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सूरदास
राग मलार 
अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोस उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं, तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥  



हिन्दी साहित्य के आकाश में महाकवि सूरदास सूर्य के रूप में विद्यमान है।सूरदास जी अष्टछाप के कवियों में सर्वश्रेठ कवि माने जाते है। महाकवि सूर अन्य भक्त कवियों की तरह एक उच्च कोटि के भक्त पहले माने जाते है,कवि बाद में। कविता करना इनका मुख्य लक्ष्य नही था। सूर का वात्सल्य एवं श्रृंगार वर्णन हिन्दी साहित्य की अमर निधि है। इन्होने बड़ी तन्मयता से श्रीकृष्ण की बाल लीलाओ का चित्रण किया है।सूरदास की ३ प्रमुख रचनायें मानी जाती है - "सूरसागर", "साहित्यलहरी" एवं "सूरसारावली" । परन्तु इनकी अक्षय ख्याति का कारण सूरसागर है।

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