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प्रदीप वर्मा

एक खिड़की खुली रखना
बाहर से अन्दर  कि और
जिस से आती रहें
बदलते मौसम के संदेशे
पहली बारिश  में भीगती
भूमि की सौंधी  सौंधी सुगंध
नए नए खिले फूलों  को छूकर
गुनगुनाते भवरों  के गान
और आती रहें
पतझड़ में टूटे हुए पत्तों कि सिसकियाँ
मुरझा के गिरते  हुए फूलों कि 
अंतिम पत्तियां
जलती दोपहर  कि झुलसती हवाएं
अच्छे बुरे दौर  का गुजरना दीखता रहे
बहार से अन्दर  कि और 
एक खिड़की खुली रखना 



यह रचना प्रदीप वर्मा जी की है . आप कवितायेँ ,लेख तथा ग़ज़ल आदि लिखते है .आपकी कुछ रचनाएँ हिन्द-युग्म में प्रकाशित हुई है। कुछ लेखों का प्रकाशन इन्दौर के नई दुनिया अखबार मे हुआ है।

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