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मनोज सिंह
महान कृतियां समय की सीमाओं को तोड़ती हुई हर काल में संदर्भित और प्रासंगिक होती हैं। और इसीलिए कालजयी कहलाती हैं। असल में मानवीय स्वभाव मूल रूप से सदा एक-सा बना रहता है और हर युग में अपना रंग दिखाता रहा है। जो रचनाकार इस साधारण से लगने वाले असाधारण तथ्य को केंद्र में रखकर रचना का सृजन करता है, उसके ऐतिहासिक होने की संभावना बढ़ जाती है। कहते भी तो हैं-आदमी का स्वभाव कहां बदलता है। हममें से अधिकांश सदियों से, कम या ज्यादा, लोभी, धूर्त, झूठे, क्रोधी, आत्मकेंद्रित और महाभोगी रहे हैं और अब तक तो यही लगता है कि भविष्य में भी रहेंगे। तो फिर कहने की आवश्यकता नहीं कि समाज की सारी बीमारियों का कारण भी यही रहा है और रहेगा।
धर्म को एक पल के लिए अनदेखा कर दें तो हिंदुस्तान की दो महान रचनाएं 'महाभारत' और 'रामायण', ऐसी कृतियां हैं जो हर काल में, हर समाज के लिए बराबर से उपयोगी रही हैं। नाम, भाषा, वेशभूषा, रहन-सहन और खान-पान बदल सकता है मगर  इनका कथासार आज भी सार्थक लगता है। कहते भी हैं कि जो महाभारत में नहीं है वो कहीं नहीं है और जो समाज में है वो महाभारत में अवश्य है। दूसरी ओर रामायण को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। यहां आदर्श व्यक्तित्व और उत्कृष्ट समाज, प्रतीक बनकर उभरते हैं। सीधे कहें तो रामराज्य की स्थापना का उद्देश्य निहितार्थ है। बुराई पर अच्छाई की जीत को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जहां एक ओर रावण राक्षसी प्रवृत्ति का तो दूसरी ओर राम देवगुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
रावण में ऐसी कौन-सी बुराई नहीं थी जिसकी आज भी कल्पना की जा सके? कोई नहीं। वो लोभी व ढोंगी था, छलकपटी, बहुरूपिया, अहंकारी, दंभी, अत्याचारी, व्यभिचारी, धोखेबाज भी और आत्मकेंद्रित व स्वार्थी भी। यह सूची और लंबी भी हो सकती है। उसके इन तमाम अवगुणों को चरित्र में निरूपित करने के लिए अलग-अलग घटनाएं कहानियों में पिरोयी गई हैं। पराई स्त्री के हरण से लेकर पूरे राष्ट्र को बेवजह युद्ध की विभीषिका में झोंकने तक में कहीं न कहीं इनका प्रदर्शन हुआ। उसकी तामसिक प्रवृत्ति को हवा देने वालों की जहां कमी नहीं, जैसे कि उसकी बहन शूर्पणखा और बेटा इंद्रजीत आदि, वहीं पर उसे अच्छाई का रास्ता दिखाने वालों की भी कमी नहीं थी। धर्मपत्नी मंदोदरी और भाई विभीषण को इसी वर्ग में रखा जा सकता है। मगर आदमी वही करता है, वही रास्ता चुनता है, जहां उसकी अपेक्षित इच्छा पूरी होती हो और जो उसे पसंद है। रावण तो यहां यह दोष भी नहीं लगा सकता कि उसे समझाने और बताने वाला कोई नहीं था। वैसे तो वह स्वयं महाज्ञानी था। लेकिन उसके ज्ञान और कुशाग्र-बुद्धि का इस्तेमाल गलत रास्तों पर ही होता रहा। राक्षस अमूमन सदा से शक्तिशाली रहे हैं और रावण तो महाबलि था। उसने अपने पराक्रम से असीमित संपत्ति भी अर्जित कर रखी थी। सारी सुख-सुविधाओं और वैभव से संपन्न जीवन। मगर संतोष नहीं। सच तो है, शक्ति और धन तो केवल माध्यम मात्र है। ये जीवन का ध्येय नहीं हो सकते। यही कारण है कि इनका उपयोग कैसे और किसलिए हो रहा है ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। मंजिल सुनिश्चित होने पर वहां तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जो रास्ते दिशाहीन हों वो मंजिल पर पहुंच ही नहीं सकते। ज्ञान भी अपने आप में कुछ नहीं, इसके इस्तेमाल का उद्देश्य सदा से अधिक महत्वपूर्ण रहा है। सृजन और विध्वंस दोनों में ही शक्ति, ज्ञान और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। परमाणु बम का इस्तेमाल हम विद्युत उत्पादन के लिए भी कर सकते हैं और विनाश के लिए भी। अच्छाई और बुराई कर्म में नहीं होती, कर्म