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मनोज सिंह

मुझे अकसर इस बात को जानने की उत्सुकता रहती है कि जो कुछ मैं लिख रहा हूं क्या वो पढ़ा जा रहा है? इसी प्रकार की कई और शंका-कुशंकाएं भी गाहे-बगाहे उठ खड़ी होती रहती हैं। मसलन लेखक को सही अर्थों में समझा जा रहा है या नहीं? बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। अगली दुविधा होती है कि लेख को उसके संदर्भित परिप्रेक्ष्य में लिया भी जा रहा है या नहीं? क्या उसे उचित व आवश्यक संतुलित दृष्टिकोण से जांचा-परखा जा रहा है? आदि-आदि। ऐसी आशंकाएं प्रायः हर लेखक के मन में कभी न कभी जरूर आती होंगी। एक बात और, सिर्फ नकारात्मक विचार ही नहीं आते, आखिरकार लेखक भी तो इंसान ही है, तभी तो कभी-कभी दिल के किसी कोने में एक चाहत भी चुपके से पैदा हो जाती है कि लिखा गया पसंद किया जा भी रहा है या नहीं? इस तरह की मानवीय इच्छाएं व महत्वाकांक्षाएं विभिन्न भावनाओं के साथ ओतप्रोत होकर लेखक को उद्वेलित करती रहती हैं। उत्पन्न हुआ अंतर्द्वंद्व लेखक की लेखनी के साथ कदमताल करता रहता है। ये तमाम उम्र निरंतर साथ चलते हैं। इससे इतर ऐसे भी कई लेखक मिल जायेंगे जो यह सरेआम कहते हैं कि हम सिर्फ लिखने में यकीन करते हैं, पढ़ने वाला है या नहीं, यह हमारी समस्या नहीं। उनके मतानुसार पढ़कर समझ आ रहा है या नहीं, यह भी पाठक की परेशानी है, लेखक की नहीं। बहरहाल, इस तरह के बयान, संबंधित लेखकों के अति आत्मविश्वास को कम उनके अहम्‌ को अधिक प्रदर्शित करता है। ऐसा लेखक कहीं न कहीं संकुचित मानसिकता का शिकार स्वयं ही होने लगता है। कुछेक तो यह भी कहते हुए सुने जा सकते हैं कि हमें आमजन से क्या लेनादेना, हम तो समझदार पाठकों के लिए लिखते हैं। इस वक्तव्य को तो बौद्धिक दिवालियेपन की निशानी के रूप में लिया जाना चाहिए। यूं तो इस तरह की मानसिकता व व्यवहार करने वाले का हर तरह से विरोध होना चाहिए, और होता है, मगर इसके बावजूद भी ऐसा कहने वालों की कमी नहीं। और तो और इस तरह के अक्खड़ व्यक्तित्व वाले कई बार अपना आधिपत्य भी जमा ले जाते हैं। साहित्य के क्षेत्र में ऐसे महानुभाव आम देखे जा सकते हैं। सत्य को प्रमाण की क्या आवश्यकता। साहित्य के क्षेत्र में बेसिर-पैर का लिखा भी खूब जाता है। लेकिन शायद फिर यही वजह, साहित्य को जनता से दूर करने का प्रमुख कारण बन जाती है। ऐसे में आम पाठक का दृश्य से गायब होना स्वाभाविक है।
उपरोक्त संदर्भ में, इस तरह के तथाकथित बुद्धिजीवी-लेखकों के विरोधस्वरूप, मन में एक सवाल उठा था कि जो समझदार पाठक है उन्हें इनके ज्ञान की आवश्यकता ही क्या है? दिमाग ने अपने आपसे अनायास ही तर्क किया था। यूं तो सैद्धांतिक रूप से यह कथन भी पूर्णतः ठीक नहीं। आखिरकार समझदार को भी उचित दिशा-निर्देश की आवश्यकता निरंतर बनी रहती है। लेकिन फिर सवाल उठता है कि यही बात, ज्ञान के झूठे गुरूर और खोखले अहम्‌ के शिकार उपरोक्त अपठनीय-अलोकप्रिय लेखकों पर भी लागू होनी चाहिए। क्या जरूरी है कि उनकी लिखी-कही बातें ठीक ही हों? ऐसे में उनकी सोच और विचार पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है। यही