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रणजीत कुमार
अँधेरे से बगावत  रौशनी से मैत्री की है
टुकडों में  विभाजित जीवन ने
कुछ ऐसी अब करवट ली है
राह भी नयी हैं मंजिल की परिभाषा बदली
और बदले हैं  हमसफ़र नयी राहों में
अद्भूत सी चमक  झलक रही निगाहों में 
हमकदम साथ दूर तलक न कोई तन्हाई है
उत्साह ये नहीं की मंजिल करीब आई है
अब नए पड़ाव आयेंगे जुडेंगे मंजिल असंख्य
उत्साह ह्रदय  के बेताब उड़ने को मिलेंगे  पँख 
 

यह रचना रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य, विज्ञान के क्षेत्र में है . साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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