करने वाले के उद्देश्य में ढूंढ़ी जानी चाहिए। बहरहाल, रावण भोगी भी तो था, उसे स्वयं के अलावा कुछ और कहां दिखाई देता था। अपनी भौतिक इच्छाओं व सांसारिक चाहतों को उसने कभी नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की। तपस्वी तो था मगर ध्येय सदा से स्वकेंद्रित रहा। तभी तो मांगें जाने वाले वरदानों में कहीं न कहीं उपरोक्त अवगुणों का प्रभाव बड़ी आसानी से समझा व देखा जा सकता है। एक बार फिर यही बात उभरकर आती है कि तपस्या और तपस्वी महत्वपूर्ण नहीं, महत्वपूर्ण है कि यह किसलिए और क्यों किया जा रहा है? उद्देश्य क्या है? जितने भी ऐतिहासिक (खल) नायक चरित्र हुए हैं सभी ने तपस्या कर रखी है। मगर उनके वरदानों से उनकी मंशाएं आसानी से समझी जा सकती हैं। आदमी वही चाहता-मांगता है, जिसकी जड़ें उसके दिल में दबी-छिपी इच्छाओं से सिंचित होती हैं।
महानायक मर्यादापुरुषोत्तम राम अच्छाई के प्रतीक के रूप में उभरते हैं। एक आज्ञाकारी पुत्र, पिता-तुल्य बड़ा भाई, संवेदनशील विश्वसनीय जिम्मेदार पति और स्वाभिमानी आदर्श राजा। वे शक्तिवान होने के साथ-साथ त्याग की मूर्ति भी हैं। उनके आचरण में ÷मैं' कहीं व कभी उभरकर नहीं आता। हर मुद्दे पर प्रजातांत्रिक तरीके से काम करने की कोशिश। सत्य पर अटूट विश्वास और अहिंसा के परम पुजारी। तभी तो बहुत कुछ जानते हुए भी अंत तक दुश्मन को भी पूरी तरह से समझाने का प्रयास करते। वो दूसरों का दुःख समझते। स्वयं का सुख और स्वार्थ कभी आड़े नहीं आता। 'मैं' और 'मेरा' से पहले राष्ट्र और समाज। चारित्रिक बल और नैतिक सहनशीलता की तो अद्वितीय मिसाल। वे भी ज्ञानी थे, बलशाली थे लेकिन शक्ति का दुरुपयोग कभी नहीं किया। इतना ही नहीं हर बार बल प्रयोग करने पर उसके कारणों का पूरा सार्थक तर्क भी प्रस्तुत किया। इसके बावजूद उनका जीवन कष्टों में बीता। तो क्या हुआ, अजेय मगर अत्याचारी रावण से समाज को मुक्त तो कराया।
आज मेरा उद्देश्य यहां रामचरितमानस के महान नायक जन-जन के आराध्य राम और विशिष्ट राक्षस रावण का चारित्रिक विश्लेषण करना नहीं है। मैं न तो रामायण का ज्ञानी हूं न ही एक जीवन में इसे पूरी तरह से समझने की मन में कोई गलतफहमी पाल सकता हूं। मगर हां, इतना तो मानना होगा कि धर्म और जाति आदि में पूरी तरह बंटकर टूट रहा समाज, अपने पूर्वाग्रहों को किनारे करते हुए, इन चरित्रों में से महत्वपूर्ण कथासूत्र को ढूंढ़ कर, स्वयं का सामाजिक जीवन बेहतर कर सकता है। इस बात पर तो किसी को मतभेद नहीं होगा कि आज के युग में भी रावणों की कमी नहीं। वे हमेशा की तरह शक्तिशाली हैं। बल्कि पहले की अपेक्षा अधिक संगठित भी हैं। वे ढोंगी, चतुर-चालाक, बहुरूपिया तो हैं ही, समय के साथ-साथ कई मामलों में रावण का बेहतर मॉडल भी बन चुके हैं। वे पूर्व की तरह ज्ञानी तो हैं मगर सच पूछा जाए तो अब शब्दों का जमकर उपभोग और दुरुपयोग भी बड़ी सफाई से करते हैं। शाब्दिक मायाजाल के माध्यम से अपने आप को इस तरह से प्रस्तुत व प्रदर्शित करते हैं कि मानो उनसे अधिक शरीफ कोई और नहीं। उनका आचरण इतना साफ लगता है कि प्रथम दृष्टांत भ्रमित भी नहीं करता। रामायण को चित्रित करने के दौरान चित्रकारों ने अमूमन रावण को राक्षस के रूप में दिखाया, जबकि आज के कई रावण तो अति सुंदर, आकर्षक और कभी-कभी निर्दोष व भोले भी दिखाई देते हैं। इन (अव)गुणों के परिणामस्वरूप ये सत्ता को नियंत्रित और समाज को वश में करने में सफल हो जाते हैं। आज इनका हर क्षेत्र में वर्चस्व है। यूं तो अवाम पूर्व की अपेक्षा अधिक शिक्षित व जागरूक जरूर है मगर वो समझ नहीं पाता और इनकी चाल में फंस जाता है। और अगर समझता भी है तो लाचार है। आज का रावण मूर्ख बनाने में पूर्व की अपेक्षा ज्यादा माहिर है। और कुछ नहीं तो ध्यान तो बंटाया ही जा सकता है। और इस तरह से आधुनिक रावण