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कुछ समय पूर्व तक बच्चों को उनके दादा-दादी व नाना-नानी उंगली पकड़कर सड़क पार कराया करते थे। गाड़ियों के अचानक आ जाने का भय रहता था। आज बूढ़ों को छोड़िए जवान भी कई रास्तों को आसानी से पार नहीं कर सकते। पूर्व में ऐसा माना जाता कि आम शहर का युवक भी मुंबई की सड़कों को पार करने में थोड़ी मुश्किल महसूस करता था। आज मुंबई-दिल्ली के अतिरिक्त हिन्दुस्तान में ऐसे कई शहर मिल जाएंगे जहां पर मोटरगाड़ियों की तेज रफ्तार से दौड़ते कतारबद्ध ट्रैफिक के बीच में से निकलना संभव ही नहीं। और अगर किसी ने जान जोखिम में डाली तो हाथ-पैर टूटने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कोई इस तरह की बेवकूफी न करे इसलिए अब कई स्थानों पर सड़कों के दोनों ओर लोहे की कंटीली तार की फेंसिंग लगा दी जाती है। और आदमी चाहकर भी एक किनारे से दूसरे किनारे नहीं जा सकता।
तेज दौड़ती गाड़ियों की प्राथमिकता का दबाव है कि राष्ट्रीय राजमार्ग को कई स्थानों पर पूरी तरह से किलेबंद कर दिया जाता है। गांव और कस्बों के बीच में से निकलने के दौरान इन रास्तों के दोनों साइडों पर लोहे की मजबूत जाली लगा दी जाती है। यहां उद्देश्य किसी भी प्रकार की सड़क दुर्घटना को बचाना जरूर लगता है, मगर यह बहुत हद तक सतही होता है, असल में चार-पहिया वाहनों को कोई रुकावट न हो, यह बात मूल में कहीं होती है। बहरहाल, इस चक्कर में कई रिहायशी इलाके दो टापू में परिवर्तित हो जाते हैं। लोग अक्सर इस व्यवस्था को व्यवहारिक रूप में नहीं स्वीकार कर पाते और अपनी सुविधा को देखते हुए इसे कई स्थानों से उखाड़कर दो पहिया वाहन और पैदल का मार्ग फिर से बना लेते हैं। दूसरी ओर लाखों की हाईटेक  मोटर-गाड़ियां, सामने साफ-सुथरी किलेबंद सपाट सड़कें, ऐसे में वाहन चालकों को मानो तेज गाड़ी चलाने का लाइसेंस मिल जाता है। ऐसी अवस्था में किसी पैदल व साइकिल यात्री का सड़क पार करना और दुर्घटनाग्रस्त होने पर चोट खाना या मर जाना स्वाभाविक है। उपरोक्त व्यवस्था में वाहन चालक इसके लिए राहगीरों को ही दोष देते हैं। आजकल तो यह बहुत हद तक सही भी मान लिया जाता है। अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से रोड पर मोटर-कार चलाने वाले का साम्राज्य मान लिया गया है। तभी तो सजा के रूप में भी अधिकांश में आर्थिक दंड देकर वाहन चालक को अमूमन छोड़ दिया जाता है। यही नहीं, वाहन चालकों को इस असुविधा से भी बचाने के लिए आगे व्यवस्थाएं कुछ इस तरह की जाती हैं कि पैदल चलने वाला आदमी सड़कों पर आये ही नहीं। और सख्ती से कई प्रयोग किए जाते हैं। नये-नये जतन के साथ। कई स्थानों पर कस्बों के बीच से गुजरते समय सड़क को जमीन से थोड़ा ऊपर उठा दिया जाता है। या फिर आने और जाने वाले मार्ग के बीच में भी ऊंचाई का अंतर कर दिया जाता है। ऐसे में पैदल और साइकिल व रिक्शेवाला सड़क पार कर ही नहीं सकता। ऐसा करके हम राष्ट्रीय राजमार्ग पर अपने विकास की दौड़ को सरपट भागते दिखाने में सफल भी हो जाते हैं। और अति सुंदर चित्रों को दुनिया को दिखाकर फूले नहीं समाते।
