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राग केदार
है हरि नाम कौ आधार।
और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥
नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।
सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥
दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।
सूर, हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भव-भार॥

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  1. बहुत अच्छी पंक्तिया है .......

    यहाँ भी आइये : --
    (आजकल तो मौत भी झूट बोलती है ...)
    http://oshotheone.blogspot.com

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