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फैज़ अहमद फैज़
तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

 
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मर्हमे-मुश्क लिये नश्तरे-अल्मास लिये
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले

दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगें
आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुलक़ुले-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न मने
जब कोई बात बनाये न बने

जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुनसान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

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