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रामविलास शर्मा
प्रारम्भ  से ही, साहित्य-लेखन के क्षेत्र में डा.रामविलास शर्मा जी ने मुझे प्रोत्साहित किया। उनसे मेरा परिचय सन् 1945 से है; जब मैं ‘विक्टोरिया कालेज’, ग्वालियर में  बी.ए. के अंतिम वर्ष का छात्र था। तब कालेज में, डाक्टर साहब का भाषाण आयोजित था। वे प्रो. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ जी के निवास पर, गणेश कालोनी, नया बाज़ार, ठहरे थे। ‘सुमन’ जी से उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। उनके नियमित व्यायाम करने की बात; सुगठित स्वस्थ शरीर की बात। जैसा सुन रखा था, वैसा ही उन्हें पाया। ‘सुमन’ जी से उनके संबंध बड़े घनिष्ठ थे। नितान्त अनौपचारिक। लँगोटिया-मित्र जैसे। उस रोज़ भी मेरे सामने दोनों बालकों की तरह परस्पर व्यवहार करने लगे। न जाने क्या हुआ, विनोद-विनोद में दोनों एक दूसरे को पकड़ कर ज़ोर आजमाइश-सी करने लगे। डाक्टर साहब सम्भवतः और सोना चाहते थे। उन्होंने ‘सुमन’ जी को रोका और करवट लेकर फ़र्श पर लेटे रहे ! इतने में, बाहर सड़क पर से एक ताँगा लाउड-स्पीकर पर एलान करता निकला — ‘सुमन’ जी के मुहल्ले से। एलान था, डाक्टर साहब के कार्यक्रम का। रामविलास जी उठे और बच्चों की तरह, अपने को महत्त्व देते हुए, सीने पर हाथ थपथपाते हुए बोले —‘देख लो, मेरे बारे में कहा जा रहा है।’ फिर, उसी रोज़, बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि श्री सुमित्रानंदन पंत, आमने-सामने हमेशा उनकी कविताओं की प्रशंसा करते रहे हैं; किन्तु उन्होंने पंत जी के काव्य की उनके समक्ष सदैव जम कर आलोचना ही की।
      डा. रामविलास जी को देख कर और उनकी बातें सुन कर, उनके पहलवानी शरीर और बौद्धिक गाभीर्य का सारा भय व आतंक जाता रहा! वे तो बड़े हँसमुख व विनोदप्रिय निकले ! सब सहज-स्वाभाविक। कहीं कोई दिखावा नहीं। वस्त्र तक साधारण धारण करते थे। कोई सजावट नहीं। वे कार्यक्रम के प्रमुख थे; लेकिन कार्यक्रम में जाने के लिए कोई  सज-धज नहीं। जाड़ों में कोट-पेण्ट अन्यथा बुशर्ट-पेण्ट पहनते थे। एक बार उनका भाषण अंग्रेज़ी में भी सुनने को मिला; अपने महाविद्यालय ‘कमलाराजा कन्या महाविद्यालय, ग्वालियर’ में।
      श्री. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, श्री. रांगेय राघव, डा. रामविलास शर्मा आदि से मिलने, सन् 1946 के आसपास, आगरा कभी-कभी चला जाता था। उन दिनों मेरी बड़ी बहन आगरा में थीं — बहनोई रेलवे में सर्विस करते थे। आगरा सिटी स्टेशन के पास उनका क्वार्टर था। डा. रामविलास जी गोकुलपुरा में रहते थे, श्री. रांगेय राघव बाग़ मुज़फ्फ़र खाँ में। ‘कमलेश’ जी भी कहीं किसी गली में; फिर ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ में। ये अग्रज साहित्यकार ख़ूब प्रेम से दिल खोल कर मिलते थे।
डॉ. महेंद्र भटनागर
      सन् 1948-49 में, मैंने उज्जैन से ‘सन्ध्या’ नामक मासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन किया। इसके अंक - 2 में डा. रामविलास शर्मा जी ने भी अपना लेख दिया — ‘हिन्दी-साहित्य की प्रगति-विरोधी धाराएँ’। लेख का शेषांश अंक - 3 में छपना था; लेकिन फिर ‘सन्ध्या’ का प्रकाशन ही बंद हो गया — प्रकाशक की इच्छा। यह लेख पर्याप्त हमलावर था; प्रमुख रूप से ‘अज्ञेय’ जी की विचारधारा पर केन्द्रित था। रामविलास जी ने आश्वस्त किया था — ‘सन्ध्या’ को मेरा सहयोग बराबर मिलेगा — कैसा भी वह सहयोग हो।’
12 मई 1952 को मेरा विवाह हुआ। अपने अनेक साहित्यिक मित्रों को मैंने आमंत्रण-पत्र भेजे। डा. रामविलास जी को भी। डाक्टर साहब ने जो बधाई-पत्र भेजा; वह अपने में एकदम विशिष्ट था — निराला ! दाम्पत्य जीवन को उन्होंने साहित्य-रचना के लिए प्रेरक बताया। उन्होंने लिखा : 
गोकुलपुरा-आगरा / दि. 6-5-52 
प्रिय भाई  महेन्द्र,
हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करो।
काव्य-प्रतिभा  में वृद्धि हो, साहित्य के लिए नयी स्फूर्ति प्राप्त हो।
तुम्हारा,
रामविलास शर्मा 
      जितना डाक्टर साहब की कृतियों को पढ़ा; उनके लेखन से उतना ही प्रभावित होता गया। सरल भाषा, स्पष्ट दो-टूक अभिव्यक्ति, हमलावर तेवर, बीच-बीच में व्यंग्य का पुट आदि लेखन-संबंधी गुण उनके अपने हैं। उनके जैसा आलोचक हिन्दी में दूसरा नहीं। आलोचना करने में कभी-कभी वे कठोर भी हो जाते हैं। आलोचना विषयक उनके पास सही ऐतिहासिक दृष्टि एवं विचार-सरणि है। वहाँ न कठमुल्लापन है; न अनावश्यक उदारता। जो ग़लत है; उसका वे बेलिहाज़़ विरोध करते हैं।

शेष अगले अंक में ....

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