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इतना मत  तरसा
यार कुछ बूंदें तो बरसा .
इतनी गरमी हाय पसीना
दिन बदरंग हो गया कारी.
टेर रहा है मोर और
लगी सूखने है फुलवारी.
कुछ भीगेंगे कुछ नाचेंगे
कहरवा, कजरी को हरसा.
यार कुछ....
दृष्टि जहां तक सृष्टि हंसेगी
डाल डाल पर झूले.
दिन की बारहमासी
रातोंरात  मल्हारें छूले
मत टंग आस्मान में मैले
झर तू झर झर सा.
यार कुछ....
धूल  बनोगे या एक मोती
या वारिधि का संग.
सब कुछ भला भला सा होगा
आओ जैसे गंग.
घर से निकले हो तो
मन में एसा क्यों  डर सा.
यार कुछ ........




यह रचना क्षेत्रपाल शर्मा जी, द्वारा लिखी गयी है . आप सहायक निदेशक ( राजभाषा) ESIC में कार्यरत है . आप एक कवि व अनुवादक के रूप में प्रसिद्ध है . आपकी रचनाएँ विभिन्न समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है . आकाशवाणी कोलकाता ,मद्रास तथा पुणे से भी आपके आलेख प्रसारित हो चुके है . 

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