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मनोज सिंह
नुस्मृति में आदिकाल से जीवन को चार आश्रम में बाँटा जाता रहा है। ब्रह्मचर्र्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास। लेकिन पिछली शताब्दी में जीवन का स्वरूप बदला और विविधताएं बढ़ी हैं। समाज में मूलभूत परिवर्तन हुए हैं। विज्ञान ने सब कुछ उलटा-पुलटा कर दिया है। ऐसे में उपरोक्त वर्गीकरण पर भी पुनर्विचार होना चाहिए। नये ज़माने की नयी परिभाषाएं गढ़नी होंगी।
वर्तमान शिक्षा-पद्धति लंबी चलती है। ऐसे में ब्रह्मचर्य का पालन संपूर्ण छात्र जीवन में संभव नहीं। ठीक इसी तरह से नौकरी लगने के उपरांत एवं शादी के पूर्व का समय अन्य काल से भिन्न और कई मामलों में यादगार बन पड़ता है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र मगर नौकरी की ज़िम्मेदारियाँ प्रारंभ हो जाती हैं। छात्र जीवन को भी, स्कूल व कॉलेज के समयकाल के अंतर्गत दो अलग-अलग भागों में बाँटा जाना चाहिए। जो हॉस्टल में रहकर स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हैं, उनकी संख़्या नगण्य होने के कारण उन्हें अपवाद मानकर छोड़ा जा सकता है। मगर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए घर से बाहर जाना ही पड़ता है। आज के युग में यह संख़्या निरंतर बढ़ रही है। यही छात्र भविष्य में इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर व प्रशासनिक एवं अन्य सेवाओं में जाते हैं। अर्थात प्रबुद्ध वर्ग जो समाज को नेतृत्व भी प्रदान करता है, हॉस्टल-कॉलेज से होकर निकलता है। इसीलिए हॉस्टल का जीवन सीधे-सीधे महत्वपूर्ण हुआ। गुरु का आश्रम गुरुकुल, कालांतर में विश्वविद्यालय बना तो अँगरेज़ों के शासनकाल में भी रहने का स्थान 'छात्रावास' बना रहा, लेकिन स्वतंत्र भारत में यह कब 'हॉस्टल' कहा जाने लगा, पता ही नहीं चला। बहरहाल, कई बिंदु इस दौरान अपने चरम पर होते हैं। शरीर में ऊर्जा होती है। जोश, जुनून, सपने, महत्वाकांक्षा सब कुछ सातवें आसमान पर। सेक्स की भूख 'कामेच्छा' सर्वाधिक तो करिअर की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण। अर्थात व्यक्तिगत दृष्टिकोण से भी देखें तो यह जीवन का उल्लेखनीय काल होता है।
हॉस्टल में रहकर पढ़ने वाले युवा छात्र-छात्राओं के बीच यौन आकर्षण का चरम पर होना प्राकृतिक है। ऐसे में प्यार के लिए कुछ भी करेगा वाला सिद्धांत प्रिय होना स्वाभाविक है। परिपक्वता कितनी आती है, यह एक तर्क-वितर्क का विषय है। बहरहाल, भारतीय संविधान के अनुसार इस दौरान राजनीतिक अधिकारों का प्रयोग करने योग्य मान लिया जाता है। विदेशों में, विशेष रूप से पश्चिमी देशों में, एक उम्र के बाद माँ-बाप का तथाकथित नियंत्रण समाप्त माना जाता है। शराब और सिगरेट भी ख़रीदी जा सकती है। खुला सेक्स तो पहले से ही वहाँ उपलब्ध है। लेकिन पूर्णतः स्वतंत्रता इसी दिन मिलती है। इसीलिए कई लोग अठारह वर्ष के जन्मदिवस को 'ग्रेट फ्रीडम-डे' के रूप में मनाते हैं। भारतीय युवा परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। वो पश्चिम की राह पर चलते हुए स्वतंत्र होने की नयी परिभाषा रच रहा है। मगर फिर भी अभी सभ्यता और संस्कृति की पकड़ महसूस की जा सकती है। ये मजबूत बेड़ियाँ टूटने के कगार पर हैं। अच्छा है या बुरा, यह दीग़र बात है। लेकिन मूल में कहीं-कहीं यही प्रश्न उभरता है।
