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रामविलास शर्मा

प्रगतिशील साहित्य का आंदोलन आज विश्व-साहित्य  में सबसे अधिक सशक्त और स्वस्थ आंदोलन है। वैसे तो अप्रत्यक्ष रूप से, प्रत्येक काल में प्रगतिशीलता को साहित्यिक श्रेष्ठता का तत्त्व माना गया है; किन्तु आधुनिक युग में अपने एक संगठित और सुलक्षित आंदोलन के रूप में वह पहली बार सामने आया है। अतः साहित्य-विकास का आधुनिक चरण यदि ‘प्रगतिशील साहित्य’ के नाम से अभिहित किया गया, तो उसमें ‘न्यून- पदत्व’ दोष होते हुए भी; उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। ‘प्रगतिशील-लेखक-संघ’ के लखनऊ अधिवेशन में, सभापति के आसन से दिए गये अपने भाषण में प्रेमचन्द जी ने कहा था — ‘प्रगतिशील-लेखक-संघ’ यह नाम मेरे विचार से ग़लत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है; अगर यह उसका स्वभाव न होता तो शायद वह साहित्यकार ही न होता।’ (‘कुछ विचार’, भाग 1, पृष्ठ 12) आज का प्रगतिशील साहित्य चूँकि एक सुनिश्चित उद्देश्य लेकर लिखा जा रहा है, अतः उसे यह नाम दिया गया है — इससे प्रेमचंदजी के दृष्टिकोण का विरोध नहीं होता, वरन् उसका समाधान ही होता है।
आज  कुछ विद्वानों  ने एक और ही विवाद  खड़ा कर दिया है;और वह है, ‘प्रगतिशील साहित्य’ तथा ‘प्रगतिवादी साहित्य’ का। कुछ लोग प्रगतिशील कहलाने में तो गौरव अनुभव करते हैं; किन्तु प्रगतिवाद से कोसों दूर भागना चाहते हैं ! वे ही तथाकथित प्रगतिशील साहित्यकार प्रगतिवाद का खुला विरोध भी करते हैं। साहित्य में इस प्रकार की चर्चा एक विद्यार्थी को असमंजस में डाल देती है। यह विवाद ‘वाद’ शब्द को लेकर खड़ा किया जाता है। अपने को प्रगतिशील मानने वाले ‘प्रगतिवाद’ को एकांगी मानते हैं। वे जीवन अथवा साहित्य को किसी ‘वाद’ विशेष के घेरे में बाँधना नहीं चाहते। ठीक है, पर तभी तक; जब-तक कोई ‘वाद’ समग्र मानव-जीवन का प्रतिनिधत्व न करता हो। मात्र ‘वाद’ शब्द को एक सीमित अर्थ में ग्रहण करना भ्रम पूर्ण है।
प्रगतिशील साहित्य के साथ  यह बात ज़रूर है कि अनेक रूढ़िवादी छद्म लेखक अपने बौद्धिक विलास  के बल पर, उसमें प्रवेश पा गये हैं। जन-संपर्क से दूर रह कर; वे केवल विशिष्ट ‘वादी’ साहित्य-सृजन में  संलग्न देखे जाते हैं। जिसका नतीज़ा यह होता है कि कुछ समय तक तो वे भ्रमवश पूजे जाते हैं, पर शीघ्र ही उनकी कलई खुल जाती है। डा॰ रामविलास शर्मा ने ऐसे ‘वाद’ लेबल वाले अनेक बनावटी प्रगतिशील लेखकों की यथार्थ शक़्ल हिंदी-साहित्य के सामने पेश की है।
महेंद्र भटनागर
जो  हो, यहाँ प्रश्न है ‘प्रगतिशील’ और ‘प्रगतिवाद’ के अंतर का। यह अन्तर क्यों पैदा किया जाता है? इस अन्तर का आधार क्या है ? यह तो स्पष्ट है कि यह अंतर राजनीतिक मतवादों को लेकर किया जाता है। प्रगतिवादी लेखक कम्युनिस्ट-पार्टी से संबद्ध कर दिए गये हैं और अन्य  ग़ैर-कम्युनिस्ट प्रगतिशील लेखक उससे स्वतंत्र माने जाते हैं। यह अंतर प्रतिक्रियावादी शक्तियों को मज़बूत बनाता है। जो लेखक इस अंतर का समर्थन करते हैं वे जान में या अनजान में ग़लत लोगों का ही साथ देते हैं और जन-शक्ति तथा उसके संगठनों को कमज़ोर करते हैं। प्रगतिशील साहित्य और प्रगतिवादी साहित्य में कोई तात्त्विक अंतर नहीं है। यदि कम्युनिस्ट लेखकों को पृथक् ही रखा जाना ज़रूरी हो तो उनके साहित्यिक मंच का नाम उस पार्टी के नाम पर ही रखना युक्तियुक्त होगा। जो बात कम्युनिस्टों के संबंध में हो; वही अन्य मतवादियों – गांधीवादियोँ, लोहियावादियों, ‘भाजपाइयों’ आदि के  साथ भी हो। जहाँ तक प्रगतिशीलता या प्रगतिवाद का संबंध है, उसमें राजनीतिक मतवादों को सर्वोपरि स्थान नहीं देना चाहिए।  