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डॉ.कंचन प्रभा
कुछ भी हासिल नहीं होता
रोने और गिड़गिड़ाने से ।
हासिल होता है -
चीखने चिल्लाने से ,
तन कर सर उठाने से ।

चुप रहोगे , करार निर्बल दिए जाओगे ।
आवाज उठाने पर ,
जगह बना जाओगे .
और आवाज में गर ,
शामिल आवाज हो जाए -
नया इतिहास बना जाओगे ।

इसीलिए -
न रहो चुप्पियों के घेरे में ,
न शांति के बसेरे में ,
समय की पुकार पर ,
ठानो तुम कलयुग का पार्थ ।
यही पुकार है आज की -
सवाल है भविष्य की ।


यह रचना डॉ.कंचन प्रभा श्रीवास्तव जी की  है । आप कोलकाता में अध्यापन कार्य में संलग्न है तथा स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य से जुडी हुई है ।

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