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उदास  हो तुम क्यूँ  प्रेम के पथ पर
तुम्हारी  ख़ामोशी झकझोरता  है मन
आँखों की बातों को समझ न पायी तुम 
शब्दों  में मैं उसको जीवंत कर दूँगा 
जो  साथ चली तुम  बन मेरे हमकदम 
मैं जेठ की तपिश को बसंत कर दूँगा 
फिर भी अगर तुम्हारा पिघले नहीं ह्रदय 
प्रयास  पुनः मैं एक बार करूँगा
हारा  नहीं हूँ मैं , जग हैं नहीं जीता
घृणा  के बदले भी मैं  प्यार करूँगा 
 

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