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बाल कहानियां
एक दिन पास के जंगल में राजा जी शिकार करने के लिए अपने वज़ीर और सिपाही के साथ गए। शिकार की ढूंढ़ में तीनो बिछड़ गए। एक-दुसरे की शोध में वो आगे बढे।
आगे चलकर सिपाही को पेड़ के नीचे एक आदमी दिखा। सिपाही ने देखते ही उस दिशा में आगे कदम बढ़ाये। वह आदमी द्रष्टिहीन था।
सिपाही ने उसे पूछा - 'ए अंधे, तूने यहाँ से किसी को जाते हुए देखा।'
उस आदमी ने जवाब दिया - 'नहीं, यहाँ से कोई नहीं गया है।'
सिपाही ने कहा - 'ठीक है ठीक है।'
और उसके बाद सिपाही आगे की ओर चल पड़ा।
थोड़ी ही देर में उस जगह पर वज़ीर ढूंढता हुआ जा पहुँचा।
वज़ीर ने उस आदमी से पूछा - 'प्रज्ञावान जी, यहाँ से कोई पसार हुआ है ?'
उस आदमी ने जवाब दिया - 'हाँ, यहाँ से थोड़ी देर पहले एक आदमी गया है।'
वज़ीर ने धन्यवाद कहा और आगे बढे।
सिपाही और वज़ीर के जाने के बाद वहाँ ढूंढते हुए राजा जी आ पहुंचे।
राजा ने उस आदमी से पूछा - 'हे सूरदास, यहाँ आपके पास ढूंढते हुए कोई मुसाफिर आया था।'
उस आदमी ने जवाब दिया - 'हाँ राजन, यहाँ से थोड़ी देर पहले आपका सिपाही गुजरा है और उसके बाद आपके वज़ीर गुजरे है।'
यह सुनते ही राजा आश्चर्य चकित हो गए। और उत्सुक्त हो गए यह जानने के लिए कि एक द्रष्टिहीन व्यक्ति को कैसे पहचान हुई कि पहले आया वो सिपाही था और दूसरा गुजरा वो वज़ीर ही है।
राजा जी की इस कश्मकश का समाधान करते हुए उस द्रष्टिहीन आदमी ने जवाब दिया कि - हे राजन, मुझे उनके कथोपकथन से पहचान हुई कि वो कोन था।

इस प्रकार हमे इस कहानी से बोध मिलता है कि कैसी वाणी प्रयोग करनी चाहिए। क्योंकि वाणी ही हमारी पहचान बनाती है।


सौजन्य : कौशल्या वाघेला 

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