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परख रहा था लिए तराजू रिश्तों का बन सौदागर, खुशी रहा था खोज निरंतर बाहर दुनिया में जाकर  ज्ञात हुआ  
 जब अंदर भी एक दुनिया है अनजानी सी, मिला मैं जा उससे जिसकी सकल थी कुछ पहचानी सी "
रिश्तों की नीव प्रेम और विश्वास  पर टिकी होती है. हमारे मन की विचित्र समस्या है उसे आदत होती है हर परिस्थिति को उलझाने की जिसके कारण निरंतर मन के कुरुक्षेत्र में अंतर्द्वंद जारी रहता है. मन जो विचारों का पुलिंदा है या तो भविष्य के सपने देख रहा होता है या भूतकाल के यादों में खोया रहता है ऐसे में कैसे कोई अनुभव करे उस सांसारिक एकात्मकता का. मैं अपने मन की बात करूँ तो पाता हूँ की अच्छाईयों में भी मैं खोज करते रहता हूँ की जरूर कोई उद्देश्य होगा बिना किसी कारण के कुछ नहीं होता. आज जब अनुभव हावी है शिक्षा पर तो ज्ञात हुआ की कहीं लोगों को परखने के क्रम में मैं इतना अंधा हो गया था की प्रेम की सम्भावना खत्म होती जा रही थी. एक खोखलापन जो मैंने स्वयं ही निर्मित किया था मेरे आंतरिक विनाश का कारण बन रहा था.
सफलता सिर्फ  व्यावसायिक हो तो अंदर का अंतर्द्वंद अतिक्रमण करता ही है और हुआ भी बिलकुल ऐसा ही. मैंने आरम्भ किया वो देना जो वांछित था अगर सामन्य तौर पे सोंचे तो लगेगा देने से कम होगा पर ऐसा नहीं था देने से कुछ बढ़ रहा था धीरे धीरे और मुझे ज्ञात हो रहा था कुछ ऐसे प्राकृतिक नियमों का जिससे मैं अनभिग्य था. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी की मेरा शोध स्वयं पर केंद्रित था नित नए अनुभव हो रहे थे उनमे से कुछ बहुत ही विशिष्ठ थे. मैंने जाना की पवित्रता के भाव से किया गया कार्य सृजनात्मक अभिव्यक्ति में परिवर्तित हो रहा था. देने में आनंद था मैं खुल के स्वागत कर रहा था जीवन के हर पल का. इस समझ को और बल मिला आकर्षण के सिद्धांत से और अब जीवन धन्यवाद लगता है.
रिश्ते  महतवपूर्ण होते हैं और नाजुक भी ऐसे में हर रिश्ता सहयोग करता है हमारे विकास यात्रा में. आवश्यक ये है की संदेह की जगह संवेदना हो प्रेम हो तभी हम वस्तुतः ईश्वर के इस विशाल आँगन में खुल खिल और खेल पायेंगे. मेरे विचारों में लयबद्धता भले न हो पर ईश्वरीय अनुकम्पा के प्रति मेरी दृढ वचनबद्धता है.
सत्यान्वेषी

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