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रणजीत कुमार
दिल के कोने में 
कहीं भी नहीं सुकून 
है जो दिल के कोने में 
चीर कर अंकुरित  हो धरती का सीना जो
धन्य है जीवन वैसा बीज़ होने में 
पथराई आँखें  देख लें मंजिल करीब है 
परवाह नहीं फिर  से थक के चूर होने में 
बस एक बात दिल  के सबसे करीब जो
होती है वेदना  उससे दूर होने में 
जब उड़ने को उत्साहित वजूद मेरा है
नहीं ईक्षा मेरी कोई व्यर्थ बोझ ढोने में
भाव से भरी मेरे आँखों की क्रान्ति
चाहे है आज साथ  दूँ उनका मैं रोने में  ...............


यह रचना रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य, विज्ञान के क्षेत्र में है . साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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