राजनीति और समाजशास्त्र में अपने नये अध्याय खोले हैं। मानवीय अधिकारों और स्वतंत्रता की बात खुलकर की जाती है और प्रजातंत्र को सही अर्थों में प्रजा के लिए प्रजा के द्वारा बनाये जाने का दम भरा जाता है। समानता की बात की जाती है। ऐसे में फिर उपरोक्त कथन कैसे प्रासंगिक हो सकता है? यहीं तो विरोधाभास है!! यह कथन आज अपने मूल अर्थ के साथ ज्यादा मजबूती व तनकर खड़ा हुआ है। जबकि पूर्व में जब यह लिखा था तब आमजन में ज्ञान का प्रचार व प्रसार उतना नहीं था। और तो और तब तो शक्तिशाली को भगवानस्वरूप पीढ़ियों से स्वीकार किये जाने की प्रथा भी थी। फिर चाहे वो किसी भी रूप में हो और नाम के साथ पहचाना जाये। तभी तो शक्तिशाली राजा व ज्ञानी धर्मगुरु देवतुल्य हुआ करते थे। इनके व्यक्तित्व, सोच और कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा करता था। मगर तब भी ऐसे सवालिया निशान लगाने वाले अर्थपूर्ण दार्शनिक कथनों का जन्म हुआ। है न आश्चर्य की बात? दूसरी तरफ आज हम सब कुछ समझते और जानते भी हैं, तो फिर ऐसे में यह कथन आधुनिक युग में कैसे संदर्भित हो सकता है? इसका अर्थ कैसे स्वीकारा जा सकता है? मगर यह हकीकत है कि इसके मूल भाव आज भी कसौटी पर खरे उतरते हैं। यही तो इस पंक्ति को कालजयी बनाता है। जन-जन में प्रचलित, जो इतने वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन साथ ही यह कई सवाल भी खड़े कर जाता है।
सर्वप्रथम प्रश्न उभरता है कि यह कैसे संभव है कि आज के सामर्थ्यशाली के ऊपर कोई दोष मढ़ा ही नहीं जा सकता? कारण चाहे जो भी हो मगर यह सत्य है। विश्लेषण करने पर कई तथ्य उभरकर आयेंगे और यह अपने आप में एक विषय होगा। बहरहाल, सच तो यह है कि इन पर अगर दोष मढ़ भी गया तो बहुत हद तक अमूमन कुछ बिगड़ता नहीं। बात यहीं नहीं रुक जाती बल्कि आधुनिक युग में शक्तिशाली प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस हकीकत का खुलकर ऐलान भी करता है। तभी तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करता है। वो शब्दों का उपभोग और वाक्‌चातुर्य कला का दुरुपयोग करता है। सिर्फ यही नहीं, अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति के लिए समाज व राष्ट्र की नीतियों के साथ भी खेलता है। कानून उसके व्यक्तिगत लाभ और नुकसान के हिसाब से बनाये जाते हैं। और नीति-निर्धारण उसके हित साधने में उपयोगी होता है। स्वतंत्रता का डंका पीटने वाला मीडिया कई बार उसके अवगुणों को छुपाते हुए सूचनाओं व खबरों को कुछ इस तरह से परोसता है कि निकृष्ट कार्य करने वाला बदनाम से बदनाम राक्षस भी महिमामंडित हो जाए। यह अवाम के दिलोदिमाग पर छा जाता है और पाठक को भ्रमित करता है। सामर्थ्यवान शासन, धर्म व समाज तंत्र के हर संस्था को अपने उपयोग में लाना जानता है। इसके माध्यम से वह कुछ भी करने को तैयार है सक्षम है। वो अपने फायदे के लिए किसी भी सीमा को लांघने के लिए तत्पर रहता है। किसी भी हद तक जाने को तैयार है, बेशक फिर चाहे राष्ट्र का अहित हो, धर्म का नाश या फिर समाज का नुकसान हो रहा हो। वर्तमान का सार्वजनिक जीवन तो एक कदम और आगे है। अब सामाजिक व राजनीतिक जीवन में कोई सिद्धांत नहीं होते। नैतिकता का अब सवाल ही नहीं। तभी तो