क्यों, सीधे-सरल शब्दों में कहें तो एक आम आदमी दूसरे की बात आखिरकार क्यूं माने? और वो भी तब जब उसे समझ भी न आये। निरक्षर-अज्ञानी भी व्यावहारिक समझ के आते ही तर्क-वितर्क करने लगता है। अपनी समझ अनुसार अच्छे-बुरे को परिभाषित करता है। ज्ञान का पहला अक्षर आते ही मस्तिष्क सवाल करने लग पड़ता है। शायद यही कारण है जो बौद्धिक क्षेत्र में टकराव होता रहता है। अधिकांश बुद्धिजीवी इसे ठीक मानते हैं। विचार-मंथन का ध्येय व उद्देश्य अत्यंत उपयोगी साबित हो सकता है। वास्तविकता में भी धरातल पर उतरकर देखें तो बौद्धिक क्षेत्रों में प्रबुद्धवाद व साम्राज्यवाद का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। बल्कि होना तो यह चाहिए कि विचारों को शब्दरूप देने से पहले, हर एक लेखक आत्ममंथन व अंतर्द्वंद्व के रास्ते से गुजरे। मन-मस्तिष्क को मंथे बिना अमृत संभव नहीं। उपरोक्त हठी लेखकों को यह सब समझाना ज्यादा जरूरी हो जाता है।
मानसिक जद्दोजहद हर सक्रिय सोच के लेखक की पहली पहचान है। इसे सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए। विचारों के साथ निरंतर उलझते हुए विश्लेषित करना उसकी प्रतिदिन की खुराक बन जाती है। यह विचारमंथन आगे से आगे बढ़ता चला जाता है। और धीरे-धीरे वृहद् समाज व लोकजन से जुड़ने लग पड़ता है। ऐसा लेखन साहित्य हित से भी निकलकर जनहित का सशक्त पक्ष बनकर उभरता है। यहां उसे आम पाठक से संवाद स्थापित करना होता है। सिर्फ संपर्क ही नहीं आपसी समझ भी पैदा करनी पड़ती है। इसी संदर्भ में आगे चले तो कहने वाले यह भी कहते-सुने जा सकते हैं कि गूढ़ साहित्य से तो अच्छा है पॉपुलर लेखन। लेकिन फिर यह खयाल भी आता है कि ऐसा लोकप्रिय लेखन भी किस काम का, जिसमें कोई चिंतन न हो, दर्शन न हो, जो पाठक के मस्तिष्क को हिला न सके, मन को विचलित न कर पाये, सोचने को मजबूर न करे। विचार जो दिल के साथ-साथ दिमाग को भी कंपित न करे, व्यर्थ है। सामाजिक-हित व संस्कारजनित मर्यादाओं के बिना विशुद्ध मनोरंजन भी जहर है। यह श्रेष्ठतम समाज व उन्नत संस्कृति के असमय लुप्त होने का कारण बन सकता है। युगों-युगों से, साहित्य और लोकप्रिय लेखन के बीच एक अघोषित प्रतिद्वंद्विता चली आ रही है। इसे सैद्धांतिक रूप में वैचारिक युद्ध भी कह सकते हैं। दोनों तरफ से शब्दों के बाण छोड़े जाते हैं। जमकर वाक्‌युद्ध होता है। पहला दूसरे को लुगदी साहित्य कहकर मजाक उड़ाना पसंद करता है तो सामने वाला क्लिष्टता का आरोप जड़ देता है। यह सत्य है कि एक ओर जहां हल्का-फुल्का लेखन है, मनोरंजन है, आम आदमी है, तो दूसरी ओर भारी-भरकम अस्पष्ट विचारों की भरमार होती है जिसका आम जीवन से कोई सरोकार नहीं और जो सामान्य पाठक से दूर होकर अलमारियों में बंद कर दिए जाते हैं। एक ओर साहित्यिक पुस्तकें पुस्तकालय में धूल खाती हैं और अव्यावहारिक जान पड़ती हैं तो दूसरी तरफ लोकप्रिय लेखन की अधिकांश पुस्तकें पढ़कर तुरंत फेंक दी जाती हैं। अगले दिन ही उसे भूला भी दिया जाता है। यूं भी उसमें क्षणिक मानसिक उत्तेजना व सतही वैचारिक