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गतांक से आगे ...
डॉ.रामविलास शर्मा
यशपाल के सेक्स-संबंधी विकृत मार्क्सवादी  दृष्टिकोण की उदाहरण-सहित व्याख्या करने के बाद वे लिखते हैं — ‘लेकिन इस दृष्टिकोण के लिए जहाँ यशपाल ज़िम्मेदार हैं, वहाँ उन आलोचकों की ज़िम्मेदारी भी कम नहीं है, जो उनके कथा-साहित्य को प्रगतिशीलता का नमूना कहकर तारीफ़ करते हैं।’ उपेन्द्रनाथ अश्क के उपन्यास ‘गिरती दीवारें’ की समीक्षा करने के बाद, डा॰ रामविलास उनकी शेखर-पंथियों में गणना करते हैं और लिखते है — ‘साहित्य के छिछलेपन का दूसरा नाम है अश्क।’
इसमें संदेह नहीं कि प्रगतिशील साहित्य के संबंध में अनेक भ्रांतियाँ ऐसे अधकचरे तथाकथित प्रगतिशील आलोचकों ने फैला रखी हैं और भ्रष्ट साहित्य को प्रगतिशील साहित्य का पद दे रखा है। आज भी बहुतों की यह भ्रांति दूर नहीं हुई है। इसके दो बड़े दुष्परिणाम हुए । प्रथम तो प्रगतिशील साहित्य के नैतिक मूल्यों को धक्का पहुँचा; दूसरे पूँजीवादी प्रेस और उसके द्वारा ख़रीदे हुए आलोचकों को प्रगतिशील साहित्य की घोर निंदा करने का अवसर मिला। जहाँ तक इन कृतियों की निंदा करने का प्रश्न है, उन आलोचकों के कथन में सच्चाई हो सकती है, पर जब वे उस कीचड़ को प्रगतिशील साहित्य और प्रगतिशील आंदोलन पर फेंकते हैं; तब उसकी बुनियाद में इन्हीं तथाकथित प्रगतिशील आलोचकों की थोथी आलोचनाएँ ही उत्तरदायी ठहरती हैं; जिन्होंने यथार्थवाद के नाम पर अस्वस्थ साहित्य लिखने वालों को महान् प्रगतिशील लेखक कहा । डा॰ रामविलास जी ने इस दिशा में जो सूक्ष्म सर्वेक्षण किया है वह इन तमाम भ्रांतियों को दूर करने के लिए पर्याप्त है। उन्होंने अपने अनेक आलोचनात्मक लेखों में इस संबंध में लिखा है। ‘हिंदी-साहित्य में प्रगति-विरोधी धाराएँ’ शीर्षक लेख में वे लिखते हैं — ‘प्रगतिशील साहित्य के विरोधियोंस में अंतश्चेतनावादी लोग हैं जो फ्रॉयड के मनोविज्ञान को सच्चा प्रगतिवाद मानते हैं।’ (‘संध्या’, अंक 2, पृष्ठ 66)
इसी प्रकार पुनरुथानवादी और कुंठावादी  साहित्य भी प्रगतिशील- साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं।  डा॰ रामविलास जी ने अपनी आलोचनाओं द्वारा हिंदी-साहित्य में फैले इस भ्रम का भी दूर कर दिया है कि नग्न-यथार्थवादी और अंतश्चेतनावादी साहित्य प्रगतिशील साहित्य है। उन्होंने सच्चे प्रगतिवादी साहित्य के स्वस्थ और जनवादी स्वरूप को  भली-भाँति प्रस्तुत किया है। हिंदी के समस्त प्रगतिशील आलोचकों में डा॰ रामविलास शर्मा ने यह कार्य तटस्थता, लगन और निष्ठा के साथ किया है। फलस्वरूप; उन्हें प्रगतिशील कैंप में भी कड़ा विरोध सहना पड़ा। इस विरोध से वे विचलित नहीं हुए; प्रत्युत उन्होंने जवाब में अनेक तर्क-संगत एवं सप्रमाण लेख लिखे; जो अकाट्य हैं तथा उनकी बौद्धिकता, प्रतिभा, अध्ययन-शीलता एवं सूक्ष्म अंतर्दृष्टि का परिचय देते हैं। उनके सामने अन्य आलोचक बौने हैं। रामविलास जी निःसंदेह, बौद्धिक दैत्य हैं।