छोटे से लेकर बड़े से बड़ा राजनीतिज्ञ इस बात को खुलेआम कहता-फिरता है कि राजनीति में सारी संभावनाएं हमेशा खुली रहती हैं। अर्थात आज का दुश्मन कल मित्र बन सकता है और दोस्त कभी भी विरोधी ठहराया जा सकता है। इसका तो सीधे-सीधे मतलब निकलता है कि सत्ता प्राप्ति के लिए कुछ भी किया जा सकता है। आश्चर्य इस बात पर अधिक होता है कि इसे बड़े इतमीनान से हर जगह पर बड़े सरल और सहज भाव से कह भी दिया जाता है। क्या इन पंक्तियों में किसी भी तरह के आदर्श की हल्की-सी भी बू आती है? नहीं। क्या इससे उत्पन्न राजनीति का नैतिकता के पैमाने पर उचित ठहराया जा सकता है? नहीं। यहां तो सीधे-सीधे कोई भी विचारधारा मायने नहीं रखती। चूंकि शासन हथियाने के लिए धुर-विरोधी के साथ भी हाथ मिलाया जा सकता है। तो फिर कैसा सिद्धांत? मजेदारी तो इस बात को देखकर होती है कि अपने इस दोहरे चरित्र को सरेआम स्वीकार भी किया जाता है और न्यायोचित भी ठहराया जाता है। वो भी पूरे विश्वास के साथ, मुस्कुराते हुए। इन पर कोई दोष नहीं लग सकता। क्यों? क्योंकि ये शाक्तिशाली हैं। तो हो गये न एक बार फिर से महाकवि सही और प्रामाणिक, अपने उपरोक्त कथन के माध्यम से।
यही क्यों, व्यापार के क्षेत्र में देख लीजिए। आधुनिक धर्मगुरुओं को जान लीजिए। जिसके पास पैसा है उनके लिए सबकुछ संभव है। लोकप्रिय फिल्मी कलाकारों का उदाहरण ले लिया जाये। लोकप्रियता की चमक के साये तले वे वो सब कुछ कर सकते हैं जो आम आदमी के लिए सोचना भी संभव नहीं। शारीरिक और मानसिक भूख तो हरेक इनसान को लगती है। मगर उन पर संस्कारों और समाज का बोझ होता है। लोग क्या कहेंगे? इज्जत-आबरू जैसे शब्दों के नीचे दबकर जीवन समाप्त हो जाता है। इनमें इतना सामर्थ्य नहीं होता कि समाज का सामना कर सके। अपनों के साथ लड़ सकें। परिवार के विरोध में खड़े हो सकें। मगर क्या यही बात सितारों के ऊपर भी लागू होती है? नहीं। क्यों? क्योंकि ऊपर कह तो दिया गया है उनके लिए कोई दोष नहीं होता। उनका कोई दोष नहीं होता। वे स्वयं को समाज के ऊपर समझते हैं। उनके पास हर सवाल का कोई न कोई जवाब होता है। और न भी हो तो उत्तर देने की क्या आवश्यकता है? और किसको देना है? और देना भी पड़ जाए तो शब्दों को चबा-चबाकर आत्मविश्वास से बोला जाए। बस, बाकी काम अपने आप हो जाएगा।
उत्सुकता होती है कि उपरोक्त कथन की रचना कैसी हुई होगी? इसे प्रामाणिक करने के लिए चरित्रों का निर्माण कैसे किया  गया होगा? यूं तो इसकी यहां कोई आवश्यकता नहीं, कोई संदर्भ नहीं। लेकिन विस्तार में न जाते हुए भी यह तो माना ही जा सकता है कि ज्ञान व बुद्धि सदा से रहे हैं। हां, इनका अगर सदुपयोग हुआ है तो दुरुपयोग भी होता है। और ये समाज-दर-समाज समय के साथ-साथ चलते रहते हैं। अब इसे सकारात्मक रूप में लिया जाये या नकारात्मक दृष्टि से देखा जाये, व्यवहारिक दृष्टि से भी देखें तो शासक वर्ग को अवाम को शासित बनाये रखने के लिए, स्वयं को समाज से ऊपर तो रखना ही होगा। अगर स्वयं पर दोष लगाने लग जायें तो यह कैसे संभव हो सकता है? और तभी वे स्वयं को सभी बंधनों से मुक्त रखते हैं।
 

यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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