1
Advertisement


      प्रमा अर्थात् प्रभाकर माचवे।
      प्रमा अर्थात् चेतना -- विशुद्ध ज्ञान।

नि:संदेह, ज्ञान की प्रत्यक्ष सजीव प्रतिमा हैं प्रभाकर माचवे। उनमें जो विशिष्ट व असाधारण है; वह है उनका बहुज्ञ व्यक्तित्व।

अध्ययनशील अनेक होते हैं, अनेक होते हैं बहुश्रुत; लेकिन रत्नाकर जैसी व्यापक-गहन ज्ञान-राशि को अपने में समोये रखना प्रत्येक के वश की बात नहीं। पढ़ा- सुना - देखा-  भोगा  कितना  अधिक है  उनके पास ! कितना याद  है उन्हें !  यह विशेषता एक विलक्षण प्रतिभा-सम्पन्न में ही देखी जा सकती है। सौभाग्य से, ऐसे सक्रिय मस्तिष्क को स्वस्थ तन मिला। शारीरिक क्षमता ने उनकी बौद्धिक चेतना के विकास में अकूत सहायता पहुँचायी।

मैंने उन्हें सदैव एक ऋषि की तरह अध्ययन और लेखन के प्रति समर्पित देखा।  लेखनी तो मात्र साधन है; निर्जीव है। प्रमुख है, उस लेखनी का सूत्रधार। उस सूत्रधार का हृदय और मस्तिष्क।

माचवे जी सही अर्थों में क़लम के धनी हैं। वे जब लिखने बैठते हैं तब उनकी लेखनी की त्वरा देखने योग्य होती है। जलधारा का-सा सहज प्रवाह ! कोई कृत्रिमता नहीं। कोई माथा-पच्ची नहीं। जैसे लेखनी में सब-कुछ भरा हुआ है और यह अद्भुत सर्जक-शिल्पी उसे कागज़ पर उतारता चला जा रहा है। कहने का आशय -- प्रभाकर माचवे में जो लेखन-सामर्थ्य है; वह विरल है। यह गुण न अभ्यास से हासिल किया जा सकता है; न अनुकरण से। माचवे जी के व्यक्तित्व में यह घुला-मिला एक प्राकृतिक तत्त्व है। कोई व्यक्ति चलता-फिरता विश्वकोश बन सकता है -- माचवे जी भी किसी विश्वकोश से कम नहीं; किन्तु उनके जैसी अनुभूति-क्षमता, जीवन-संघर्ष के दौरान भोगा यथार्थ, भ्रमण द्वारा देखी-जानी दुनिया इतनी   बहुरंगी है कि उनका साहचर्य- सम्पर्क आकर्षक व रोचक बन जाता है। उनका अनुभव-जगत 'आवारा'  का अनुभव-जगत नहीं है ( इसे उनकी सीमा भी कह सकते हैं।) -- एक अत्यधिक उत्तरदायी कार्मिक और निर्व्यसनी सदगृहस्थ का अनुभव-जगत है।

वे तर्कशास्त्र-दर्शनशास्त्र- अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर रहे, अनेक प्रशासनिक पदों पर रहकर अपनी सूझबूझ का परिचय दिया, अनेक भाषाओं में, अनेक विधाओं में ख़ूब लिखा, हिन्दी में जो लिखा उसे पढ़कर कोई कह नहीं सकता कि इस लेखक की मातृभाषा हिन्दी नहीं।

और, इसके साथ दूसरी विशेषता जो माचवे जी में सम्पृक्त है, वह उनके क़द को और भी ऊँचा बना देती है। ।( वैसे भी माचवे जी का क़द बड़ा है !) यह विशेषता है -- उनकी सरलता-सहजता। ज्ञान की गठरी को पीठ पर लाद उन्होंने ढोया नहीं। मैंने उन्हें प्राय: प्रसन्न-प्रफुल्ल देखा। खुल कर हँसते। हास-व्यंग्य करते। संस्मरण सुनाते। रुचिपूर्वक खाते-पीते। ज़रूरतमंदों की सहायता करते। माचवे जी में दर्प और अभिमान का लेश भी नहीं। नये लेखकों - रचनाकारों के प्रति आत्मीय। संबंधों-रिश्तों को निभाने वाले। तनिक भी ईर्ष्यालु नहीं। अहम् में अकिंचनों की कभी उपेक्षा नहीं की। आज भी जो उनसे सम्पर्क करता है; निराश नहीं होता। औदार्य और सौजन्य की अशेष पूँजी उनके पास है।

वे सच्चे अर्थों में पढ़े-लिखे इंसान हैं।  उन्मुक्त हृदय और  उन्मुक्त  मस्तिष्क के  इंसान ! विश्व-मानव !

डा. प्रभाकर माचवे जी के पत्र का एक नमूना
दि. 11 मार्च 1987

प्रिय महेंद्र,

बहुत वषों बाद मिला पत्र तुम्हारा।

आज ग्यारह तारीख है; होली है सोलह को !
कुछ तो समय देते, मित्र ! रचना को भेजने; डाक के द्वारा।

होली का नाम लिया
इसलिए कुछ जिगर को थाम लिया !

सोचा फिर दुबारा।
भेज रहा एक व्यंग, पत्र संग

छापो तो छापो
वर्ना भूल जाओ सारा !

सप्रेम --
प्रभाकर माचवे

==========================================


 

एक टिप्पणी भेजें

  1. Shree Prabhakar ji aap ka lekh padhkar bahut hi achchha laga. kripa karke agar ho sake to Ayodhya ke bare me kuch likhe mujhe achchha lagega


    aapka

    Ravishankar Shukla

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top