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प्रिय मित्रों , हिन्दीकुंज में रणजीत कुमार जी के स्तम्भ मंगल ज्ञानानुभाव के अंतर्गत आज प्रस्तुत है - मौन की गूँज . यह लेख मौन की महत्ता से सम्बंधित है . आशा है कि आप सभी को यह लेख पसंद आएगा . इस सन्दर्भ में आप सभी के सुझाओं की प्रतीक्षा रहेगी .

मौन की गूँज

एकांत वातावरण  में अनुभव सहज हो जाता है की शब्द अनायास ही मानस पटल पर उभर नहीं आते हैं अपितु पृष्टभूमि में मौन का विशाल सागर होता है. शब्दों के उदगम से अव्यक्त भाव व्यक्त हो जाते हैं और अभिव्यक्ति बन जाते है रचयिता का. हर शब्द जो आकार ले ध्यान रहे आशावादी हों उसमे उत्साह हो, उमंग हो, होसला हो, साहस हो और हो धन्यवाद उस परम सत्ता के लिए जिसकी दैवीय योजना की हम उत्पति हैं. शब्दों की शक्ति अद्भूत होती है ये परिचय होती है आपके वैचारिक परिपक्वता का. आपके विचार आशावादी हो सकते हैं या फिर निराशावादी भी पर इन दोनों से परे समसामयिक परिदृश्य में सम्भावनावादी विचार का होना आवश्यक है. आपके द्वारा उच्चारित शब्द नये संभावनाओं के पट खोलने की शक्ति रखते हैं. मनसा वाचा कर्मणा के वैदिक पद्धति के केन्द्र में यही अमृत सन्देश निहित है की भाव ही विचार बने और वाणी के माध्यम से  उसी का उद्घोष हो और यथोचित क्रिया आपकी सहज अभिव्यक्ति मात्र. अखंड व्यक्तित्व की नीव यही है और योग का दर्शन भी.
आइये शब्दों के चुनाव से विचारों को दिशा दें और आनंद अनुभव  के जीवन उत्सव में खुलें खीलें और खेलें...................

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