आमजन की जीवन-ऊर्जा चूसकर अधिक शक्तिशाली बन चुके हैं। परिणामस्वरूप आम आदमी का निस्सहाय व कमजोर होते जाना स्वाभाविक है। चेहरे उदास तो मन में तूफान। अवाम असंतोष की ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है। और खुद को जला रहा है। ऐसा नहीं कि देवताओं व भद्र लोगों की कमी है। वे भी इसी दुनिया में हैं। उनमें कई ज्ञानी और शक्तिशाली हैं। मगर उपरोक्त कथा-साहित्य में अन्य देव-चरित्र की तरह निष्क्रिय हैं। बेशक ऐसा लगता हो कि आज इनकी संख्या कम है। मगर यह सत्य नहीं है। हां, वो हमेशा की तरह संगठित नहीं हैं। उन्हें बड़ी खूबसूरती से बांट दिया गया है। कई तो आधुनिक असुरों के नियंत्रण में हैं और समय-समय पर उनके द्वारा इस्तेमाल भी कर लिये जाते हैं। असुर बुद्धिजीवियों द्वारा उन्हें वैचारिक, आध्यात्मिक, नैतिक रूप से भ्रमित भी किया जाता है जिससे कि वो संघर्ष का रास्ता छोड़ निष्क्रिय पड़े रहें और राक्षसों का वर्चस्व बना रहे। संक्षिप्त में कहें तो इतिहास पुनः स्वयं को दोहराता-सा प्रतीत होता है।
कलियुग को राम-लक्ष्मण-सुग्रीव-हनुमान की तलाश है। ये आसमान से अवतरित नहीं होते, हमारे दिल में निवास करते हैं। बस उन्हें जगाना होगा। आधुनिक देवताओं को समझना होगा कि राम को भी अंत में रावण के साथ युद्ध करना पड़ा था। संघर्ष के दौरान उन्होंने भी अपनी तमाम शारीरिक व मानसिक शक्तियों का खुलकर प्रयोग किया। वानर सेना को संगठित किया। ये सब कथासूत्र में प्रतीक बनकर उभरते हैं और पाठक को समझने का स्पेस प्रदान करते हैं। राम ने सिर्फ बातों से नहीं, सक्रिय होकर रास्ते में आने वाली हर मुसीबत का सामना किया था। राजनीति, कूटनीति व नीतिशास्त्र के साथ-साथ हर वो हथियार प्रयोग किये थे जो युद्ध के मैदान में अपनाये जाने चाहिए। समस्त भौतिक, दैवीय व आध्यात्मिक शक्तियों को केंद्रित किया जिससे रावण का सर्वनाश हो। उद्देश्य साफ था कि बुराई पर अच्छाई की जीत हो। मगर आज बड़ी मुश्किल इस बात की है कि वर्तमान आधुनिक युग के राम इस बात को मानने को तैयार नहीं कि रावण को समाप्त करने के लिए अस्त्र उठाना पड़ता है। अब कौन समझाये कि जब सतयुग के राम ने शस्त्र उठाये थे तो आज तो घनघोर कलियुग है। वोट, विरोध और विद्या तथा सत्याग्रह उसके आधुनिक अस्त्र-शस्त्र हो सकते हैं मगर उपयोग तो उसे ही करना है। आज के राम को अहिंसा की परिभाषा को समझना होगा। आत्मसुरक्षा में किया कर्म हिंसा नहीं होता। जहां उद्देश्य समाज का कल्याण हो वो धर्मयुद्ध कहलाता है। और जनकल्याण में किया गया विद्रोह जनक्रांति बन जाता है। क्रांति से ही शांति की स्थापना होती है। गलत बातों का विरोध न करने पर यह तेजी से फैलती है। अत्याचार सहना कायरता की निशानी है। उलटे यह अप्रत्यक्ष रूप से सामने वाले को हिंसा करने के लिए प्रेरित करती है। सरल शब्दों में कहें तो दूसरों पर बिना किसी कारण स्वार्थवश शक्ति-बल का प्रयोग हिंसा है। जबकि रावण का नाश सामाजिक अहिंसा को परिभाषित करता है। चूंकि इसी तरह से हम उसकी हिंसा को रोक पाएंगे। यह हमें समझना होगा। क्या हम उस दिन का इंतजार कर रहे  हैं जब आज का रावण सारी लक्ष्मण रेखाओं को पार करके हमारी इज्जत व अस्मिता का अपहरण कर ले, हमारे स्वाभिमान को चोट पहुंचाये और अस्तित्व को चुनौती दे, हमारा सुख-चैन छीन ले? हमें समय रहते सचेत होना होगा। अधर्म पर जीत के लिए धर्म ने हर युग व हर काल में युद्ध किया है। महापापी राजाओं के खिलाफ तो ऋषि-मुनियों ने भी शस्त्र उठाये। रावण को खत्म करना है तो उसका नाश आवश्यक है। उसके हृदय-परिवर्तन का प्रयास मूर्खता है। यह हमें स्वीकार करना होगा कि सभी राक्षस विभीषण नहीं हो सकते।
 

यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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