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प्यार की उम्र फकत हादसों से गुजरी है।
ओस है, जलते हुए पत्थरों से गुजरी है।।
दिन तो काटे हैं, तुझे भूलने की कोशिश में
शब मगर मेरी, तेरे ही खतों से गुजरी है।।
जिंदगी और खुदा का, हमने ही रक्खा है भरम
बात तो बारहा, वरना हदों से गुजरी है।।
कोई भी ढांक सका न, वफा का नंगा बदन
ये भिखारन तो हजारों घरों से गुजरी है।।
हादसों से जहां लम्हों के, जिस्म छिल जाएं
जिंदगी इतने तंग रास्तों से गुजरी है।।
ये सियासत है, भले घर की बहू-बेटी नहीं
ये तवायफ तो, कई बिस्तरों से गुजरी है।।
जब से ‘सूरज’ की धूप, दोपहर बनी मुझपे
मेरी परछाई, मुझसे फासलों से गुजरी है





यह ग़ज़ल सूरज राय 'सूरज' जी की है . सूरज करीब तीन दशकों से लगातार रचनाएं लिख रहे हैं। उनकी रचनाओं का संकलन ‘धुआं-धुआं सूरज’ नाम से प्रकाशित हुआ है।

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  1. कोई भी ढांक सका न, वफा का नंगा बदन
    ये भिखारन तो हजारों घरों से गुजरी है।।

    ये सियासत है, भले घर की बहू-बेटी नहीं
    ये तवायफ तो, कई बिस्तरों से गुजरी है।।

    ये शेर खासा पसंद आए।

    -विश्व दीपक

    उत्तर देंहटाएं
  2. कोई भी ढांक सका न, वफा का नंगा बदन
    ये भिखारन तो हजारों घरों से गुजरी है।।
    हादसों से जहां लम्हों के, जिस्म छिल जाएं
    जिंदगी इतने तंग रास्तों से गुजरी है।।
    ये सियासत है, भले घर की बहू-बेटी नहीं
    ये तवायफ तो, कई बिस्तरों से गुजरी है।।

    गज़ब गज़ब गज़ब्।

    उत्तर देंहटाएं
  3. हादसों से जहां लम्हों के, जिस्म छिल जाएं
    जिंदगी इतने तंग रास्तों से गुजरी है।।


    khubsoorat sher

    arshad

    उत्तर देंहटाएं
  4. mazza aa gaya sir ji sab mast hi

    उत्तर देंहटाएं

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