प्रगतिशील लेखकों के प्रमुख संगठन ‘प्रगतिशील-लेखक-संघ’ के घोषणा- पत्र में यह बात स्पष्ट कर दी गयी है कि प्रगतिवादी या प्रगतिशील साहित्यकारों की इस संस्था का कम्युनिस्ट-पार्टी से कोई संबंध नहीं है। कोई भी जनवादी लेखक इसका सदस्य हो सकता है। यही नहीं, अनेक ग़ैर-कम्युनिस्ट लेखक इसके सम्मानित सदस्य भी हैं। ऐसी सूरत में प्रगतिशील आन्दोलन पर जो लोग बार-बार इसी तथ्य (?) को लेकर प्रहार करते हैं तो उनका उद्देश्य साफ़ हो जाता है — प्रगतिशील साहित्यकारों के संगठन को कमज़ोर करना। कहना न होगा कि वे एक सीमा तक इस दिशा में सफल भी हुए हैं।
प्रगतिवादी  या प्रगतिशील  साहित्य कोई  आज ही नहीं लिखा गया। प्रत्येक काल की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक स्थिति की पृष्ठभूमि में जो साहित्य मानव-जाति को गति दे सका है; वह प्रगतिशील माना जाता है। इस प्रकार आज का प्रगतिवादी साहित्य अपनी परंपरा स्थापित करता है। उसके विकास का क्रम स्पष्ट होता है। प्राचीन स्वस्थ साहित्य को अपना कर वह अधिक सबल भी बनता है। डा॰ रामविलास इसी तथ्य को मार्क्सवाद का एक सिद्धान्त मानते हैं। यह तथ्य चाहे किसी भी ‘वाद’ का सिद्धांत क्यों न हो ; अपने में एक मौलिक विचार है; जिसे विशुद्ध बौद्धिक दृष्टिकोण से ही समझा जा सकता है औैर अपनाया जा सकता है। डाक्टर रामविलास लिखते हैं —‘मार्क्सवाद वर्गों की भूमिका को भी ऐतिहासिक विकास के सन्दर्भ में देखता है। एक समय आदिम समाज व्यवस्था के मुक़ाबले में दास-प्रथा ने मनुष्य के विकास में क्रांतिकारी परिवर्तन किये। यही बात सामंती समाज के लिए भी ठीक है। इसलिए कोई दर्शन या काव्य गुलामों के मालिकों या सामंतों का समर्थक होने से ही मार्क्सवाद के लिए निंदनीय नहीं हो जाता। देखना यह चाहिए कि मानव-संस्कृति के विकास में किस वर्ग की, किस युग-विशेष में, कौन सी भूमिका रही। मार्क्सवाद इन वर्गों की रची हुई संस्कृति को आँख मूँद कर ठुकराता नहीं है; न हवा में नयी मानव-संस्कृति की रचना करता है। वर्गयुक्त समाज में वर्ग-आधार पर जितना भी मनुष्य ने ज्ञान अर्जित किया है; मार्क्सवाद उसका मूल्यांकन करके उसे विकसित करता है।’ (‘प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ’, पृ॰ 76)
इसी प्रकार राहुल  सांकृत्यायन  के ‘सिंह सेनापति’ नामक उपन्यास की आलोचना करते हुए रामविलास जी लिखते हैं, ‘इस समस्या को थोड़ी देर के लिए हम छोड़ देते हैं कि वेदों ने वर्ण-व्यवस्था क़ायम की या नहीं। मान लीजिए, क़ायम की तो ऐतिहासिक विकास-क्रम में वह प्रगतिशील थी या नहीं ? निस्संदेह जैसे आदिम साम्यवाद के मुक़ाबले में दास-प्रथा प्रगतिशील थी; वैसे ही दास-प्रथा के मुक़ाबले में वर्ण-व्यवस्था भी प्रगतिशील थी।’ (वही, पृष्ठ 27)

शेष अगले अंक में ....

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