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कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आयेंगे, सुनते थे सहर होगी

कब जान लहू होगी, कब अश्क गुहार होगा
किस दिन तेरी शनवाई, ऐ दीदा-ए-तर होगी

कब महकेगी फसले-गुल, कब बहकेगा मयखाना
कब सुबह-ए-सुखन होगी, कब शाम-ए-नज़र होगी

वाइज़ है न जाहिद है, नासेह है न क़ातिल है
अब शहर में यारों की, किस तरह बसर होगी

कब तक अभी रह देखें, ऐ कांटे-जनाना
कब अश्र मुअय्यन है, तुझको तो ख़बर होगी

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  1. कब जान लहू होगी, कब अश्क गुहार होगा
    किस दिन तेरी शनवाई, ऐ दीदा-ए-तर होगी

    वाइज़ है न जाहिद है, नासेह है न क़ातिल है
    अब शहर में यारों की, किस तरह बसर होग
    फैज़ साहिब की इतनी नायाब गज़ल पढवाने के लिये धन्यवाद।

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