पहले इस उम्र में आते-आते भारतीय समाज में अधिकांश लड़के-लड़कियों की शादी हो जाती थीं। अर्थात सेक्स का सामाजिक इंतज़ाम हो जाया करता था। छात्र पढ़ाई के दौरान अपनी पत्नियों को प्रेमपत्र लिखा करते थे। युवतियाँ पढ़ने के लिए कम आगे आ पाती थीं और कई इस उम्र तक आते-आते बच्चों की मां बन चुकी होती थीं। तो क्या यह मान लिया जाए कि कम से कम स्त्री-पुरुष संबंध के लिए, पश्चिमी संस्कृति पारंपरिक भारतीय सभ्यता का अनुसरण करती प्रतीत होती है? बहुत हद तक। यह ज़रूर कहा जा सकता है कि भारत में इस पर बाक़ायदा सामाजिक मोहर लगी हुई थी। वैसे तो पश्चिम में भी उनके खुले संबंधों को मान्यताप्राप्त है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि यहाँ के संबंधों में बंधन थे तो पश्चिमी रिश्ते बहुत हद तक बंधन-मुक्त। बहरहाल, दोनों ही स्वरूप में अपनी-अपनी अच्छाइयाँ थीं और हैं, और कमियाँ भी, जिसका भुगतान समकालीन पीढ़ी को करना होता है।
भारत ने पश्चिम के औद्योगिकीकरण का अनुसरण किया। व्यावसायिकता बढ़ी है। विज्ञान पढ़ाया जाने लगा। खेती के अतिरिक्त भी संसाधन विकसित हुए। पश्चिम की तरह नौकरी लगने के बाद ही परिवार बसाने की प्रथा प्रारंभ हुई। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान अधिकांश छात्र-छात्राएं अविवाहित पाये जाने लगे। पूरब ने पश्चिम से बाकी सब तो सीख लिया लेकिन व्यक्तिगत संबंधों में जो स्वतंत्रता वहाँ है, यहाँ नहीं आ पाई। समाज ने अपने शिकंजे को बनाए रखा। परिणामस्वरूप भारतीय युवा वर्ग सेक्स के क्षेत्र में भूखा रह गया। यहाँ के हॉस्टल जीवन को ध्यान से देखें तो यौन विकृति कई रूपों में मिलेगी। आज भी अधिकांश लड़के और लड़कियों के हॉस्टल अलग-अलग ही नहीं दूर-दूर भी होते हैं जहाँ लड़के तो स्वतंत्र और लड़कियों को पहरेदारी व किलेनुमा हॉस्टलों में बंद कर रखा जाता है।
उपरोक्त परिस्थिति अब धीरे-धीरे अपने स्वरूप को स्वयं ही बदल रही है। विगत दशक में भारतीय समाज की सोच में भी परिवर्तन आया है। छात्राओं की संख़्या बढ़ने, घर से बाहर निकलने, नौकरी में बराबर से प्रतिस्पर्द्धा के कारण वे और अधिक स्वतंत्र हुई हैं। लड़के-लड़कियों के आपस में मिलने की संभावनाएं बढ़ी हैं। इस दौरान हॉस्टल के जीवन में भी एक बहुत बड़ा अंतर महसूस किया जा सकता है। अब यह बहुत कुछ पश्चिमी सभ्यता के नजदीक दिखाई देता है। लड़के-लड़कियाँ स्वतंत्र रूप से घूमते हुए दिखाई दे सकते हैं। उनकी अपनी कहानियाँ हैं, अपने दर्द हैं, अपना अहसास है, अपना जीवन।
विडम्बना ही है कि इस उम्र में एक तरफ़ यौन-इच्छा प्रबल होती है तो दूसरी ओर भविष्य की नींव इसी दौरान रखी जाती है। ऊपर से कुछ नया करने का जोश। मानसिक परिपक्वता कितनी आ पाती है, एक अलग मुद्दा है। मगर राजनीतिक शक्ति और स्वतंत्रता मिल जाने से यह वर्ग राजनीति में सबसे अहम हो जाता है। जुझारू सक्रिय कार्यकर्ता यहीं से मिलते हैं। आंदोलन के लिए भी युवा वर्ग ही चाहिए। अर्थात ये राजनीतिज्ञों की निगाह में भी होते हैं।
