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सूरदास 
राग मलार
मिटि गई अंतरबाधा
खेलौ जाइ स्याम संग राधा।
यह सुनि कुंवरि हरस मन कीन्हों मिटि गई अंतरबाधा॥
जननी निरखि चकित रहि ठाढ़ी दंपति रूप अगाधा॥
देखति भाव दुहुंनि को सोई जो चित करि अवराधा॥
संग खेलत दोउ झगरन लागे सोभा बढ़ी अगाधा॥
मनहुं तडित घन इंदु तरनि ह्वै बाल करत रस साधा॥
निरखत बिधि भ्रमि भूलि पर्यौ तब मन मन करत समाधा॥
सूरदास प्रभु और रच्यो बिधि सोच भयो तन दाधा॥



हिन्दी साहित्य के आकाश में महाकवि सूरदास सूर्य के रूप में विद्यमान है अष्टछाप के कवियों में सूरदास सर्वश्रेष्ठ कवि थे इनके जन्म स्थान ,जन्म तिथि ,अंधत्व तथा जाति के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है सूरसाहित्य के विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुंचे है किसं.१५३५ की बैसाख शुक्ल  को इनका जन्म हुआसूरदास की  प्रमुख रचनायें मानी जाती है - "सूरसागर", "साहित्यलहरी" एवं "सूरसारावली"  परन्तु इनकी अक्षयख्याति का कारण सूरसागर है।  महाकवि सूर अन्य भक्त कवियों की तरह एक उच्च कोटि के भक्त पहले माने जाते है,कवि बाद में कविता करना इनका मुख्य लक्ष्य नही था सूर का वात्सल्य एवं श्रृंगार वर्णन हिन्दी साहित्य की अमर निधि है इन्होने बड़ी तन्मयता से श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं  का चित्रण किया है।  

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