डा॰ रामविलास जी का कलावाद का सख़्त विरोधी होना स्वाभविक है। मार्क्सवाद पर आस्था रखनेवाला कलावाद का समर्थन कदापि नहीं कर सकता। ‘कला कला के लिए’ का सिद्धांत उसे स्वीकार नहीं। मार्क्सवादी कला की उपेक्षा नहीं करता; मात्र सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख कला उसकी दृष्टि में हेय है। कला को जीवन-विकास में योग देना चाहिए। अतः कला के उपयोगितावादी दृष्टिकोण को अपनाना प्रत्येक प्रगतिवादी लेखक का धर्म है। डा॰ रामविलास जी के विचार इस संबंध में नितांत स्पष्ट हैं। वे उच्च-विचारों को प्राथमिकता देते हैं। कला तो उन विचारों की वाहिका मात्र है। कला को प्राथमिकता देने वाले साहित्यकार फॉर्म के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि वे सामाजिक उत्तरदायित्व को ही नहीं भूल जाते; उनकी कला भी मात्र शिल्प की कोटि तक उतर आती है। कला में उच्च विचारों का समावेश अनिवार्य है; बिना इसके वह मात्र शिल्प है। स्पष्ट है, ऐसे लेखकों की मानवता के विकास में कोई भूमिका नहीं। प्रगतिशील आंदोलन के विरोध में अधमरा कलावाद एक बार फिर दूसरे नाम से साहित्य में आया है — और वह नाम है — ‘प्रयोगवाद’। प्रयोगवादियों का वही नारा है जो कलावादियों का था। डा॰ रामविलास शर्मा जी ने छद्म वेषधारी इस कलावाद की असलियत को भली-भाँति प्रकट कर दिया है। तुलसीदास की साहित्यिक स्थापनाओं का उल्लेख करते समय वे लिखते हैं —‘कला कला के लिए या सामाजिक उत्तरदायित्त्व से मुक्त होकर प्रयोग करने की स्वाधीनता की गुहार मचानेवाले साहित्यकारों का दिल टटोलिए। हृदय-सिंधु की जगह इनका दिल सडे़ हुए पानी से भरी हुई गड़ही की तरह हैं; उसमें जनता से प्रेम के बदले देश की तरफ़ से उदासीनता और साम्राज्य-भक्ति के बगूले उठते हैं। ये लोग ‘फार्म’ की रट लगाकर साहित्य में उच्चकोटि के विचारों के महत्त्व को अस्वीकार करते हैं। इनकी मति सीप के समान नहीं है; जिससे मोती निकले, वह घोंघे की तरह है जो सेक्स के लिए मुँह फैलाकर फिर अपने अंदर सिमट जाता है। जन-संस्कृति, ग्राम-गीतों, प्राचीन साहित्य से इनकी सरस्वती नहीं जाग्रत होती, न विदेश के जनवादी लेखक इन्हें अच्छे लगते हैं, इनकी प्रेरणा का स्रोत एज़रा पाउंड, टी॰ एस॰ इलियट, स्पेंडर आदि लेखक हैं; जो जन-शिविर के विरोधी हैं। ऐसे लेखकों का विरोध करना, जनता के हित में अपनी संस्कृति का विकास करना उन तमाम साहित्यकारों का कर्त्तव्य है जो तुलसी की विरासत पर गर्व करते हैं।’