यही सब कारण है जो यह जीवन का अमूल्य काल बन जाता है। इस दौरान संतुलन और अधिक सतर्कता की आवश्यकता है। जो इसे बनाए रखते हैं वे सफल हो जाते हैं। जिस समाज में ये वर्ग विकसित और उन्नत होगा वही राष्ट्र अग्रणी होता है। इस उम्र में भावनाएं भी पूरे वेग और अपने तीव्रतम रूप में होती हैं। घर से बच्चा नया-नया निकलता है इसीलिए खुले आकाश में विचरण का आनंद ही कुछ और होता है। कल्पनाओं की ऊँची उड़ान, चाहतों का अनंत सागर, अंतहीन इच्छाएं, महत्वाकांक्षा की मृगतृष्णा, ऐसे में कई पंछी आकाश में भटक जाते हैं तो कई अपनी मंज़िल पर भी पहुंचते हैं। यह जीवन की सबसे कठिन परीक्षा का समय भी है। बढ़ती जनसंख़्या से उपजी प्रतिस्पर्द्धाओं एवं सब को सब कुछ चाहिए, ने इसे और मुश्किल बना दिया है। आधुनिक काल में गति महत्वपूर्ण हो गयी है। खाने-पीने से लेकर सफलता, लोकप्रियता, पॉवर, पैसा तुरंत चाहिए। रातोंरात चांद पर पहुँचना है। आनंद नहीं मस्ती चाहिए। ये पूरी न होने पर अवसाद, क्रोध, पीड़ा व आक्रोश की तीव्रता भी तेज़ होती है। प्रतिशोधात्मक हिंसा में दूसरों को हानि पहुंचाने के साथ-साथ स्वयं को भुलाने व मिटाने वाली नशे की तीव्रता भी बढ़ी है। लड़कियाँ भी अब इससे बची नहीं। आज का युवा वर्ग 'स्पीड' की चपेट में है ओर वह अकेला हुआ है। मुश्किल इस बात की है कि स्वयं के जीवन के साथ-साथ समाज के जीवन की रूपरेखा भी इस युवा वर्ग के द्वारा ही खींची जाती है।
संक्षिप्त में कहें तो हॉस्टल का जीवन घटना प्रधान काल है। अति सक्रिय जीवन खंड। ये यादें जीवनपर्यंत उद्वेलित करती रहती हैं। इस उम्र की दोस्ती निश्छल और निःस्वार्थ, और शायद इसीलिए स्थायी और मज़बूत होती है। आदमी एक-दूसरे को, उसके मूल रूप में कह सकते हैं, देखता है। कोई आडम्बर नहीं, आवरण नहीं। यही कारण है जो ये रिश्ते सरल और सहज होते हैं।
इस क्रियाशील कालखंड पर आधारित उपन्यास 'हॉस्टल के पन्नों से' लिखने के लिए सहपाठियों ने मुझे प्रेरित किया था। इस दौरान कॉलेज के न जाने कितने साथियों ने मदद की। मैंने भी इसका भरपूर आनंद उठाया। पुरानी यादों को ताजा करते ही जीवन ठहर जाता है और आप अपने आपसे तर्क-वितर्क करने लग पड़ते हैं। समय इस पर धूल की मोटी परत ज़मा देता है जिसे हटाने पर चित्र धुंधले पड़ जाते हैं। यह कभी मन को कचोटती है तो कभी ठंडी हवा के झोंकों-सी निकल जाती है और दे जाती है एक मुस्कुराहट। कहीं-कहीं आँसू के बूंद भी, जिनकी अपनी कहानी है। मैं दोस्तों का शुक्रगुजार तो नहीं हो सकता क्योंकि यह हमारे अपरिभाषित प्रेमपूर्वक संबंधों में रुकावट पैदा करेगा। और फिर इसी बहाने वे स्वयं भी पीछे मुड़कर, अपने सुनहरे पलों को एक बार फिर देख पाए होंगे, यह क्या कम है? कइयों ने रुककर पुराने दिनों को याद किया। अधिकांश के चेहरे पर गर्व था तो कुछ एक ने पश्चाताप के भाव को दबाया होगा। कुछ एक के मन में ख़्याल आया होगा कि काश! वो ये कर पाते...। मगर जीवन की गाड़ी में बैक गियर नहीं होता। भूतकाल मिटाया नहीं जा सकता। कुछ यादगार लम्हें स्वर्णिम अक्षरों से अंकित होते हैं तो कुछेक से इंसान सदैव पीछा छुड़ाने के चक्कर में रहता है। लेकिन यह हॉस्टल के पन्नें जो एक बार लिख दिए गए, सिर्फ़ पढ़े जा सकते हैं। उन्हें ठीक नहीं किया जा सकता। हाँ, आने वाली पीढ़ी इसमें से अपने रास्ते ज़रूर चुन सकती है।
