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फिराक गोरखपुरी
ये माना ज़िन्दगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी

खुदा को पा गया वाइज़, मगर है

जरुरत आदमी को आदमी की

मिला हूँ मुस्कुरा कर उस से हर बार

मगर आँखों में भी थी कुछ नमी सी

मोहब्बत में कहें क्या हाल दिल का

खुशी ही काम आती है ना ग़म ही

भरी महफ़िल में हर इक से बचा कर

तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली

लड़कपन की अदा है जानलेवा

गजब की छोकरी है हाथ भर की

रक़ीब-ए-ग़मजदा अब सब्र कर ले

कभी उस से मेरी भी दोस्ती थी 


फिराक गोरखपुरी ( रघुपति सहाय) उर्दू भाषा के प्रसिद्ध रचनाकार है।उन्हें  साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किया गया।  १९७० में इन्हें साहित्य अकादमी का सदस्य भी मनोनीत कर लिया गया था। फिराक गोरखपुरी की शायरी में गुल-ए-नगमा, मश्अल, रूहे-कायनात, नग्म-ए-साज, गजालिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, रम्ज व कायनात, चिरागां, शोअला व साज, हजार दास्तान, बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधीरात, परछाइयाँ और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचना फिराक साहब ने की है। उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियाँ भी लिखी हैं। उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुई हैं।

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