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फिर खुला है दर--अदालत--नाज़    
गर्म
बाज़ार--फ़ौजदारी है

हो रहा है जहाँ में अँधेर
ज़ुल्फ़ की फिर सरिश्तादारी है

फिर दिया पारा--जिगर ने सवाल
एक फ़रियाद--आह--ज़ारी है

फिर हुए हैं गवाह--इश्क़ तलब
अश्क़बारी का हुक्मज़ारी है

दिल--मिज़श्माँ का जो मुक़दमा था
आज फिर उस की रूबक़ारी है

बेख़ूदी बेसबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

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  1. ग़ालिब को यहाँ पढवाने का शुक्रिया

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  2. अच्छी गज़ल पढ़वाई...चचा गालिब को पढ़कर मजा आ गया

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