इसी प्रकार एक और स्थल पर वे प्रयोगवाद  की वास्तविकता का पर्दाफ़ाश करते हुए लिखते हैं — *‘प्रयोगवाद का कला-सिद्धांत है — ‘कला कला के लिए’। उसकी विषय-वस्तु पराजय और कुंठा के रस में डूबी हुई है; उसका रूप कुरूपता का पर्याय है। ... प्रयोगवाद भय-ग्रस्त प्राणियों की पुकार है। यह भय उन्हें भविष्य से है, जन-आंदोलन से है, अपनी साहित्यिक पंरपराओं से है; जिनसे बचकर वे अपनी मौलिकता प्रमाणित करने के लिए बुरी तरह उत्सुक दिखाई देते हैं।....विषय-वस्तु में निकम्मापन, निरर्थक, निरुद्देश्यता, कभी लुढ़की सुराही पर, कभी अपने पर अतुकांत आहें भरना — यह है प्रयोगवाद। डा॰ रामविलास जी ने प्रयोगवादियों अथवा कलावादियों पर यह टिप्पणी प्रासंगिक रूप से ही की है। निस्संदेह, हिंदी-साहित्य में प्रयोगवाद के नाम पर जो लोग विकृति पैदा कर रहे हैं उन पर और भी प्रखर हमला होना चाहिए। प्रयोगवाद का सबसे बुरा प्रभाव हिंदी-कविता पर पड़ा है। इस प्रयोगवादी विकृति के कारण हिंदी-कविता पर से जन-साधारण की आस्था उठ रही है और वह कविता पढ़ना एक फिजू़ल की चीज़ समझने लगा है। प्रयोगवादी अपनी इस विकृति का चाहे कितनी भी लच्छेदार भाषा में प्रत्युत्तर दें; उनकी रचनाएँ उन समस्त दावों को झूठा साबित कर देती हैं।
डॉ.महेंद्र भटनागर
प्रगति-विरोधी आलोचकों ने हिंदी-साहित्य  में इधर एक भ्रम और फैलाया था; जो अभी भी अपना काम कर रहा है। प्रगतिशील साहित्य पर कलाहीनता का आक्षेप लगाते हुए; ये आलोचक उसे प्रचारवादी साहित्य घोषित करते हैं। मानों कि प्रगतिशील साहित्यकार कला के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता ! वास्तव में देखा जाए तो ऐसे छद्म प्रगतिवादी कवि मात्र झंडावादी एवं ध्वंसकारी अर्द्ध-विक्षिप्त-से कवि हैं। उन्हें  प्रगतिशील कवि मानना एक शरारत है। डा॰ रामविलास ने ऐसे शरारती आलोचकों को जवाब दिया है और कला के संबंध में अपनी मान्यताओें को स्पष्ट रूप में रखा है। ‘अपलक’ की भूमिका में श्री॰ बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ व्यंग्य-शैली में लिखते हैं —‘उपयोगिता, उपादेयता, प्रगतिशीलता, अपलायनवादिता, सामंती विचारधारावरोधक विद्रोहवादिता, औद्योगिक पूँजीवाद-जन्म, संघर्षोत्तेजक, झंडोत्तोलन, ले लो खड्ग-पटक दो म्यान मय क्रांति-आवाहन, दन्द्रम्यमाना-दिग्-दिङ् नादप्रेरणा, दुर्दांताक्रांतक-जन्म, दंतोत्पाटन-संदेश-वहन-शीलता आदि सत्काव्य-सल्लक्षण मेरे इन गीतों में कठिनता से मिलेंगे।’ इस पर डा॰ रामविलास जी किस अंदा़ज़ से व्यंग्य करते हैं — ‘ पता नहीं, नवीनजी ने ‘आज खड्ग की धार कुंठिता’, ‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ’ आदि पंक्तियाँ याद करके यह वाक्य लिखा है या उन्होंने दूसरे हिंदी-कवियों की रचनाओं पर यह व्यंग्य किया है।’ ऐसी रचनाओं के संबंध में वे एक और स्थल पर लिखते हैं — ‘यह बात आज़माकर देखी जा सकती है कि जो कवि किसान-मज़दूरों से जितनी ही दूर होता है, उतना ही वह उन्हें जगाने के लिए हुंकार और धुआँधार की ध्वनि ज़्यादा करता है। दर-असल किसान-मज़दूर कबीर के ‘खुदाय’ की तरह बहरे नहीं हैं कि उन्हें जगाने के लिए इतनी ज़ोर से बाँग देने की ज़रूरत पडे़। ‘उधर चीन हुंकार उठा’ और ‘यह भारत फुंकार उठा’ इस तरह की पंक्तियों को हम प्रगतिशील कविता की अच्छी ख़ासी पेरोडी मान सकते हैं।’
