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विकास अगर  वांछित है तो शिक्षा अनिवार्य. भारत प्रगति के नए कीर्तिमान  स्थापित करने में सक्षम  है ऐसा बुद्दिजीवियों का मानना है. हम जो अपनी खामियों को बढती जनसँख्या का कारण दे मुक्त हो जाते हैं वस्तुतः वही जनसँख्या सक्षम है विकास के नव युग के आरम्भ के लिए. ज्ञात रहे की आने वाले कुछ दशक में बूढ़े हो रहे विश्व में भारत एक युवा राष्ट्र के रूप में उभरेगा ऐसे में नितांत आवश्यक ये है की हम जनसँख्या का रोना त्याग कर मानव संसाधन पूंजी पर मनन करें. भारत को एक द्रष्टा युवा मार्गदर्शक की आवश्यकता है जो दूरदर्शी हो और इस जन्सान्खियिक परिस्थिति का उत्तरोतर लाभ उठा सके.
तकनिकी  शब्दावली में इसे डेमोग्राफिक  डिवीडेंड की संज्ञा दी गयी  है. अर्थशास्त्रियों का मानना  है की लाभांश तभी सार्थक होगा जब शिक्षा का प्रसार हो. अधिक से अधिक लोग शिक्षा से जुड़े और एक वैचारिक पहल हो तकनिकी , वैज्ञानिक, कला, उद्यमिता, संस्कृति , विविधता परक प्रणाली की. वैसी शिक्षा पद्धति जो व्यापक हो और तर्कसंगत भी ये व्यापक तर्कसंगत शिक्षा का उद्देश्य आत्मविश्वास बढ़ाना हो न की सिर्फ एक नौकरी. ऐसी पहल जो उमंग उत्साह एवं अभिव्यक्ति को मौका दे. जो दीमाग के वातायन खोले और श्रीजनशीलता एवं नवप्रवर्तन पर आधारित हो. जहाँ उम्र कोई रूकावट न बने और मुख्यधारा में जो भी आना चाहे उसे अनुकूल वातावरण मिले.
सरकार की भी अपनी मुश्किलें है पर आवश्यक ये है की इस दौर में कॉर्पोरेट  घराने अपने सामाजिक दायित्व  को भी समझें शिक्षा के नए केन्द्र स्थापति हों. उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाए लोगों की बौद्धिक सम्पदा का उचित सम्मान हो तभी हम एक ज्ञान आधारित चिरस्थायी विकसित समाज का निर्माण कर पायेंगे.
अपने विचारों  को रखने का मौका देने के लिए  धन्यवाद. आपका सत्यान्वेषी ......

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