युवा वर्ग मूल रूप से विद्रोही होता है। पारंपरिक व्यवस्था का विरोध उसका नैसर्गिक स्वभाव बन जाता है। वो स्वयं परिवर्तन का प्रतीक है और उसका माध्यम और कारक दोनों बनने के लिए उत्साही रहता है। उसके विद्रोह को दिशा न दी जाए तो वो विध्वंसकारी और आत्मघाती भी हो सकता है। प्रोत्साहित न किया जाए तो निष्क्रिय भी हो सकता हैं लेकिन इसी विद्रोह की ऊर्जा को क्रांति में परिवर्तन करने के लिए विचार, नेतृत्व और प्रेरणा की आवश्यकता होती है।
आज भारतीय समाज संक्रमण काल से गुज़र रहा है। सपने और हक़ीक़त के बीच खाई गहरी हुई है। असंतोष अपने चरम पर है। व्यवस्था की जड़ता युवाओं को तंग करती है तो तथाकथित विकास जनित परिवर्तन उसे भ्रमित कर रहा है। उसका मौन मुखर नहीं हो पा रहा और वो कुंठित होकर भटक रहा है। नयी पीढ़ी को उच्छृंखलता व संस्कारविहीन करार देने वाली पुरानी पीढ़ी इसके लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हैं। समय का कालखंड तोप के मुहाने पर बैठा है। ज़रा-सी चूक सर्वनाश कर देगी। हमें एक संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता है और वो युवा वर्ग ही ला सकता है। ऐसे में अनुभवी लोगों को आगे आना होगा। अगली पीढ़ी के पास पहुँचना होगा। उन्हें रास्ता और मंजिल दोनों दिखाना होगा। और फिर बुजुर्गों को इन्हीं रास्तों पर प्रकाश की व्यवस्था करनी चाहिए। उन्हें हर मोड़ पर साइनबोर्ड बनकर लटक जाना चाहिए। ये उनका कर्तव्य है और शायद अधिकार क्षेत्र भी।

यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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  1. ..."युवा वर्ग मूल रूप से विद्रोही होता है। पारंपरिक व्यवस्था का विरोध उसका नैसर्गिक स्वभाव बन जाता है..."------क्या यह एक स्थापित सत्य है, नही, यह दोषारोपण है पाश्चात्य प्रभाव में, अव्यवस्था का विरोध युवा अवश्य ही करते हैं व करना चाहिये, सुव्यवस्था का नहीं...विद्रोह का अर्थ कुव्यवस्था व अव्यवस्था का विरोध होता है ।
    ----आश्रमो के पुनर्मूल्यान्कन की आवश्यकता नहीं....आप जो युवाओं की बात कह रहे हैं वह अन्ग्रेज़ी -मुगल काल की है( जो सान्स्क्रिति भ्रष्टता का काल था)--वास्तव में पुरा-काल में विध्या अध्ययन काल, आज के समान ही लम्बा होता था, अन्तेवासी- गुरुकुल, आज के विश्वविध्यालय व होस्टल की भान्ति थे...उस समय भी वि वि क्षात्र राजनीति में भाग लेते थे....बस अन्तर सदाचरण के पालन का था जो आज विदेशी नकल के कारण कदाचरण में बदल गया है.....
    ----आज भी चारों आश्रमों की उतनी ही संदर्भिता है....हां आपने यह सच कहा कि बुज़ुर्गों को प्रकाश दिखाना चाहिये न कि युवाओं के साथ प्रवाह में बह जाना ....

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