जहाँ  एक ओर कलावादी  लेखक सामाजिक  उत्तरदायित्व से मुक्त होकर साहित्य-सृजन करते हैं; वहाँ दूसरी ओर कला तथा सौंदर्य-शास्त्र की अवहेलना करनेवाले साहित्यकार भी सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति लापरवाह साबित होते हैं। डा॰ रामविालस जी ने साहित्य-सृजन की प्रक्रिया में कला के महत्त्व को स्वीकार किया है। वे लिखते हैं — ‘ये तमाम बातें ज़ाहिर करती हैं कि लेखक में कला और रूप की तरफ़ एक लापरवाही है। उसने यह महसूस नहीं किया है कि वाक्यरचना, शब्दचयन, छंद के प्रवाह आदि पर ध्यान देना साहित्य को प्रभावशाली बनाने के लिए ज़रूरी है। रूप और कला के प्रति असावधानी साहित्य के सामाजिक उद्देश्य के प्रति असावधानी है; क्योंकि बिगड़ा हुआ रूप और भ्रष्ट कला साहित्य के सामाजिक असर को ख़त्म कर देती है। इसके साथ ही कला के पुराने घिसे-पिटे रूपों से — ख़ासकर सस्ती छायावादी लाक्षणिकता से — बचना ज़रूरी है।’ इस प्रकार डा॰ रामविलास ने जहाँ ‘कला कला के लिए’ का सख़्त विरोध किया है, वहाँ साहित्य में प्रचलित कलाहीनता का भी समर्थन नहीं किया। वे सुघढ़ रूप और स्वस्थ कला के हिमायती हैं। स्वस्थ कला सामाजिक स्वास्थ्य की सापेक्षता में ही परखी जा सकती है अर्थात् वह रूप तक ही  सीमित न रहकर विचार और भाव-क्षेत्र तक व्यापक है। सुघढ़ रूप हमारी सौंदर्य-वृत्ति का परिचायक है; क्योंकि सौंदर्य हमें आकर्षित ही नहीं करता, प्रत्युत प्रभावित भी करता है। अतः प्रगतिशील विचारों को प्रभावशाली बनाने के लिए लेखक को रूप और कला के प्रति लापरवाह न रहना चाहिए। प्रगतिशील साहित्य और कला के संबंध में इतनी स्पष्ट मान्यता के होते हुए भी जो आलोचक कलाहीन साहित्य को प्रगतिशील साहित्य के आदर्श के रूप मे उद्धृत करते हैं तो उनका मंतव्य स्पष्ट हो जाता है; अर्थात् कलावादियों की बोगस प्रतिष्ठा-रक्षा हेतु असफल शरारतपूर्ण प्रयत्न ! कुछ अलोचकों में यह बात अनजान रूप में भी पायी जाती है; लेकिन उनकी इस अज्ञानता को नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता।
डा॰ रामविलास जी ने विषयवस्तु और रूप के संबंध  में स्पष्ट घोषणा  की है - ‘साहित्य की विषयवस्तु और उसकी कला दोनों एक चीज़ नहीं हैं। ये दोनों ही संबद्ध होकर साहित्य बनाती हैं; दोनों की एकता साहित्य के लिए ज़रूरी है। लेकिन कला और विषयवस्तु, दोनों ही समान रूप से साहित्य-रचना के लिए निर्णायक महत्त्व की नहीं हैं। निर्णायक भूमिका हमेशा विषयवस्तु की होती है; जिसके पास उच्चकोटि के विचार नहीं हैं, भावावेश नहीं है, यथार्थ का गहरा ज्ञान नहीं है, वह सिर्फ़ कला निखारने की कोशिश करके उत्कृष्ट साहित्य नहीं रच सकता। जिसके पास ये चीजें हैं, उसके पास मूल वस्तु है, प्रयत्न करने पर वह उसे कलात्मक रूप दे देगा।’

शेष अगले अंक में...

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