मगर क्या यह आम आदमी के लिए वास्तव में विकास है? बड़ा सवाल हो सकता है। इस पर वाद-विवाद हो सकता है। लेकिन इससे सामान्य जन को होने वाली परेशानियों को समझने में अधिक बुद्धि की आवश्यकता नहीं। कस्बे के जिस भाग से ये राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं, वो हिस्सा दो भागों में बंट जाता है। कुछ समय पूर्व तक आमने-सामने रहने वाले परिवार, घर व संस्थाएं जो मिनटो में एक-दूसरे के पास आया-जाया करती थीं, उन्हें मिलों की दूरी दिखाई देती है। वे एकदम नजदीक होते हुए भी एक-दूसरे के पास आसानी से नहीं आ-जा सकते। इस बात पर तुरंत सफाई दी जाएगी कि सड़क पार करने के लिए जगह-जगह पर व्यवस्थाएं बनाई जाती हैं। अंडरग्राउंड या ओवर ब्रिज या फिर रोड क्रास करने की एक जगह सुनिश्चित की जाती है। मगर यह आमतौर पर इतनी दूर होती है कि आदमी कुछ मीटर की दूरी तय करने के लिए सैकड़ों मीटर का रास्ता तय करता है। और कई जगह तो यह दूरी कुछ ज्यादा ही लंबी हो जाती है।
ऐसा नहीं कि इन सबसे होने वाली असुविधा सिर्फ पैदल यात्री ही भोगते हैं। शहरों के बीच में तो वाहन चालकों को भी तंग होना पड़ता है। एक मार्ग में एक साइड से जाते समय बगल में वापसी मार्ग पर स्थित दुकान-घर पर जाने के लिए कई बार यू-टर्न लेने के लिए मीलों तक जाकर वापस लौटना पड़ता है। यही नहीं, प्रमुख बाजारों में पार्किंग की व्यवस्थाएं दूर होती हैं। अगर आपके पास ड्राइवर की व्यवस्था नहीं है तो स्वयं गाड़ी पार्क करके वापस नियत स्थान पर पहुंचना अपने आप में बहुत बड़ा काम बन जाता है। किसी नये शहर में एक मोड़ गलत ले लेने पर कई बार दस पन्द्रह मिनट का बेफालतू चक्कर लगाने के लिए आदमी मजबूर हो जाता है। यह समय अधिक भी हो सकता है।
इन सब मुश्किलों और परेशानियों को पढ़कर आमतौर पर यही कहा जाएगा कि आमजन की सुरक्षा व यातायात को सुचारु ढंग से व्यवस्थित चलाने के लिए यह सब आवश्यक हो जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि लंबे ट्रैफिक जाम की मुसीबतों का पहाड़ देखकर, डिवाइडर, चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल, यू-टर्न की मनाही, गोल चौराहों को खत्म करना एवं मल्टीपल फ्लाईओवर बनाने के अतिरिक्त कोई और रास्ता दिखाई नहीं देता। राजमार्ग को भी बेहतर ढंग से संचालित करने के उपाय करने पड़ते हैं। यह भी सच है कि हम तथाकथित विकासक्रम को रोक भी नहीं सकते। गाड़ियों की पैदावार होगी तो उन्हें बेचा भी जाएगा। पेट्रोल खत्म होने की चिंता हम ही क्यों करें?! नये बाजार की नयी सोच नयी पीढ़ी पर हावी है। कृत्रिम जरूरतें पैदा करके अर्थव्यवस्था का चक्र चलता है और हर आदमी अपनी वर्तमान की व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ही विकासक्रम की कहानी गढ़ता है। इस मुश्किल भूल-भुलैयां में हम चाहे जितने विचारोत्तेजक लेख लिखें, शब्दों को चिंताओं में डुबा दें, लेकिन कोई और बेहतर उपाय सूझता भी नहीं। हां, सामूहिक वाहन प्रणाली की व्यवस्था को सुदृढ़ करना, जैसे की मेट्रो और लोकल बस की सुविधा पर जोर दिया जाता है मगर ये भी अस्थायी उपाय मात्र बनकर रहते से प्रतीत होते हैं।
