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प्रिय दुश्मन
तुम्हारे  अहंकार को मेरा नमन,
तुम घृणा क्रोध और मन के मवाद को आत्मसम्मान का नाम देकर अपने अहंकार को बोटी  खिलते रहे. तुम्हारे आस पास के लोग तुम्हारे हीन भावना का फायदा उठाकर  तुम्हारा खून पीते रहे  और जब भी मैंने तुम्हे पुकारा तुम्हे उसमे मेरा स्वार्थ नज़र आया. आज जब तुम दूर कहीं जीवन के कुरुक्षेत्र में अपना कर्म निभा रहे हो मुझे तुम्हारी सहसा याद आ रही है. बस एक बात मेरे मन में है की क्या मिला तुमको सिर्फ अपमान और तिरस्कार के जिसे तुम डिप्लोमेसी कहते थे . बबूल के बोने से आम नहीं होता पढ़ा था मैंने कभी पर तुम तो दूसरे के जीवन में कैक्टस की बागवानी कर रहे थे . तुम्हारी उम्मीद भी अनोखी थी की ये कैक्टस शायद जाने कौन सा अमृत फल देगा. तुम्हारी समस्या बस एक है जीवन में तुम्हे सब कुछ अनोखा चाहिए और तुमसे कोई आगे न जा पाए पर तुम्हारे मूढ़ चैतन्य को कौन जगाए. तुमने असंतोष का दामन थामा और मित्र खो दिए. आज तुम्हारी खोखली आदर्श और अहंकारी प्रवृति के  परिधि से मैं बाहर हूँ और आज भी मैं तुम्हारे लौटने का इन्तेज़ार करता हूँ.
खुले रहेंगे मेरे मन के दरवाज़े उम्मीद करता हूँ की तुम्हारा सोया हुआ  चैतन्य जागे . 
तुम्हारा दोस्त
सत्यान्वेषी 

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