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गतांक से आगे ....

डॉ.रामविलास शर्मा

सन् 1950 का समय रहा होगा। डा. रामविलास शर्मा के आलोचक पर मैंने एक आलोचनात्मक लेख तैयार किया। यह लेख अकोला-विदर्भ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘प्रवाह’ में छपा। श्री. गजानन माधव मुक्तिबोध जब उज्जैन में एक बार मुझसे मिलने मेरे निवास पर आये, तब उन्होंने इस लेख का भी जि़क्र किया और अपनी निराशा प्रकट की। वे मुझसे तगड़े लेख की अपेक्षा रखते थे। उनकी प्रतिक्रिया मस्तिष्क में आगे बनी रही। फलस्वरूप, आगे सुविधानुसार इस लेख को पुनरीक्षित-परिवर्द्धित किया और श्री. लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’ जी द्वारा सम्पादित मासिक ‘अवन्तिका’ (पटना) में पुनः प्रकाशित करवाया। डाक्टर साहब ने इसे देखा-पढ़ा। इस संदर्भ में उनका पत्र इस प्रकार है : 
गोकुलपुरा, आगरा / दि. 4-1-56 
प्रिय भाई,
तुम्हारा  31/12 का कार्ड मिला। ‘अवन्तिका’ मिल गई थी; लेख पढ़ लिया है। इधर मेरे विरुद्ध लिखने में ज़्यादा साहस की आवश्यकता नहीं रही; पक्ष में लिखना बहुतों के लिए दुस्साहस ही रहा। इसलिए बधाई।
मेरी समझ  में प्रगतिशील आन्दोलन  पर लिखते हुए हिन्दी साहित्य  के विभिन्न युगों और साहित्यकारों के मूल्यांकन पर विभिन्न  मतों का स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए, तभी विचार-धारा के संघर्ष का महत्त्व स्पष्ट होगा।
वैसे मैं दैत्य नहीं हूँ, बौद्धिक भी नहीं। मेरी अनेक आलोचनाओं में Persuasive power की कमी रही है। इसलिए कविता की ओर भी ध्यान दे रहा हूँ।
रघुनाथ  विनायक तावसे ने ‘हंस’ में एक बार मेरी कविताओं पर लेख लिखा था। मुझे अच्छा लगा था। क्या उनका पता तुम्हें मालूम है ? और गजानन माधव मुक्तिबोध का ? इधर दिल्ली गया था। नरेन्द्र शर्मा ने कई बहुत अच्छी कविताएँ लिखी हैं।
मेरी कौन-कौन-सी किताबें तुम्हारे पास हैं, लिख भेजो। बाक़ी भिजवा दूंगा।
तुम्हारा,
रामविलास  शर्मा 
महेंद्र भटनागर
      डा. रामविलास शर्मा जी पर लिखा मेरा उपरि-निर्दिष्ट आलोचनात्मक लेख डा. नत्थन सिंह जी-द्वारा सम्पादित ‘आलोचक रामविलास शर्मा’ नामक पुस्तक में भी समाविष्ट है। ‘आलोचना-समग्र’  में तो है ही। लेख में एक स्थल पर मैंने डा. रामविलास शर्मा जी को ‘बौद्धिक दैत्य’ लिखा है! उसी के उत्तर में उन्होंने लिखा - ‘वैसे मैं दैत्य नहीं हूँ; बौद्धिक भी नहीं।’ डा. रामविलास शर्मा जी के कवि-हृदय से सभी परिचित हैं। ‘तार सप्तक’ के वे भी एक कवि हैं। ‘रूप तरंग’ उनका प्रसिद्ध कविता-संग्रह है।
      ‘नई चेतना’ नामक अपने कविता-संग्रह की पाण्डुलिपि के साथ, एक बार, आगरा गया था (दि. 21-3-53)। डाक्टर साहब से भी मिलना हुआ — उनके निवास पर। रामविलास जी पलंग पर औंधे लेट कर लेखन-कार्य में रत थे। सिरहाने की तरफ़ कागज़ का बंडल था। ‘नई चेतना’ कुछ देर तक उन्होंने देखी; कुछ कविताएँ पढ़ीं और मेरे कहने पर तत्काल अपना अभिमत पृथक से लिख कर दिया : 
      ‘श्री महेन्द्र नई पीढ़ी के प्रभावशाली कवि हैं। उनकी भाषा सरल और भाव मार्मिक होते हैं। उनमें एक तरफ़ जनता के दुख-दर्द से गहरी सहानुभूति है तो दूसरी तरफ़ उसके संघर्ष और विजय में दृढ़ विश्वास भी है। आशा और उत्साह उनकी कविता का मूल स्वर है।’ 
      यह  संग्रह सन् 1956 में ‘श्रीअजन्ता प्रकाशन, पटना’ से प्रकाशित हुआ।
      मार्च सन् 1954 की बात है। डा. रामविलास जी को, सन् 1953 में प्रकाशित अपना कविता-संग्रह ‘बदलता युग’ भेज रखा था। इसकी भूमिका प्रो. प्रकाशचंद्र गुप्त जी ने लिखी थी। डा. रामविलास शर्मा जी से मैंने इस कृति पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। सोचा न था; इतना उत्साहवर्द्धक अभिमत वे लिख भेजेंगे: 
      “ कवि महेन्द्रभटनागर की सरल, सीधी ईमानदारी और सचाई पाठक को बरबस अपनी तरफ़ खींच लेती है। प्रयोग के लिए प्रयोग न करके, अपने को धोखा न देकर और संसार से उदासीन होकर संसार को ठगने की कोशिश न करके इस तरुण कवि ने अपनी समूची पीढ़ी को ललकारा है कि जनता के साथ खड़े होकर नयी जि़न्दगी के लिए अपनी आवाज़ बुलन्द करे।
      महेन्द्रभटनागर  की रचनाओं में तरुण और उत्साही  युवकों का आशावाद है, उनमें नौजवानों का असमंजस और परिस्थितियों से कुचले हुए हृदय का अवसाद भी है। इसी लिए कविताओं की सचाई इतनी आकर्षक है। यह कवि एक समूची पीढ़ी का प्रतिनिधि है जो बाधाओं और विपत्तियों से लड़कर भविष्य की ओर जाने वाले राजमार्ग का निर्माण कर रहा है।
      महेन्द्रभटनागर  की कविता सामयिकता में  डूबी हुई है। वह एक ऐसी  जागरूक सहृदयता का परिचय  देते हैं जो अशिव और असुन्दर के दर्शन से सिहर उठती है तो जीवन की नयी कोंपलें फूटते देख कर उल्लसित भी हो उठती है।
      कवि के पास अपने भावों के लिये शब्द हैं, छंद हैं, अलंकार हैं। उसके विकास की दिशा यथार्थ जीवन का चितेरा बनने की ओर है। साम्प्रदायिक द्वेष, शासक वर्ग के दमन, जनता के शोक और क्षोभ के बीच सुन पड़ने वाली कवि की इस वाणी का स्वागत ।— 
        ‘जो गिरती दीवारों पर नूतन जग का सृजन करे
                वह जनवाणी  है !
                वह युगवाणी  है !” 
          • रामविलास  शर्मा / दि. 26-3-54
 

शेष अगले अंक में ....

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