यहां चिंता का प्रमुख कारण है कि उपरोक्त सब उपाय के बावजूद, परेशानी इस हद तक बढ़ने लगी है कि महानगरों की सड़कों पर कई स्थानों पर अव्यवस्था का साम्राज्य है। हमें महानगरों के विकेन्द्रीकरण पर विधिवत सोचना होगा और उसे सख्ती से कार्यान्वित करना होगा। बड़े-बड़े प्रमुख कार्यालयों को महानगरों से दूर कस्बों में ले जाना होगा। दूरसंचार का प्रयोग अधिक से अधिक करते हुए लोगों की आवाजाही न्यूनतम करनी होगी। बड़े शहरों में बचे हुए कार्यालयों के साथ ही उनकी टाउनशिप बनानी होगी और उसे हर तरह से सुविधा-संपन्न व दैनिक आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर बनाना होगा। शहरों के विधिवत टाउन प्लानिंग की आवश्यकता है। वरना आने वाला समय बड़ा मुश्किल होगा। एक बार मुझे सड़क पार करने में पूरे पचीस मिनट अतिरिक्त चलना पड़ा था। वो भी एक अस्थायी व्यवस्था के बीच में से निकलकर जाना पड़ा। सड़क के बीच स्थित लोहे की जालियों में से निकलने का यह स्थान जनता द्वारा बनाया गया था। उसमें से मेरे जैसे दसियों लोग निकल रहे थे। इस चक्कर में तेज गाड़ियों को रुकना पड़ रहा था। तू-तू, मैं-मैं और एक-दूसरे को हिकारत की दृष्टि से देखा जा रहा था। उस स्थान पर सड़क व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई थी, क्योंकि लोग वहां से निरंतर आ-जा रहे थे। और गाड़ी वालों को न चाहते हुए भी मजबूरी में गाड़ी रोकनी पड़ रही थी। हार्न पर हार्न बज रहे थे। सबको जल्दी थी। कोई एक-दो पैदल यात्री होता तो उन्हें कोई गाड़ी वाला कुचल कर आगे बढ़ जाता, मगर यहां अच्छी तादाद में लोग थे। एक तरह से यह स्थान अघोषित रेड सिग्नल बन चुका था। हो सकता है किसी दिन स्थानीय व्यवस्था के द्वारा यह स्थान कंटीली तारों के साथ-साथ सीमेंट की दीवार द्वारा बंद कर दिया जाये। मगर क्या इस बात को भी उतनी ही प्रमुखता से सोचा जाता है कि पैदल चलने वाला इंसान, फिर चाहे वो कोई भी हो, इस सड़क पार करने की मुसीबत को कैसे दूर करें? यहां कोई पुल नहीं, अंडरग्राउंड व्यवस्था नहीं। इस तरह की परेशानी कई स्थानों पर हो सकती है। और यह कहीं भी हो सकती है। शायद हम अपने ही बनाए विकासक्रम के चक्र में उलझकर अपने जीवन को एक न सुलझने वाला गुत्थी बना चुके हैं। जिसमें आदमियों की निरंतर बढ़ती असंख्य भीड़ स्वयं से ही उलझती चली जा रही है। हम क्यों नहीं इस तेज बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रण करने की सोचते हैं? अब तो यह दिखावे के लिए भी कहीं नजर नहीं आता। किसी भी स्तर पर कोशिश नजर नहीं आती। यहां तक कि अब यह सामाजिक एजेंडे में भी शामिल नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम हर आने वाले जीव के साथ न्याय नहीं कर रहे। हमारे घरों में जन्म लेने वाला हर एक शिशु का जीवन खुशहाल व उज्ज्वल हो ऐसी कामना तो की जानी चाहिए। मगर जो व्यवस्था हम बना रहे हैं उसमें उनका भविष्य भयावह नजर आता है। हमारे द्वारा खरीदी जाने वाली हर एक गाड़ी और उसके लिए बनाए गए रोड व पार्किंग हमारे घर की दीवारों को सीमित करते चले जा रहे हैं।
 

यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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