सुख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता। यही नहीं ये हल्कापन समाज के लिए कई बार मुसीबत भी पैदा कर देता है। सवाल उठता है तो फिर क्या होना चाहिए? चूंकि साथ ही यह भी सच है कि ऐसा साहित्य जो सामान्य-जन की समझ से ही बाहर हो, उसका क्या औचित्य? ऐसे लेखन के उद्देश्य व उपयोगिता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। असल बात भी यही है कि जब शब्दों से कोई जीव जुड़ ही नहीं पाता तो उसमें जीवन कैसे संभव है? और ऐसा शब्द संसार किसी कोने में निर्जीव पत्थर की तरह पड़ा रह जाता है। ऐसा सिर्फ साहित्य के साथ ही नहीं, कला व भाषा के साथ भी होता है। कई कलाओं ने राजदरबार के भरपूर सहयोग के बावजूद महलों की ऊंची दीवारों के बीच दम तोड़ दिया तो कई कलाकार गलियों-बस्तियों की धूल खाकर भी युग की पहचान बन गये। यही हाल भाषा के इतिहास को खंगालने पर आसानी से देखा जा सकता है। आज आमजीवन में संस्कृत भाषा का नामोनिशान भी नहीं। जबकि सशक्त व समृद्धता के मामले में इसके समकक्ष किसी दूसरी भाषा को खड़ा करना मुश्किल काम है। इसमें लिखे गए विशिष्ट ज्ञान की कोई सीमा नहीं। ये सागर की तरह गहरा और गागर में भरा पड़ा है। तो फिर इसकी अलोकप्रियता का कारण? हम सभी जानते हैं कि महान उत्कृष्ट विचार संस्कृत भाषा में एक रहस्य के रूप में युगों तक छिपे रहे थे। और सिर्फ आम भाषा में आने के बाद ही जन-जन में प्रचलित हो पाये। इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि सरल प्रवाहपूर्ण भाषा में लिखी गई जनप्रिय रचनाओं का कोई मेल नहीं। रामायण और महाभारत इसका एक जीता-जाता उदाहरण है। जिसमें आम संस्कृति के साथ कथारस इतना प्रभावपूर्ण व भावपूर्ण है कि पीढ़ियों से गुनगुनाया जा रहा है। पढ़े-लिखे हो या अनपढ़ किसी को भी इन महान रचनाओं को समझने में दिक्कत नहीं होती। और वो इसके पीछे छिपे हुए तथ्यों को, विचारों को, अपनी समझ तक आसानी से ला पाता है। जीवन में उतारकर स्वयं को सार्थक बना पाता है। उसे आत्मिक-सुख की प्राप्ति होती है। वाल्मीकि रामायण की जगह तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अधिक प्रचलित और लोकप्रिय होने के पीछे भी भाषा व विचारों की सरलता प्रमुख कारण है। आम जीवन से जुड़े कबीर और रहीम के दोहे सदियों से लोगों की जुबान पर हैं, मगर बिहारी सारगर्भित होते हुए भी लोकप्रिय नहीं। प्रेमचंद अपने समकालीन जयशंकर प्रसाद से अधिक पढ़े और पसंद किए जाते हैं। आखिर क्यों? हम सभी जानते हैं कि वो भाषा व विचारों में कितने क्लिष्ट हैं।
शायद यही कारण हैं जो लिखने से पूर्व इस बात पर ध्यान अवश्य जाता है कि कुछ ऐसा लेखन किया जाए जो जनसामान्य के लिए तो लिखा ही गया हो मगर साथ ही उसमें समाज की भलाई भी हो। वो जन-लोकहितकारी हो, कल्याणकारी हो। इसे जनसाहित्य नाम दिया जा सकता है। एक ऐसा साहित्य, जनता जिसे समझ सके। अपने आपसे जोड़ सके। अपने आपको कहीं न कहीं संदर्भित महसूस करे। शायद इसी में लेखन की सार्थकता है और लेखक होने का औचित्य।
 
 


यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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