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जीवन में  अक्सर ऐसे पड़ाव आते हैं  जहाँ जिंदगी थमी सी लगती है. अनुभव एवं स्मरण की दुनिया मेरे हिस्से के सच को उजागर  करती है. कुमार मेरे सबसे करीब मित्र हैं और अकेले  भी पर उनका अकेलापन सृजनात्मक  है मेरे बहुत आग्रह करने पे उन्होंने जो बताया वो अनुभव आपके समक्ष रख रहा हूँ. हम साथ साथ लखनऊ के कुडिया घाट पर बैठे गोमती में दीपदान करते लोगों को देख रहे थे तब उन्होंने कहा था की दीपक के तले हमेशा अँधेरा रहता है ठीक उसी तरह हमारे अंतर्मन में भी अन्धकार है और एक दीप वहाँ भी जले ऐसी इक्षा थी मन में उनके. फिर मैंने पूछा उनसे क्या आपने कभी प्रेम किया है एक मधम मुस्कान के साथ बोले मुझे प्रतिपल अनुभव होता है एक विशेष अपनत्व का प्रेम मैंने किया नहीं पर मैं स्वयं प्रेम हूँ क्यूंकि मेरी हर क्रिया प्रेम एवं उत्साह का उत्सव है उसी की अभिव्यक्ति है. प्रेम की संकीर्ण दायरे से बाहर निकलेंगे तो ज्ञात होगा की हम प्रेम मात्र की ही तो उत्पत्ति हैं. हमारे चेहरे में वही ताज़गी वही उमंग एवं आचरण में वही उर्जा व्याप्त होनी चाहिए थी. बस गलती मात्र इतनी हुई की दर्पण पे जमे धुल को हमने अपने चेहरे की वीभत्सता मान ली. सहज एवं सरल जीवन जब मान्यताओं का अंधा अनुसरण करने लगे तो सारी यात्रा व्यर्थ है. खुशी की खोज मिथ्या है वैसे ही प्रेम की तलाश भी.
कुमार के ये सारी बातें मुझे उस समय  आदर्शवादी शब्दों का पुलिंदा  प्रतीत होते थे. अनुभव हुआ तब बात समझ में आई की हर धर्म प्रेम की दुहाई देता है फिर भी संसार प्रेम से कुपोषित क्यूँ उत्तर स्पष्ट था प्रेम की शिक्षा थोथी थी शायद. हर जगह ये बताया गया की दूसरों से प्रेम करो, पिता माता भाई और पड़ोसी पर मुझे शायद ज्ञात नहीं की किसी ने ये बताया हो की स्वयं से प्रेम करो. प्रेम में स्वार्थी बनना था ताकि हम अपने हिस्से के परम सत्य को जान पाएं साक्षात्कार हो हमारा स्व के अर्थ से. हो सकता था सम्भावना थी की एक अनुभव सौ पुस्तकों पर हावी होती प्रेम का एक अनुभव वर्षों के शैक्षणिक प्रोग्रामिंग से मुक्त करने में सहायक होता. हम कस्तूरी मृग की भाँती भटक रहे हैं ज्ञात नहीं की श्रोत हम स्वयं हैं. मुस्कुराना भूल चुके हैं हम हमें स्वयं ये ज्ञात नहीं की जो दौड़ में हम शामिल हैं वो हमें कहाँ ले जा रही है. चूहे के दौड़ में हम विजयी भी हुए तो चूहा ही रहेंगे. जीवन महा धन्यवाद कैसे बने ये प्रश्न है . गुलाब के पौधे में कांटे ज्यादा और फूल कम होते हैं पर कहलाता गुलाब है न की कंटीला झाड़ बस एक गुलाब को प्रतिस्फुतित होना है ह्रदय में हमारे.
मैं कुमार  का आभारी हूँ जिसने मेरे सोंच पर चोट की. अपने हिस्से का सच मैं अनुभव द्वारा जान पाया. अपनी बातों को रखने का अवसर दिया इसके लिए धन्यवाद सत्य और आनंद की यात्रा में आपका हमकदम सत्यान्वेषी.
  

यह रचना रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य, विज्ञान के क्षेत्र में है . साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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