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गाना  है वही गीत  तभी संताप  मिटेगा
पुन्य मिटेगी और संचित  पाप मिटेगा
मिटेगा  जो भी जमा हुआ  है अंतर्मन में 
उड़ने  को स्वछंद ह्रदय  उन्मुक्त गगन  में 
हार से जाके पवन  ये कह दो युद्ध  न होगा
जीत से मेरी है अब बात  हो गयी 
जो  परम सत्य की अभिलाषा ह्रदय  तलाशे 
उस  शाश्वत सत्ता से मेरी मुलाकात हो गयी
अब  हार नहीं और नहीं जीत बस अभिव्यक्ति है
ये  प्रेम भरी  उस गीत मात्र  की ही शक्ति  है ...........
 

 यह रचना रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य, विज्ञान के क्षेत्र में है . साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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